Tuesday, 11 March 2025

नये मेडिकल कालेज खोलने के बजाय वर्तमान कालेजों में सीटें बढ़ाना बेहतर


चुनाव प्रचार के दौरान नये मेडिकल कालेज खोलने का वायदा भी सामान्य हो चला है। म.प्र भी इससे अछूता नहीं है। बीते 10 सालों में प्रदेश के छोटे - छोटे जिलों में मेडिकल कालेज खोलने का ऐलान होता रहा । वर्तमान में 17 सरकारी मेडिकल कालेज  हैं और 9 नये निर्माणाधीन हैं। इनके अतिरिक्त दर्जन भर जनभागीदारी ( पी. पी. पी.) माॅडल से बनाने की तैयारियां हो रही हैं। देश में चिकित्सकों की कमी होने से चिकित्सा  शिक्षा के ज्यादा से ज्यादा केंद्र खोलने की जरूरत से हर कोई सहमत होगा किंतु मेडिकल कालेज केवल भवन , फर्नीचर , उपकरणों और छात्र - छात्राओं  से नहीं चलता अपितु उसके लिए सुयोग्य शिक्षकों की उपस्थिति सबसे महत्वपूर्ण  है। और कड़वी सच्चाई ये है कि जो सरकारी मेडिकल कालेज वर्तमान में संचालित हैं उनमें ही शिक्षकों की कमी है। बड़े शहरों के मेडिकल कालेजों से छोटे जिलों में स्थानांतरण किये जाने पर पहले  तो ज्यादातर शिक्षक उसे रद्द करवाने में जुट जाते हैं। सफलता नहीं मिलने पर छुट्टी लेकर बैठ जाना भी आम है। और फिर भी  बात नहीं बनती तो नौकरी छोड़कर निजी अस्पताल से जुड़ने का विकल्प चुना जाता है। आशय ये है कि जिला केंद्रों पर  सरकारी मेडिकल कालेज खोलना तो आसान है किंतु शिक्षकों की कमी के चलते उनमें गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण नहीं होने का प्रभाव वहाँ से पढ़कर निकले चिकित्सकों की योग्यता पर पड़ता है। जबसे निजी क्षेत्र भी चिकित्सा शिक्षा के व्यवसाय में उतर आया है तबसे सरकारी  मेडिकल कालेज के शिक्षकों को आर्थिक दृष्टि से ज्यादा आकर्षक अवसर उपलब्ध हैं। यही वजह है कि म.प्र के कुछ छोटे - छोटे जिलों में खोले गए मेडिकल कालेज समुचित संसाधनों के अलावा शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। इस कारण न तो सही ढंग से छात्र - छात्राओं को शिक्षा मिल रही है और न ही स्थानीय लोगों को अच्छा इलाज ही उपलब्ध हो पा रहा है। यह विसंगति किसी से छिपी नहीं है। नये मेडिकल कालेज खोले जाने के लिए ढांचागत जरूरतें पूरी की जा सकें तब तो उनकी सार्थकता है वरना वे खुद बीमार होकर सरकार पर बोझ और जनता की नाराजगी का कारण बनते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए ये सुझाव अक्सर सुनाई देता है कि  वर्तमान कालेजों में ही सीटें बढ़ाकर ज्यादा से ज्यादा नये चिकित्सक तैयार करने का लक्ष्य पूरा किया जाए। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति के चलते बात आगे नहीं बढ़ सकी और नये  मेडिकल कालेज खोलने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। लेकिन नेताओं से अलग हटकर म.प्र के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा करते हुए  नये कालेज खोलने की नीति से असहमति जताते हुए वर्तमान मेडिकल कालेजों में सीटें बढ़ाकर ज्यादा विद्यार्थियों को शिक्षित करने का विचार व्यक्त किया। श्री जैन बेहद अनुभवी और कुशल नौकरशाह माने जाते हैं। केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर रहने के दौरान उन्होंने विभिन्न विभागों में उल्लेखनीय कार्य किये जिनमें प्रधानमंत्री कार्यालय भी है। म.प्र के मुख्य सचिव पर उनकी नियुक्ति भी केंद्र सरकार की पहल पर हुई वरना प्रदेश सरकार के निकट समझे जाने वाले एक प्रशासनिक अधिकारी तो अगले दिन पदभार ग्रहण करने की तैयारी कर चुके थे और उन्हें बधाईयाँ भी मिलने लगी थीं। इसलिए जब श्री जैन की नियुक्ति की घोषणा हुई तब ये माना गया कि केंद्र ने अपनी पसंद के अधिकारी को म.प्र की नौकरशाही की कमान सौंपी है जो अनेक मायनों में प्रदेश के हित में है। चूंकि मुख्य सचिव के केंद्र सरकार में अच्छे संपर्क हैं इसलिए वे नीतिगत मामलों में स्वतंत्र राय रखने का साहस दिखा सकते हैं। जिले - जिले में मेडिकल कालेज खोलने के स्थान पर मौजूदा  कालेजों में सीटें बढ़ाने का उनका विचार प्रशासनिक और आर्थिक दृष्टि से तो व्यवहारिक है ही चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने में भी सहायक होगा। केंद्र सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष का जो बजट पेश किया उसमें मेडिकल कालेजों में सीटें बढ़ाने का प्रावधान है। बेहतर हो प्रदेश सरकार ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने मेडिकल कालेजों के लिए स्वीकृत कराए। योग्य चिकित्सकों के अभाव में जिस प्रकार झोला छाप चिकित्सकों की बाढ़ आ गई   उसी तरह पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में नये मेडिकल कालेज भी झोला छाप की श्रेणी में ही आ जायेंगे। बेहतर हो म.प्र सरकार अपने मुख्य सचिव के सुझाव  में निहित वास्तविकता को समझकर वर्तमान मेडिकल कालेजों में ज्यादा विद्यार्थियों के अध्ययन का प्रबंध करवाये । ऐसा करने से सरकार के संसाधन तो बचेंगे ही चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता भी बनी रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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