Saturday, 8 March 2025

महिलाओं का सम्मान एक दिवस तक सीमित न रहे


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सरकारी और गैर सरकारी आयोजनों की बाढ़ है। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भूमिका की चर्चा के साथ उनकी समस्याओं पर भी विमर्श हो रहा है। राजनीति  में महिलाओं को नेतृत्व देने की सोच भले ही अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची हो किंतु बतौर मतदाता उनकी शक्ति को सभी राजनीतिक दलों ने स्वीकार कर लिया  जिसका प्रमाण महिलाओं को लुभाने वाले  चुनावी वायदे हैं। इस ताकत को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जयललिता ने पहिचनाकर  तमाम कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं। मिक्सर ग्राइंडर जैसी चीज मुफ्त में देने की शुरुआत भी उन्हीं ने की। कालांतर में देश के बाकी राज्यों में भी महिला मतदाताओं को खुश करने के लिए राजनीतिक दलों ने और भी तरीके खोजे जिनमें बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा , साइकिल, मोबाईल आदि बांटना है। बात और आगे बढ़ी तो मुख्यमंत्री बनने के बाद  म.प्र में शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली लक्ष्मी योजना प्रारंभ कर महिलाओं के बीच अपनी छवि एक परिवार के सदस्य जैसी बनाई। 2023 के विधानसभा चुनाव के पूर्व  वे जो लाड़ली बहना योजना लेकर आये वह  चुनाव जिताने की गारंटी बन गई।   वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्ज्वला योजना शुरू कर सत्ता में बैठे लोगों को नया रास्ता सुझाया जिसके बाद हर राजनीतिक दल सस्ते गैस सिलेंडर के अलावा त्योहारों पर  एक सिलेंडर मुफ्त देने जैसे वायदे करने लगा। ताजा उदाहरण दिल्ली का है जहाँ महिला मतदाताओं को खुश करने का भाजपा का दांव आम आदमी पार्टी  पर भारी पड़ गया। लेकिन इसे ही महिला सशक्तीकरण मान लेना सही नहीं होगा। यद्यपि आजादी के आठवें दशक में महिलाओं की स्थिति में हुए सुधार को नकारा नहीं जा सकता। राष्ट्रपति सहित सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश, केन्द्रीय  मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, कलेक्टर, एस. पी जैसे पदों पर महिलाओं की मौजूदगी उनके बढ़ते कदमों का प्रमाण हैं। डाक्टर, इंजीनियर जैसे व्यवसायों में तो उनका पदार्पण हो ही चुका था किंतु  वित्तीय प्रबंधन सदृश क्षेत्र के उच्च पदों पर भी उनकी उपस्थिति भारतीय महिलाओं के सामाजिक और शैक्षणिक विकास को साबित कर रही हैं। देश में उद्योग - व्यवसाय के संचालन में भी पुरुषों का एकाधिकार नहीं रहा। अनेक महिला उद्यमी सफलता की साक्षात प्रतिमूर्ति बन चुकी हैं। और तो और सेना तक में महिलाओं की बढ़ती संख्या उनके हौसलों की मिसाल है। व्यवसायिक उड़ानों में महिला सह पायलट का होना आम बात है। इन सब उदाहरणों से सिद्ध होता है कि भारत में महिला को अबला या आश्रित मानने की अवधारणा बदल रही है। यद्यपि एक बड़ा वर्ग है जहाँ बालिका या महिला के प्रति आज भी उपेक्षा भाव है। उसके लालन - पालन से लेकर शिक्षा और विवाह आदि में लिंगभेद स्पष्ट नजर आता है। बावजूद उसके बदलाव की बयार को रोकना अब किसी के लिए संभव नहीं रहा। इसका श्रेय  राजनीति को तो  दिया ही जाना चाहिए किंतु समाज की मानसिकता में आया बदलाव भी इसके लिए जिम्मेदार है।  निचले तबके की बालिकाओं में भी आगे आने की ललक इसका प्रमाण है। शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में निम्न आर्थिक आय वर्ग की बालिकाओं की उपलब्धियों से महिला सशक्तीकरण के प्रति उम्मीदें बढ़ी हैं। लेकिन इन सबसे अलग जो चिंता का विषय है वह है नारी को देवी मानकर पूजने वाले देश में महिलाओं के उत्पीड़न की बढ़ती प्रवृत्ति। महिलाओं पर अत्याचार पहले भी होते थे। उस पर कुदृष्टि रखने वाले भी हर युग में रहे किंतु आज के दौर में जब लड़कियों के घर से बाहर निकलने पर रोक जैसी बातें कालातीत हो चुकी हैं और उन्हें भी आधी आबादी के तौर पर  विकास के अवसर दिये जा जा रहे हों तब उनके शोषण की मानसिकता के होते सिर शर्म से झुक जाता है।  बढ़ते यौन अपराध समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान के संस्कार के लुप्त होने का संकेत है। ये स्थिति उस अभिजात्य वर्ग में तो और भी ज्यादा है जो अपने को अत्याधुनिक मानकर महिलाओं को बराबरी का हक देने का पक्षधर रहा  है। इस विकृति का कारण तलाशें तो मोटे तौर पर यही प्रतीत होता है कि परिवार नामक संस्कारों की पाठशाला अपने कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाह हो चली है। सरकार से हर चीज की उम्मीद लगाए रखने की आदत के चलते समाज ये बात भूल रहा है कि संस्कारों का बीजारोपण सरकार का नहीं अपितु परिवार का प्राथमिक दायित्व है। महिला दिवस तो एक दिन का आयोजन है किंतु महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव जब तक समाज की चारित्रिक पहिचान नहीं बनता तब तक सभ्य , सुशिक्षित और आधुनिक होने के हमारे दावे अर्थहीन हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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