Monday, 10 March 2025

कांग्रेस को कोई और नहीं हराता बल्कि वह खुद को हराती है


गुजरात प्रवास के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने स्वीकार किया कि हम जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे । इसी के साथ वे बोल गए कि गुजरात में कांग्रेस के दो गुट हैं जिनमें एक भाजपा को जिताने का काम करता है। उन्होंने ऐसे लोगों को निकालने का सुझाव भी दिया। उल्लेखनीय है गुजरात भाजपा का अभेद्य गढ़ बन चुका है। हाल ही में संसद में बोलते हुए श्री गाँधी ने  कहा था कि अगली बार गुजरात में कांग्रेस उस गढ़ को ढहा देगी। पिछले विधानसभा चुनाव में वहाँ कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब  प्रदर्शन किया था । लेकिन गुजरात में भाजपा को हराने के उनके  सपने पर हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की हार ने पानी फेर दिया। लोकसभा में कांग्रेस को मिली सफलता का श्रेय लूटने वाले राहुल उक्त तीन राज्यों के परिणामों की जिम्मेदारी लेने के बजाय बलि के बकरे तलाशने में जुटे  हैं । जहाँ तक बात गुजरात की है तो अतीत में कांग्रेस ने ही भाजपा में तोडफ़ोड़ करते हुए शंकर सिंह वाघेला को अपने पाले में खींचा और केंद्र में मंत्री बनाया। पटेल आरक्षण का आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल को तो श्री गाँधी ही कांग्रेस में लाये थे। गुजरात  कांग्रेस में भाजपा समर्थक तत्व घुसे हैं ये दिव्यज्ञान उन्हें अचानक कैसे हो गया ये रहस्यमय है। हालांकि उनके बयान के बाद अनेक राज्यों से कांग्रेसजन उन लोगों को पार्टी से बाहर करने की मांग करने लगे जिन्हें कमल छाप कांग्रेसी कहा जाता है। म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने तो श्री गाँधी के बयान के बाद  ये कहकर पार्टी को कठघरे में खड़ा कर दिया कि जब वे म.प्र के मुख्यमंत्री थे तब गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान उनसे कहा गया था कि रा.स्व.संघ के विरुद्ध न बोलें अन्यथा हिन्दू मतदाता नाराज हो जाएंगे। उल्लेखनीय है श्री सिंह  अपने बयानों से पहले भी कांग्रेस को मुसीबत में डाल चुके हैं। 2003 में जब  जनता ने उन्हें म.प्र की सत्ता से उखाड़ फेंका तो उसके बाद उनके अनुज लक्ष्मण सिंह सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा करते हुए भाजपा में चले गए और राजगढ़ से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। बाद में वे फिर कांग्रेस में लौट आये। अभी भी वे  पार्टी नेतृत्व को परेशानी में डालने वाले मुद्दे छेड़ा करते हैं। देखना है उनके बड़े भाई उन्हें पार्टी से निकालने की मांग करते हैं या नहीं ? वैसे श्री सिंह ने अपने विधायक पुत्र को बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से जोड़ दिया है जो खुलकर हिन्दू राष्ट्र की बात करते हैं। कांग्रेस का एक तबका तो कमलनाथ पर भी भाजपा से मिले होने का आरोप लगाया करता है। ये बात भी राजनीतिक गलियारों में चर्चित रही है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा में  प्रचार हेतु कभी नहीं आए। बहरहाल श्री गाँधी ने कांग्रेस का शुद्धिकरण करने की जो बात कही उसको जमीन पर उतारना आसान नहीं है। आजकल भाजपा के बारे में ये कटाक्ष आम हो चला है कि कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाते - लगाते वह कांग्रेस युक्त भाजपा हो गई। लेकिन अब भारतीय राजनीति में विचारधारा का महत्व दिन ब दिन कम होता जा रहा है। क्षणिक लाभ के लिए किसी भी नेता को पार्टी में शामिल करने में संकोच नहीं किया जाता। राहुल भाजपा समर्थक तत्वों को बाहर करने की बात कहते समय भूल गए कि उन्हें सबसे पहले पप्पू कहकर संबोधित करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू को कांग्रेस में लाने में उनकी भूमिका थी। दरअसल सिद्धू को लाकर वे कैप्टन अमरिंदर सिंह को कमजोर करना चाह रहे थे। इसीलिए उनको पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। उस निर्णय का दुष्परिणाम ये हुआ कि अमरिंदर और सिद्धू की लड़ाई में कांग्रेस का भट्टा बैठ गया। इसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा को मोदी मंत्रीमंडल में जगह नहीं मिली तो कांग्रेस ने उनके लिए दरवाजे खोल दिये और पटना साहिब लोकसभा सीट से टिकिट भी दी किंतु हारने के बाद शत्रुघ्न तृणमूल कांग्रेस में घुसकर लोकसभा में आ गए। बेहतर हो श्री गाँधी ये स्वीकार करें कि कांग्रेस अपनी वैचारिक पहिचान खोने की वजह से जनता का विश्वास खो बैठी।  कुछ वर्ष पूर्व गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले अचानक उनके ब्राह्मण होने और यज्ञोपवीत धारण करने का ढोल बजाया गया। श्री गाँधी खुद को शिवभक्त साबित करने मानसरोवर तक हो आये किंतु उसके बाद भी वे जनता का भरोसा नहीं जीत सके क्योंकि उनकी विचारधारा स्पष्ट नहीं हैं। चुनाव प्रचार की शुरुआत अयोध्या में हनुमान गढ़ी से करने वाले राहुल आज तक राम मंदिर का दर्शन करने नहीं गए। करोड़ों  सनातनियों की आस्था के प्रतीक कुम्भ में जाने की जरूरत भी उन्हें महसूस नहीं हुई। ये सब देखते हुए बेहतर तो यही होगा कि वे कांग्रेस में बजाय व्यक्तिगत निष्ठा रखने वालों के उन युवाओं को आगे बढ़ाएं जो पार्टी के लिए प्रतिबद्ध हों। घिसी - पिटी नीतियों को ढोकर वे कांग्रेस के अच्छे दिन नहीं ला सकते। पार्टी से भाजपा समर्थकों को निकालने की बात कहने के पहले उनको इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि वामपंथी कन्हैया कुमार को क्या सोचकर वे पार्टी में लाए जिनके नेतृत्व में जेएनयू में भारत विरोधी नारे गूंजते थे। दिग्विजय सिंह के इस खुलासे का भी जवाब कौन देगा कि उन्हें संघ के विरुद्ध बोलने से रोका गया। दिल्ली के अजय माकन की पीड़ा को सुनने वाला भी कांग्रेस में कोई नहीं है जिन्हें अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध पत्रकार वार्ता करने से रोक दिया गया। सही बात ये है कि कांग्रेस को कोई और नहीं हराता बल्कि वह खुद को  हराती है क्योंकि उसके पास नेतृत्व और नीतियों दोनों का संकट है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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