Thursday, 20 March 2025

हर मोर्चे पर असफल साबित हो रहे डोनाल्ड ट्रम्प


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दूसरी पारी की शुरुआत में जो तेजी दिखाई वह  धीमी पड़ने लगी है। समूची दुनिया को अपनी  उगलियों पर नचाने की उनकी मंशा कारगर नहीं होती नहीं लगती। न तो वे चीन और भारत को टैरिफ के मामले में झुका पाए और न ही संकट में फंसा यूक्रेन ही उनसे भयभीत होकर नत मस्तक हुआ। रूस और उसके बीच जारी युद्ध को रोकने के लिए उन्होंने जितनी भी कूटनीतिक उठापटक की वह अब तक तो हवा - हवाई ही है। न तो यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की उनके द्वारा सुझाए गए समाधान से सहमत हैं और न ही रूस के राष्ट्रपति पुतिन अपने अमेरिकी समकक्ष की बात मानने को राजी दिखते हैं। ट्रम्प के दबाव में इजरायल और हमास के बीच हुआ युद्धविराम भी दम तोड़ रहा है। अपने निकटस्थ पड़ोसी कैनेडा को दबा पाने में भी वे  विफल रहे जबकि ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर काबिज होने की धमकी भी धूल में लाठी पटकने जैसी साबित हो रही है। मेक्सिको एवं अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों पर जो दबाव पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने बनाया था वह भी असरकारक नहीं हुआ। सबसे अधिक विफलता ट्रम्प को मिली आर्थिक मोर्चे पर क्योंकि आयात शुल्क बढ़ाकर अमेरिका के हित सुरक्षित रखने के नाम पर लिए गए निर्णय फिलहाल तो अमेरिकी जनता के लिए नुकसान का सौदा साबित हो रहे हैं। आयातित वस्तुओं के महंगे होने के भय से महंगाई बढ़ने लगी है। दूसरी तरफ अमेरिका के विश्वस्त सहयोगी यूरोपीय देश उससे छिटककर आर्थिक और सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर होने के लिए कमर कसने लगे हैं। फ्रांस ने उन्हें परमाणु सुरक्षा उपलब्ध करवाने का आश्वासन देकर अमेरिकी प्रभुत्व को खंडित करने का दांव चल दिया है। वैसे भी यूक्रेन को जिस तरह ट्रम्प ने मझधार में छोड़ दिया उसके बाद समर्थक देश चौकन्ने  हैं। प्रारंभ में चीन के प्रति बेहद कड़ा रवैया दिखाने वाले ट्रम्प की अकड़ उस समय ढीली पड़ गई जब राष्ट्रपति जिनपिंग ने भी टैरिफ बढ़ाये जाने का जवाब उन्हीं की शैली में दिया और तब लचीले अंदाज में ट्रम्प उन्हें अपना दोस्त बताने लगे। उसके बाद से ही आशंका  व्यक्त की जाने लगी कि वे जिस तरह से यूक्रेन पर रूस द्वारा कब्जाए इलाके उसे सौंपकर युद्धविराम हेतु दबाव डाल रहे हैं उसी तरह जिनपिंग से दोस्ती निभाने के फेर में ताईवान पर चीन के दावे को भी मान्य न कर लें। जापान भी आशंकित  है कि उसके जिन समुद्री द्वीपों पर चीन अपना आधिपत्य जमाना चाहता है उन्हें छोड़ने के लिए अमेरिका उसे मजबूर न करने लगे। इस तरह की आशंकाएँ अमेरिका पर आश्रित अन्य देशों के मन में भी हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के उपरांत बनी वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका चौधरी बनकर उभरा। सोवियत संघ चूंकि साम्यवाद को अपना चुका था लिहाजा  ज्यादातर लोकतांत्रिक देश अमेरिका की छत्रछाया में खड़े हो गए। अमेरिका दुनिया भर में हो रही लड़ाइयों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी करता रहा है । जिसके कारण उस पर आर्थिक बोझ बढ़ता गया। उसके  समुद्री बेड़े और वायुसैनिक अड्डे भी विश्व भर में हैं। आर्थिक संपन्नता और सैन्यबल के दम पर वह पूरी दुनिया का रिंग मास्टर बन बैठा । लेकिन इसके बाद भी वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान ऐसे देश हैं जहाँ उसकी सामरिक शक्ति काम नहीं आई और अपमानित होकर मैदान छोड़ना पड़ा। दूसरी बार राष्ट्रपति बनते ही ट्रम्प इस स्थिति से अमेरिका को बाहर निकालने में जुट गए हैं। यूक्रेन से वे युद्ध में की गई मदद की कीमत मांग रहे हैं। वहीं यूरोपीय देशों को ठेंगा दिखाते हुए संदेश दे दिया कि वे पूरी तरह अमेरिका के भरोसे रहने की आदत छोड़ दें। कुल मिलाकर ट्रम्प बजाय एक राष्ट्राध्यक्ष  के बजाय एक  व्यापारी की तरह व्यवहार कर रहे हैं। लेकिन दशकों से चली आ रही नीतियों को एक झटके में बदल देने की उनकी शैली विदेशों में तो छोड़ दें उनके अपने देश तक में लोगों के गले नहीं उतर रही। कहाँ तो अमेरिका बेगानी शादी में अब्दुल्ला बनने पर आमादा रहता था और कहाँ वह अपना पल्ला झाड़ने की नीति पर चलने लगा। इससे उसकी साख और धाक दोनों प्रभावित हो रही हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद जबसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का दौर आया तभी से अमेरिका का प्रभाव बढ़ा। यहाँ तक कि चीन तक को पूंजी आधारित आर्थिक शैली स्वीकार करनी पड़ी। लेकिन ट्रम्प की अमेरिका प्रथम नीतियाँ उसे अलग - थलग करने का काम कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और पैरिस जलवायु संधि से हटने के बाद वे  सं .रा. संघ को भी अलविदा कहने के संकेत दे रहे हैं। इन सब कारणों से उनकी छवि एक अस्थिर दिमाग वाले सनकी शासक जैसी बन गई  है। घरेलू और विदेशी दोनों मोर्चों पर उनकी असफलता सामने आ चुकी  है। जो बाइडेन को अब तक का सबसे बुरा और विफल राष्ट्रपति बताने वाले ट्रम्प महज दो  महीने में फुस्स होते लग रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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