रा.स्व.संघ के पूर्व सरकार्यवाह भैयाजी जोशी द्वारा मुंबई के बहुभाषी होने सम्बन्धी बयान पर उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया उसी ओछी राजनीति का परिचायक है जिसके कारण आज बाल ठाकरे की विरासत दयनीय स्थिति में जा पहुंची है। मुंबई में दक्षिण भारतीय समुदाय के विरुद्ध बनी शिवसेना कालांतर में उत्तर भारतीयों के विरोध में उतर आई। छठ पूजा पर भी बवाल मचाया जाता रहा। मराठी भाषा को लेकर शिवसेना का रवैया कुछ कुछ तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों जैसा रहा। यद्यपि उन जैसी कट्टरता उसमें नहीं रही क्योंकि मुंबई आजादी के पहले से ही महानगर है जहाँ नौकरी और कारोबार के सिलसिले में अन्य राज्यों के लोग आकर बसते गए। 1960 तक मुंबई ( तत्कालीन बॉम्बे या बंबई) अलग राज्य था जिसमें गुजरात का भी कुछ हिस्सा था। बाद में उसे महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया। इसे संभावनाओं का शहर कहा जाता है , जहाँ देश भर के लोग अपने सपने साकार करने आते हैं। धार्मिक और भाषायी विविधता मुंबई जैसी और कहीं देखने नहीं मिलती। उस दृष्टि से भैया जी जोशी का ये कहना सही है कि मुंबई में रहने के लिए मराठी सीखना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इस महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में अन्य भाषाओं का उपयोग होता है। उल्लेखनीय है श्री जोशी खुद मराठी भाषी हैं। उनके उक्त बयान पर उद्धव के बेटे आदित्य ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने जैसी बेतुकी मांग कर डाली। विधानसभा में भी उनकी पार्टी ने हंगामा किया जिस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने स्पष्ट किया कि मराठी मुंबई और महाराष्ट्र की भाषा ही नहीं संस्कृति है। हर किसी की इसे सीखना चाहिए। श्री जोशी ने भी अपने बयान का गलत अर्थ निकाले जाने का स्पष्टीकरण देकर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया। दरअसल इस विवाद का असली कारण निकट भविष्य में होने वाले मुंबई महानगर पालिका के चुनाव हैं। शिवसेना के विभाजन के बाद उद्धव गुट लगातार कमजोर होता जा रहा है। विधानसभा में सीटें घटने के बाद उसके सांसदों के भी शिंदे गुट से हाथ मिलाने की अटकलें लगती रहती हैं। ऐसे में अब मुंबई महानगर पालिका ही उद्धव और उनके परिवार के लिए आखिरी उम्मीद बच रही है परंतु उसके पास जनता को आकर्षित करने के लिए कोई मुद्दा नहीं है। इसीलिए श्री जोशी के बयान के बहाने वह धजी का सांप बनाने की कोशिश कर रहा है। उसे लगता है कि सत्तर के दशक की कार्यशैली को पुनर्जीवित कर वह अपनी खोई राजनीतिक जमीन दोबारा हासिल कर सकेगा किंतु ठाकरे परिवार को याद रखना चाहिए कि मुंबई के बाहर राज्य के अन्य अंचलों में उसके पैर तभी जमे जब स्व. बाल ठाकरे ने भाजपा जैसी पार्टी के साथ गठबंधन किया जो उस समय तक उत्तर भारत और हिन्दी बेल्ट की पार्टी मानी जाती थी। मुंबई में रहने वाले उ.प्र और बिहार के लोगों ने भी शिवसेना को तभी समर्थन देना शुरू किया। उद्धव को अपने चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के संस्थापक राज ठाकरे के राजनीतिक पराभव से भी सबक लेना चाहिए जो स्व. बाल ठाकरे द्वारा उत्तराधिकारी न बनाये जाने के बाद से पार्टी और परिवार छोड़कर अलग पार्टी बना बैठे। शुरुआत में राज के तेवर चाचा के दौर की याद दिलाते थे। उन्हें लगा वे उत्तर भारतीय लोगों का विरोध कर महाराष्ट्र में पैर जमा लेंगे किंतु दो दशक बाद भी जहाँ के तहाँ खड़े हैं। अब न वे अन्य राज्यों से नौकरी करने आये युवाओं को मारते - पीटते हैं और न मुंबई के समुद्र तट पर छठ पूजा का विरोध करते हैं। उद्धव और उनके पुत्र मुंबई में श्री जोशी के बयान पर जो गुस्सा दिखा रहे हैं वह महज दिखावा है। मुंबई बेशक महाराष्ट्र का अभिन्न अंग है जहाँ मराठी भाषियों का बाहुल्य है किंतु उसकी पहिचान केवल मराठीभाषियों से नहीं है। मुंबई स्थित फिल्म उद्योग में सबसे ज्यादा फिल्में हिन्दी की बनती हैं। उसके अलावा भोजपुरी, पंजाबी और गुजराती फिल्मों का निर्माण भी होता है। मुंबई फिल्म उद्योग के प्रमुख निर्माता - निर्देशक, अभिनेता - अभिनेत्रियां, गायक, संगीतकार, पटकथा लेखक और गीतकार गैर मराठीभाषी हैं। भारतीय क्रिकेट टीम में भी अब मराठीभाषी खिलाडियों का पहले जैसा वर्चस्व नहीं रहा। उद्योगपतियों में टाटा, अम्बानी, अडानी, बिरला , गोदरेज आदि गैर मराठीभाषी हैं। उत्तर भारतीय समुदाय यदि न हो तो मुंबई में कामगारों का अकाल पड़ जाएगा। और तो और अब मुंबई की राजनीति पर भी मराठीभाषियों का एकाधिकार नहीं है। ऐसे में उद्धव और उनके पुत्र मराठी भाषा के मुद्दे पर जनभावनाएं भड़काकर अपनी राजनीतिक वापसी चाह रहे हैं तो उनकी बुद्धि पर तरस ही किया जा सकता है। उन्हें तमिलनाडु और महाराष्ट्र में फर्क समझना चाहिए। वैसे भी उद्धव द्वारा शरद पवार और कांग्रेस से हाथ मिलाकर अपने स्वर्गीय पिता द्वारा बनाई गई पहिचान को नष्ट किया जा चुका है। इस तरह के घिसे - पिटे मुद्दे उठाकर वे अपनी रही - सही हैसियत भी गँवा बैठेंगे। मुंबई भारत की विविधता में एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है जिसे किसी भाषा से बांधकर रखना बेमानी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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