Monday, 17 March 2025

मऊगंज की घटना में छिपे हैं भविष्य के खतरे

म.प्र के रीवा संभाग में मऊगंज जिले के गड़रा गाँव में बीते शनिवार को जो घटना घटी वह बड़े खतरे का संकेत है। विंध्यप्रदेश कहलाने वाले इस इलाके में जातिवाद  आज भी बदस्तूर जारी है जिसे राजनीति ने बढ़ावा देकर कटुता में बदल दिया। दो माह पूर्व एक आदिवासी युवक की दुर्घटना में मौत पर इस समुदाय ने आरोप लगाया कि वह दुर्घटना नहीं अपितु हत्या थी। आदिवासी समुदाय ने एक ब्राह्मण युवक पर आरोप लगाया जिसे जांच के बाद पुलिस ने निर्दोष बता दिया। इस बात से आदिवासी वर्ग में गुस्सा था। गत शनिवार को उस युवक को आदिवासियों द्वारा बंधक बनाये जाने की खबर मिलते ही तहसीलदार सहित पुलिस बल वहाँ पहुंचा किंतु उसके पूर्व बंधक युवक की पीट - पीटकर हत्या की जा चुकी थी।  प्रशासन और पुलिस की  टीम को देखते ही आदिवासियों  ने उन पर भी हमला  कर दिया। तहसीलदार की कई हड्डियाँ टूट गईं वहीं पुलिस का एक ए.एस.आई उस हमले में जान से हाथ धो बैठा। उक्त वारदात के बाद पुलिस और प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने घटना स्थल का दौरा कर पूरे गाँव को छावनी बना दिया। मृतक पुलिस कर्मी को शहीद का दर्जा देकर उसके परिजनों को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 1 करोड़ रुपये देने की घोषणा कर दी। हत्या के आरोपियों में से कुछ गिरफ्तार हो गए हैं। मुख्यमंत्री ने इस घटना पर गंभीर कारवाई करने की बात कही है। पुलिस महकमा भी अपने एक साथी की नृशंस हत्या से शोकमग्न है। होली के त्यौहार पर मऊगंज के उक्त गाँव में खून की जो होली खेली गई उसे महज आपसी रंजिश मान लेना सच्चाई से आँख मूंद लेना होगा। आदिवासी समुदाय ने अपने एक सदस्य  की मौत को हत्या मानकर उसके आरोपी उच्च जाति के युवक की हत्या की होती तब वह प्रतिशोध से प्रेरित कृत्य माना जाता किंतु उसके बाद वहाँ पहुंचे प्रशासन और पुलिस के दस्तों पर किया गया जानलेवा हमला यह दर्शाता है कि पूरी घटना पूर्व नियोजित थी। हत्या के आरोपी ब्राह्मण युवक का अपहरण करने के बाद उसकी हत्या जैसा कार्य आदिवासी समुदाय के स्वभाव से मेल नहीं खाता। शहरी माहौल के संपर्क में आने के बावजूद आज भी   आदिवासी शांत स्वभाव के माने जाते हैं जिनमें आपराधिक प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम ही है। लेकिन मऊगंज की घटना ने  गिरोहबंदी का एहसास तो कराया ही किंतु ऐसा लग रहा रहा है कि कोई अदृश्य शक्ति उन्हें भड़काने में लगी रही जिसके कारण दोहरी हत्याओं जैसा हादसा हो गया। उ.प्र की सीमा  से सटे इस क्षेत्र  में आदिवासी आबादी काफी अधिक है। विधानसभा और लोकसभा की कुछ सीटें  उनके लिए आरक्षित हैं। ये देखते हुए ऐसा माना जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कमजोर पड़ने  के बाद नक्सली ताकतें अब नये इलाकों में अपने पैर जमाना चाह रही हैं। विंध्यप्रदेश में अगड़ी - पिछड़ी जातियों के बीच संघर्ष का इतिहास रहा है। दलित राजनीति ने भी यहाँ अपना असर दिखाया है जिसके चलते अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज अपने प्रभावक्षेत्र सतना से लोकसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर लुढ़क गए थे। इस इलाके में सामंतवादी मानसिकता के अवशेष आज भी मौजूद हैं। नक्सली विचारधारा के लिए ये वातावरण पूरी तरह अनुकूल है। मऊगंज की घटना को इसी कोण से देखा जाना चाहिए। हत्यारे आदिवासियों को पकड़कर उन्हें तो दंडित  किया ही जाए किंतु इतने मात्र से इस इलाके में हिंसा की आग को फैलने से नहीं रोका जा सकेगा । इसलिए खुफिया विभाग को इस वारदात की तह में जाकर नक्सलियों की भूमिका की सूक्ष्म जानकारी हासिल कर अभी से उनकी रोकथाम की व्यवस्था करनी चाहिए। म.प्र के कुछ आदिवासी बहुल जिले नक्सल प्रभावित हैं। लेकिन मऊगंज की घटना बस्तर में नक्सलियों द्वारा की गई नृशंस हत्याओं जैसी ही है । इसलिए इस ज़हर को फैलने से पहले ही रोकना होगा। वरना प्रतिशोध की आग पड़ोसी जिलों में भी भड़क सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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