सस्ती चिकित्सा दिन ब दिन दुर्लभ होती जा रही है। सरकारी अस्पताल आम जनता को समय पर इलाज और दवाइयाँ देने में अक्षम साबित हुए हैं। उनमें चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की कमी से मरीज परेशान होते हैं। जाँच सुविधाओं का भी अभाव है। वहीं एक्सरे जैसी मामूली मशीनें तक खराब रहती हैं। सरकार को जब लगा कि वह चाहकर भी इस स्थिति को सुधार नहीं सकती तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयुष्मान भारत योजना के जरिये गरीब तबके को 5 लाख तक का इलाज निजी अस्पतालों में भी निःशुल्क करवाने की सुविधा दे दी । गत वर्ष 70 साल पूरे कर चुके सभी वरिष्ट नागरिकों को भी इस योजना में शामिल कर लिया गया, चाहे वे किसी भी आय वर्ग के हों। कुछ राज्य सरकारों ने तो 25 लाख तक के इलाज जैसी घोषणाएं भी कीं। यदि सरकारी अस्पताल पूरी तरह सक्षम होते तब शायद आयुष्मान भारत जैसी योजना की जरूरत नहीं होती । यही वजह है कि इस योजना ने लाभार्थियों को तो जबरदस्त सहारा दिया किंतु निजी अस्पतालों पर इसके माध्यम से जो धनवर्षा हुई वह अकल्पनीय है। फर्जीवाड़े करते हुए भी जमकर कमाई की गई। सरकार का सोचना है उसे अपना चिकित्सा ढांचा खड़ा करने में लंबा समय और धन खर्च करना पड़ेगा इसलिए उसने आयुष्मान भारत जैसी योजना लाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। हालांकि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सभी राज्यों में एम्स खोलने की शुरुआत कर चिकित्सा सुविधाओं के विकेंद्रीकरण का सराहनीय प्रयास किया किंतु एम्स के राजधानी में होने से दूरदराज रहने वाले उसकी सेवा से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में लोगों को बाध्य होकर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है जहाँ उन्हें दवाइयों, जाँच और अन्य सेवाओं के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। इसी समस्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने विगत दिवस एक याचिका पर सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकारें किफायती चिकित्सा देखभाल और बुनियादी ढांचा सुनिश्चित करने में विफल रही हैं। जिससे प्राइवेट हॉस्पिटलों को सुविधा मिली और बढ़ावा मिला। याचिका में तर्क दिया गया कि निजी अस्पताल मरीजों और उनके परिवारों को दवाइयां, ट्रांसप्लांट और अन्य चिकित्सा देखभाल सामग्री हॉस्पिटल की अपनी दुकान से महंगे दामों पर खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। याचिका में निजी अस्पतालों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे मरीजों को केवल अस्पताल की दुकानों से ही दवा खरीदने के लिए बाध्य न करें। साथ ही आरोप लगाया गया है कि केंद्र और राज्य नियामक उपाय करने में विफल रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप निजी अस्पतालों में मरीजों का शोषण हो रहा है। उक्त सभी बातें पूरी तरह सही हैं। जिस तरह दवा कंपनियों ने चिकित्सा तंत्र को पूरी तरह नियंत्रित कर रखा है उसी तरह निजी अस्पतालों के संगठनों ने सरकार में अपनी घुसपैठ करते हुए मनमानी दरें तय करवा लीं। ज्यादातर नेता और अधिकारी चूंकि निजी अस्पतालों में ही इलाज करवाते हैं इसलिए इनमें व्याप्त अनियमितताओं को रोकना असंभव है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बारे में जो टिप्पणी की वह एक तरह से जनता की आवाज है, परंतु राज्य सरकारों से सुधार की अपेक्षा करना बेमानी है क्योंकि जिस नौकरशाही और सत्ताधारी नेताओं पर निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने की जिम्मेदारी है वे उनके उपकारों से उसी तरह दबे होते हैं जिस तरह दवा कंपनियों ने चिकित्सकों को अपने उपकारों के बोझ से दबा रखा है। ज्यादातर न्यायाधीश भी निजी अस्पतालों की सेवाएं ही लेना पसंद करते हैं। इस वर्ग को जरा सी तकलीफ होने पर एयर एंबुलेंस से महानगर के महंगे निजी अस्पतालों में भेजने की सुविधा भी मिल जाती है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की दशा सुधारने की बात सोचना निरर्थक है। लेकिन यदि सत्ताधारी नेता, अधिकारी और न्यायाधीश सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने आने लगें तब इनकी सेवाएं सुधरते देर नहीं लगेगी। अब तक का अनुभव यही है कि न्यायालय जो भी फरमान जारी करते हैं वे नौकरशाही द्वारा बनाये गए चक्रव्यूह में फंसकर गायब हो जाते हैं। इस याचिका का परिणाम भी वही होगा क्योंकि जब तक माननीय न्यायाधीश अदालत से बाहर निकलकर जनता की तकलीफों से रूबरू नहींं होते चिकित्सा व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियाँ दूर नहीं हो सकेंगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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