Sunday, 23 March 2025

संघ शताब्दि वर्ष में नागपुर दंगे से उठ रहे अनेक प्रश्न


     बीते दिनों महाराष्ट्र की राजधानी नागपुर में औरंगजेब की समाधि हटाये जाने के विरोध में हिन्दू संगठनों द्वारा आयोजित प्रदर्शन के दौरान हुए विवाद के बाद मुस्लिम समुदाय ने जिस तरह से हिंसा, आगजनी और पुलिस बल पर हमले की जुर्रत की वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

     संघ के शताब्दि वर्ष में उसकी जन्मस्थली नागपुर के महाल नामक उस इलाके में जहाँ संघ का मुख्यालय हो, मुस्लिम समुदाय ने जिस प्रकार की आक्रामकता प्रदर्शित की वह पूरे देश के हिंदुओं के लिए चेतावनी है। मुसलमानों के किसी भी धर्मगुरु अथवा नेता ने दंगा किये जाने की निंदा नहीं की। दूसरी तरफ हिंदुओं में पिटने के बाद आक्रोश तो है किंतु ये उस चेतावनी को उपेक्षित करने का दुष्परिणाम है जिसमें आगाह किया गया था कि बंटेंगे तो कटेंगे और उस सलाह का भी कि एक हैं तो सेफ हैं।

     नागपुर में संघ की स्थापना भले ही सौ वर्ष पूर्व हुई किंतु यह हिंदुत्व की विचारधारा का गढ़ नहीं बन सका। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद बनवारीलाल पुरोहित के कांग्रेस से आने पर पहली बार भाजपा ने नागपुर लोकसभा सीट जीती किंतु वह जीत आगे न टिक सकी। 2014 में नितिन गडकरी संघ और भाजपा के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने नागपुर लोकसभा सीट पर विजय हासिल की। हालांकि विधानसभा और विधानपरिषद के अलावा नगर निगम में भाजपा को सफलता मिलती रही किंतु कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना ने भी यहाँ की राजनीति में पैर जमाये रखे।

     लेकिन  बीते दशक से विशेष रूप से देवेंद्र फड़नवीस और श्री गडकरी के उभरने के बाद नागपुर में हिंदुवादी राजनीति का दबदबा बढ़ा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उ.प्र के बाद सबसे बड़ा झटका महाराष्ट्र में ही लगा किंतु उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में बाजी पलट गई। कहते हैं संघ ने उस चुनाव में जमीनी काम करते हुए महायुति को ऐतिहासिक सफलता दिलवाई। भाजपा तो अपने दम पर बहुमत की देहलीज तक पहुँच गई। जिसके बल पर एकनाथ शिंदे की जगह श्री फड़नवीस मुख्यमंत्री बन बैठे।

    विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की करारी पराजय ने विपक्षी एकता की जड़ों में मठा डालने का  काम किया और एक ही झटके में शरद पवार, राहुल गाँधी और उद्धव ठाकरे का आभामण्डल फीका कर दिया जो लोकसभा चुनाव के शानदार प्रदर्शन से जरूरत से ज्यादा उत्साहित हो चले थे।

    मुख्यमंत्री बनने के बाद से श्री फ़ड़नवीस हिंदुत्व के मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ के नक्शे कदम पर चलने लगे जिससे मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ ही विपक्ष के पेट में भी मरोड़ होने लगा क्योंकि उनकी राजनीति अस्त होने पर आ गई। इसी दौरान छत्रपति  संभाजी के जीवन पर बनी फिल्म छावा के प्रदर्शित होते ही समूचे महाराष्ट्र में मुगल बादशाह औरंगजेब के प्रति अभूतपूर्व गुस्सा जागा और  संभाजी नगर ( पूर्व में औरंगाबाद) में बनी औरंगजेब की कब्र हटाये जाने की मांग जोर पकड़ने लगी ।

     इसी सिलसिले में नागपुर में हिन्दू संगठनों द्वारा किए गए प्रदर्शन में  एक कृत्रिम कब्र बनाकर उसमें घास - फूस भरकर एक कपड़ा ढँककर आग लगा दी गई। लेकिन कुछ लोगों ने ये अफवाह फैला दी कि वह कपड़ा एक चादर थी जिस पर कुरान की आयतें लिखी हुई थीं। इसके बाद मुस्लिम समुदाय ने वह सब किया जो दंगे के दौरान किया जाता है। आगजनी, लूटपाट और  वाहनों में तोडफ़ोड़ के जरिये हिंदुओं के इलाके में जमकर उपद्रव किया गया। यहाँ  तक कि पुलिस कर्मियों तक पर जानलेवा हमले हुए।

        नागपुर के लिए ये दंगा एक नया अनुभव था। मुख्यमंत्री का गृहनगर और संघ का मुख्यालय होने से हिन्दू समुदाय ने सोचा भी नहीं था कि मुसलमान इस तरह से हमलावर होकर उनकी जान - माल के लिए खतरा बन जाएंगे।

        दंगे से मुख्यमंत्री की साख और संघ की धाक पर सवाल उठने लगे । इसीलिए श्री फड़नवीस ने योगी शैली अपनाते हुए बड़े पैमाने पर दंगाइयों की गिरफ्तारी करने के बाद उनसे मुआवजा वसूलने और बुलडोजर चलाने की कारवाई शुरू कर दी। दंगे के पीछे बाँग्ला देश का हाथ होने की आशंका जताये जाने के बाद जाँच का दायरा बढ़ा दिया गया है ।

    लेकिन इस बारे में मुस्लिम समुदाय बजाय खेद जताने के अभी भी आक्रामक अंदाज दिखा रहा है। अनेक मौलवी सोशल मीडिया पर इसे पहली झाँकी बताते हुए भविष्य में इससे भी सख्त कारवाई करने की धमकी दे रहे हैं।

हालांकि मुख्यमंत्री इस मामले में काफी सख्त हैं किंतु नागपुर में मुस्लिम समुदाय के आक्रामक रवैये को देखते हुए संघ को भी सतर्क होना पड़ रहा है। क्योंकि इस दंगे से मुस्लिम समुदाय का जो हौसला बढ़ा है उसके बाद संघ के शताब्दि समारोह के आयोजनों में भी व्यवधान की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

-रवीन्द्र वाजपेयी

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