Tuesday, 18 March 2025

औरंगजेब की कट्टरता और अत्याचारों का पर्दाफ़ाश समय की मांग



मुगल शासक औरंगजेब को लेकर देश में विवाद चल पड़ा है। उसके अत्याचारों के किस्से  सुर्खियां बने हुए हैं। कुछ हिन्दू संगठनों द्वारा महाराष्ट्र में बनी उसकी कब्र हटाने की मांग उठाए जाने पर राजनीतिक विवाद भी उठ खड़ा हुआ है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना  कब्र हटाने के विरोध में खड़ी   है। गत रात्रि नागपुर में इसी मुद्दे पर हिन्दू संगठनों  और मुस्लिम समुदाय में हुए विवाद ने सांप्रदायिक तनाव का रूप ले लिया। इस मुद्दे  के पक्ष - विपक्ष में जो बहस हो रही हैं उसमें ये देखकर दुख होता है कि देश के इतिहास को विकृत करने वाला वर्ग उस औरंगजेब के बचाव में खड़ा हुआ है जो  अन्य मुगल शासकों की तुलना में सर्वाधिक अत्याचारी माना जाता था। उसके सुदीर्घ शासनकाल में हिंदुओं के धर्मस्थलों का जो विध्वंस हुआ वह सर्वविदित है। हिंदुओं पर जजिया कर थोपने वाले औरंगजेब में इस्लामिक कट्टरता कूट- कूटकर भरी थी। अपने तीन भाईयों को मरवाने वाले औरंगजेब ने अपने पिता को कैद करने में भी संकोच नहीं किया। हालांकि उसके पूर्ववर्ती मुगल शासकों ने भी हिंदुओं के धर्मस्थल तोड़ने और उन पर अत्याचार करने में कोई  कमी नहीं की। यहाँ तक कि जिस अकबर  को  सर्वधर्म सद्भाव का प्रतीक बताकर महान बताया जाता रहा उसने भी हिन्दू राजाओं को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए आक्रामक रुख अपनाया। अय्याशी के मामले में तो ज्यादातर मुगल बादशाह विशेष रूप से शहजादे कुख्यात रहे। लेकिन औरंगजेब उन सभी में सबसे बड़ा सतालोलुप और हिंदुओं का विरोधी रहा। हिंदुओं के साम्राज्य की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी ने उसके सामने झुकने से इंकार किया तब उसने उन्हें बातचीत के लिए बुलाकर कैद तक कर लिया ।  लेकिन चूंकि  शिवाजी केवल वीर ही नहीं बल्कि चतुर भी थे इसीलिए वे उसकी कैद से निकलने में कामयाब हो गए। गोहत्या को बढ़ावा देकर  औरंगजेब ने सनातन धर्मियों को आतंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। औरंगजेब के दबाव में जब सिखों के अति सम्मानित गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया तो दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका सिर काट दिया गया। इसी तरह उनके यशस्वी पुत्र गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों में से दो मुगलों की सेना से लड़ते शहीद हुए वहीं दो को जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया। ये नितांत दुख का विषय है कि ऐसे अत्याचारी हिन्दू विरोधी मुगल शासक का बचाव करने हिंदुओं के बीच से ही एक वर्ग महज इसलिए खड़ा हो गया है जिससे मुस्लिम समाज को खुश किया जा सके। औरंगजेब को अति धार्मिक मानकर उसे  महिमा मंडित करने का प्रयास करने वाले इस वर्ग में वे इतिहासकार भी हैं जो मुगलकाल को भारत का स्वर्णयुग साबित करने में जुटे रहे। लेकिन जैसे ही उनके प्रयासों पर रोक लगी उनका विलाप शुरू हो गया। ऐसे में जिस औरंगजेब की इस्लामिक कट्टरता और हिन्दू विरोधी नीतियों ने पूरे देश को आतंकित किया उसके  समर्थन में खड़े लोगों को हिन्दू विरोधी मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है। सनातन विरोधी मानसिकता वाले कुछ बुद्धिजीवी भी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर जिस तरह औरंगजेब की तरफदारी में जुट गए हैं उसके कारण  हिन्दू समाज में गुस्सा पैदा होना स्वाभाविक है। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म छावा में छत्रपति शिवाजी के पुत्र संभाजी के साथ औरंगजेब द्वारा की गई हैवानियत के दृष्य देखने के बाद तो गुस्सा और बढ़ता जा रहा है। इस्लाम स्वीकार न करने पर संभाजी के शरीर के विभिन्न अंगों को  काट - काटकर जिस तरह तड़पाकर मारा गया उसके बाद भी औरंगजेब की वकालत करना मानवीयता के विरुद्ध किसी अपराध से कम नहीं है। ये सौभाग्य का विषय है कि सनातनी शक्तियाँ  सही इतिहास को समाज के सामने रखने के लिए कटिबद्ध हो चुकी हैं।   देश की नई पीढ़ी को हिंदुओं के गौरवशाली अतीत और सनातन धर्म के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले वीरों की जीवन गाथा से अवगत कराना राष्ट्रीय आवश्यकता है। अकबर की महानता और औरंगजेब की धार्मिकता के बजाय उनकी इस्लामिक कट्टरता का पर्दाफाश देशहित में जरूरी है क्योंकि वे हमारे इतिहास के खलनायक हैं जबकि महाराणा प्रताप, गुरु तेगबहादुर, गुरु गोविंद सिंह, छत्रपति शिवाजी और संभाजी वास्तविक महानायक हैं ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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