Tuesday, 25 March 2025

सांसदों के वेतन - भत्तों में वृद्धि राजनीतिक मतभेदों को भुला देती है


सांसदों के वेतन ,भत्ते और पेंशन के साथ अन्य सुविधाओं में वृद्धि कर दी गई। मोदी सरकार ने 2018 में नियम बनाया था कि प्रत्येक पाँच वर्ष में उनका पुनरीक्षण किया जाएगा। गत दिवस जारी अधिसूचना के अनुसार 1 अप्रैल 2025 से बढ़ी हुई राशि सांसदों को मिलेगी। लेकिन नई दरें 2023  से लागू किये जाने से पिछली संसद के सदस्यों को दो और नये चुनकर आये सांसदों को एक वर्ष पहले से नया वेतन एवं अन्य वृध्दि का भुगतान होगा। पहले प्रथा ये थी कि सदन में इस आशय का प्रस्ताव अमूमन सत्र के अंतिम दिन लाया जाता  और सर्वसम्मति से ध्वनि मत से पारित हो जाता। उस दृष्टि से पाँच वर्ष में की जाने वाली बढ़ोतरी गलत नहीं है । सांसदों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए पर्याप्त धनराशि और सुविधाएं मिलना आवश्यक है। भ्रमण और सत्कार के अलावा भी उनके बहुत से खर्च होते हैं जिन्हें सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता। सत्र के दौरान तो उन्हें बैठक भत्ता मिल जाता है किंतु बाकी समय भी दिल्ली में रहने का खर्च काफी होता है। सामाजिक संपर्क विशेष रूप से विवाह आदि में उपहार जैसे व्यय बढ़ते ही जा रहे हैं। सार्वजनिक आयोजनों हेतु जनप्रतिनिधियों को आर्थिक सहयोग भी देना पड़ता है। जो जानकारी आई है उसके अनुसार सांसदों को तकरीबन 3 लाख प्रतिमाह मिलेंगे जो कि महंगाई को देखते हुए जायज है। एक जमाना था जब सांसदों पर काम का बोझ कम होता था क्योंकि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होते थे किंतु जबसे दोनों अलग - अलग होने लगे हैं तबसे  सांसद को भी मतदाताओं के साथ सतत संपर्क में रहना पड़ता है। ऐसे में बढ़ती महंगाई के अनुरूप एक निश्चित समयावधि में उनके वेतन भत्तों का पुनरीक्षण पूरी तरह उचित है। लेकिन अखरने वाली बात है पूर्व सांसदों को दी जाने वाली पेंशन , निःशुल्क यात्रा और चिकित्सा सुविधा। सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए तो नई पेंशन योजना लागू कर दी जिससे उनमें नाराजगी व्याप्त है। ऐसे ही  आम जनता के मन में पूर्व सांसदों को दी जाने वाली पेंशन और अन्य सुविधाओं को लेकर असंतोष है। यदि किसी की आर्थिक वाकई दयनीय है तब तो  समझ में आता है किंतु जो पूर्व सांसद आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं वे भी जब मुफ्त सुविधाओं का लाभ उठाते हैं तब उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। इससे भी बड़ी बात ये है कि जरा - जरा सी बात पर एक दूसरे का विरोध करने वाले राजनीतिक दल सांसदों के वेतन - भत्ते बढ़ाये जाने के मामले में एकजुट नजर आते हैं। न तो किसी पार्टी और न ही किसी सांसद द्वारा इस वृद्धि का विरोध सुनाई देगा। बल्कि इसे कम बताया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सवाल ये है कि जनहित के अन्य मुद्दों पर ऐसा सामंजस्य और सर्वसम्मति क्यों नहीं दिखाई देती ? सदन में तमाम ऐसे विधेयक आते हैं जिनको सार्थक बहस के बाद जल्द पारित किया जाना चाहिए। लेकिन निहित स्वार्थों के चलते गतिरोध उत्पन्न कर उन्हें लंबित कर दिया जाता है। संसद के सत्रों में कितने घंटे काम होता है और कौन सा सांसद कितने समय सदन में रहता है इसका भी खुलासा संसदीय मंत्रालय को करना चाहिए। सदन में एक मिनिट की उपस्थिति मात्र दो हजार का भत्ता पक्का कर देती है जो एक तरह से बेईमानी है। इसी तरह जो सदस्य होहल्ला मचाकर सदन को  चलने नहीं देते उनको  दैनिक भत्ते से वंचित करने के साथ ही काम नहीं तो वेतन नहीं के आधार पर मासिक वेतन में कटौती का नियम बनाया जाए। लाखों मतदाताओं का प्रतिनिधि होने वाले सांसद को अपनी गृहस्थी चलाने के लिए पर्याप्त वेतन- भत्ते  तथा सुविधाएं मिलना जरूरी है किंतु उनके क्रियाकलापों का भी मूल्यांकन होना चाहिए। सदन की कारवाई में बढ़ - चढ़कर हिस्सा लेने और उत्कृष्ट संसदीय आचरण वाले सांसदों में से सर्वश्रेष्ठ सांसद चुने जाने की परंपरा स्वागत योग्य है किंतु पूरे समय मिट्टी के माधो बने बैठे रहने वाले सांसदों के बारे में भी जानकारी प्रसारित होनी चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र की सफलता के लिए जनता की जागरूकता बेहद जरूरी है किंतु जनप्रतिनिधियों में दायित्वबोध न हो तो फिर वही होता है जो भारत में लगभग आठ दशक से देखने मिल रहा है। ये देखते हुए जरूरी है कि निकम्मे और निठल्ले सांसदों के बारे में भी जानकारी सार्वजनिक हो। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे सांसदों का उपयोग केवल हाथ उठाने और हल्ला मचाने के लिए करने के बजाय उन्हें जनसरोकारों से जुड़ने बाध्य करें। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रारम्भ की थी। संसदीय मंत्रालय यदि उसकी सही स्थिति उजागर कर दे तो देश भर के माननीय सांसदों की अपने कर्तव्यों के प्रति रुचि का पर्दाफाश हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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