Saturday, 29 March 2025

दुनिया के साथ - साथ पडोस में बदलते हालात में भारत को सतर्क रहना होगा


दुनिया भर में इस समय उथल पुथल मची है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग रुकने का नाम नहीं ले रही। उधर डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका अपने पड़ोसी कैनेडा और मेक्सिको के अलावा यूरोप के अपने पुराने साथी देशों के साथ पंगा ले रहा है। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ट्रम्प की धमकी से तनाव बढ़ता जा रहा है । ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के बीच बढ़ते तालमेल से कूटनीतिक संतुलन में बड़े बदलाव की आहट सुनाई दे रही है। प. एशिया में भी भारी उथलपुथल है। ट्रम्प के दबाव में भले ही इसरायल और हमास के  बीच कुछ समय के लिए युद्धविराम हो गया और युद्ध बंदियों की रिहाई भी दोनों तरफ से हुई किंतु इसरायल ज्यादा देर तक धैर्य नहीं रख सका और गाजा पट्टी में बारूद की वर्षा फिर शुरू कर दी। ट्रम्प द्वारा गाजा पर कब्जा कर उसका विकास किये जाने की बात से भी दुनिया भौचक है। उधर गाजा में हमास के विरुद्ध जनता के सड़कों पर उतरने से प. एशिया के हालात में चौंकाने वाला बदलाव आने की अटकलें लगने लगी हैं। इधर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी दिन ब दिन गंभीर होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान ने सीमांत इलाकों में पाकिस्तान को युद्ध जैसी स्थिति में उलझा रखा है वहीं बलूचिस्तान ने आजादी के लिए निर्णायक लड़ाई छेड़ दी है। उसे देखते हुए पाक अधिकृत कश्मीर में भी पाकिस्तान के विरुद्ध गुस्सा बढ़ता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर तेजी से चल रहे घटनाचक्र से भारतीय विदेश नीति के साथ ही अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। ट्रम्प द्वारा आयात शुल्क बढ़ाये जाने के फैसले से भारत के निर्यात पर क्या असर पड़ेगा इसका आकलन किया जा रहा है किंतु कूटनीतिक मोर्चे पर जिस तरह की अनिश्चितता है उसके बीच भारत को अपना महत्व बनाये रखना आसान नहीं होगा। विशेष रूप से ट्रम्प और पुतिन के बीच नजदीकी से भारत और रूस के बीच चल रही जुगलबंदी में व्यवधान न आये ये चिंता बढ़ने लगी थी किंतु पुतिन के जल्द भारत आने की खबर राहत लेकर आई है जो यूक्रेन जंग के बाद पहली बार रूस से बाहर किसी देश की यात्रा करेंगे। खबर तो ये भी है कि भारत उस युद्ध को खत्म करवाने का माध्यम बन सकता है। लेकिन इस सबके बीच हमारे पड़ोस में हो रही घटनाएं भी नये समीकरणों का संकेत हैं।  पाकिस्तान में गृह युद्ध रूपी ज्वालामुखी बरसों से सुलग रहा था जो अब फटने की स्थिति में आ गया है। वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्ता पलट होने को भारत की रणनीतिक पराजय मानने वालों को बीते कुछ दिनों में वहाँ अंतरिम सरकार के विरुद्ध शुरू हुए छात्र आंदोलन ने अपनी धारणा बदलने मजबूर कर दिया है। ये वही छात्र हैं जिनके उग्र संघर्ष ने हसीना को देश छोड़ने बाध्य कर दिया था। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाईडन उस तख्ता पलट के सूत्रधार थे। जो अंतरिम सरकार ढाका में बनी उसके मुखिया बनाये गए युनुस उसके पहले तक अमेरिका में निर्वासित जीवन बिता रहे थे। हसीना को शरण देने से बांग्लादेश के साथ हमारे रिश्ते दुश्मनी में बदल गए। वहाँ रह रहे हिंदुओं पर जिस तरह के अमानुषिक अत्याचार हुए वे उसी की प्रतिक्रिया थी। लेकिन ट्रम्प ने  सत्ता में आते ही बांग्लादेश को उसके हाल पर छोड़ दिया जिसके कारण उसकी आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई है। धनाभाव में उत्पादन इकाइयां  बन्द होने से लाखों श्रमिक बेरोजगार हो गए। निर्यात  बुरी तरह प्रभावित होने से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। जो संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार शेख हसीना की सत्ता में वापसी की जमीन तैयार होने लगी है। और ऐसा हुआ तब भारत द्वारा बांग्लादेश के प्रबल विरोध के बावजूद  उनको पनाह देने का औचित्य साबित हो जाएगा। लेकिन  सबसे ताजा खबर आ रही है पड़ोसी नेपाल से जहाँ माओवादियों के कुशासन से ऊब चुकी जनता हिन्दू राजशाही की वापसी के साथ पूर्व महाराजा ज्ञानेंद्र सिंह की ताजपोशी के लिए सड़कों पर उतर रही है। इस प्रकार हमारे तीनों प्रमुख पड़ोसियों के यहाँ भारत विरोधी सत्ताधीशों के विरुद्ध जन असंतोष खुलकर सामने आ चुका है जो परोक्ष तौर पर चीन का भी विरोध है। यदि बलूचिस्तान और खैबर पख्तून इलाके पाकिस्तान के हाथ से  निकले तब पाक अधिकृत कश्मीर के भी भारत के साथ जुड़ने की संभावना मजबूत होने लगेगी। इसी तरह बांग्लादेश में शेख हसीना और नेपाल में राजशाही यदि लौटती है तो भारत की स्थिति एशिया में और सुदृढ़ हो जायेगी क्योंकि तब चीन के साथ केवल उत्तर कोरिया जैसा देश रह जायेगा। हालांकि वैश्विक स्थिति में जो अनिश्चितता है उसे देखते हुए कुछ भी कह पाना कठिन है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि पलड़ा भारत के पक्ष में झुकता प्रतीत हो रहा है। मालदीव और श्रीलंका में जो सत्ता परिवर्तन हुआ उसे शुरुआत में भारत विरोधी माना गया किंतु जल्द ही वहाँ के शासकों के सिर से चीन का भूत उतर गया। इस सबके बावजूद ये समय बेहद सतर्कता का है क्योंकि मौजूदा विश्व किसी विचारधारा से प्रेरित होने के बजाय व्यापार से प्रभावित है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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