अलाहाबाद उच्च न्यायालय का एक फैसला पूरे देश में आलोचना का विषय बना हुआ है जिसमें कहा गया कि पीड़िता के प्राइवेट पार्ट्स को छूना और पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार या उसकी कोशिश में नहीं गिना जा सकता। हालाँकि फैसले में उसे गंभीर यौन हमले के तहत माना गया है। प्रकरण उत्तर प्रदेश के कासगंज इलाके का है। वर्ष 2021 में एक नाबालिग लड़की को धोखे से पुलिया के नीचे लाकर कुछ लोगों ने उसके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया । उसी दौरान कुछ लोग आ गए तो वे भाग गए। लड़की के परिजनों ने रिपोर्ट की तो जिन दो लोगों पर बलात्कार और पास्को एक्ट में मामला दर्ज हुआ उन्हें निचली अदालत ने जो समन भेजा उसको उन्होंने उच्च न्यायालय में चुनौती दी जिसने यौन उत्पीड़न की बात तो मानी किंतु लड़की के वक्ष स्थल को दबाने तथा पायजामे का नाड़ा तोड़ने को बलात्कार या उसकी कोशिश मानने से इंकार कर दिया। उस फैसले की पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। महिला संगठनों के अतिरिक्त राजनीतिक नेताओं सहित विभिन्न वर्गों द्वारा उसकी निंदा की जा रही है। उक्त फैसले पर बड़ी पीठ क्या रुख अख्तियार करती है ये तो अभी स्पष्ट नहीं है किंतु जिन न्यायाधीश महोदय ने उक्त फैसला दिया उनकी मानसिक स्थिति का परीक्षण किया जाना चाहिए। किसी नाबालिग बालिका को धोख़े से सुनसान जगह में लाकर उसके वक्षस्थल को स्पर्श करने के साथ ही पायजामे का नाड़ा तोड़ना भी यदि बलात्कार नहीं है तो उसे क्या कहा जाए , ये बड़ा सवाल है। उल्लेखनीय है 14 सेकंड तक लड़कियों को घूरना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 354 सी के तहत सजा का विधान है। आरोप सिद्ध होने पर व्यक्ति को पहली बार में एक साल से तीन साल तक की सजा हो सकती है। निर्भया कांड के बाद महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए कानून को और भी कड़ा किया गया। इसके अंतर्गत उसे गलत इरादे से घूरना, स्पर्श करना, पीछा करना जैसे कृत्य दंडनीय अपराध में शामिल हो गए हैं। ये देखते हुए एकल पीठ के न्यायाधीश राम मनोहर नारायण मिश्र का निर्णय किसी भी समझदार व्यक्ति के गले नहीं उतरेगा। संदर्भित प्रकरण में आरोपियों द्वारा लड़की के साथ जो कुछ भी किया गया उसके अगले चरण में वे जो करते इसका अनुमान सहज तौर पर ही लगाया जा सकता है। वो तो बालिका का भाग्य अच्छा था जो वहाँ से गुजर रहे कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए उसको बचा लिया और आरोपी भाग खड़े हुए। न्यायाधीश महोदय के विधिक ज्ञान को चुनौती देना तो अर्थहीन है किंतु उनके परिवार में भी तो बेटी होगी। और न भी हो तब भी सामाजिक मान - मर्यादा और संस्कारों का कुछ तो ज्ञान उन्हें होगा ही। कानून की व्याख्या अलग - अलग तरीकों से की जाती है। अधिवक्ता गण अपने मुवक्किल के बचाव में तरह - तरह की दलीलें पेश करते हैं किंतु न्याय की आसंदी पर विराजमान न्यायाधीश अपने ज्ञान, और अनुभव के आधार पर नीर - क्षीर विवेक का परिचय देते हुए फैसला करते हैं। लेकिन उक्त न्यायाधीश ने मामले का जितना सतही विश्लेषण किया उससे उनकी प्रतिष्ठा तो तार - तार हुई ही देश की न्यायिक व्यवस्था की दुर्दशा भी उजागर हुई है। आरोपियों के कुकृत्य को बलात्कार की कोशिश न मानना इस तरह का अपराध करने वालों के हौसले और बुलंद करेगा। हालांकि ये सही है कि कानून बनाने मात्र से अपराध नहीं रुकते । वरना निर्भया कांड के बाद सख्त कानून बन जाने से दुष्कर्म की घटनाएं बंद हो जातीं या कम होतीं किंतु हुआ उसके विपरीत। लेकिन जिस व्यक्ति को न्यायमूर्ति कहा जाता है वे दुष्कर्म के प्रयास को बलात्कार की श्रेणी में रखने से इंकार करने का कोई अन्य कारण बताते तब शायद उनकी इतनी तीखी आलोचना नहीं हुई होती। इस फैसले के बारे में सर्वोच्च न्यायालय को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहिए क्योंकि एकल पीठ ने आरोपियों को जिस आधार राहत दी वह किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं है। साधारण बुद्धि वाला भी ये कहेगा कि आरोपी युवकों द्वारा नाबालिग बालिका के शरीर को जिस प्रकार स्पर्श किया गया और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की उसके पीछे उनकी मंशा बलात्कार करने की ही थी। भले ही वे उसमें कामयाब न हो सके किंतु अपराध करने की इच्छा ही उसके लिए दिये जाने वाले दंड का आधार होती है जिसे उक्त न्यायाधीश ने नजरंदाज कर दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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