बसपा के संस्थापक कांशीराम को भारत में डॉ. आंबेडकर के बाद दलित आंदोलन का सबसे बड़ा प्रवर्तक माना जाता है। एक कर्मचारी संगठन से बढ़ते हुए राजनीतिक दल बनाकर दलित समुदाय का ध्रुवीकरण करने में कांशीराम ने बड़ी सफलता हासिल की। उसके पहले दलित मतदाता कांग्रेस से बंधे हुए थे। कांशीराम दलित राजनीति को मुख्य धारा में लाए। भले ही प्रारंभ में संसद और विधानसभाओं में बसपा की उपस्थिति नगण्य रही किंतु दलितों में आत्मविश्वास भरने में उनकी भूमिका स्मरणीय बन गई। उन्होंने पार्टी में ऐसे लोगों का चयन किया जो दलित उत्थान के प्रति समर्पित हों। कांशीराम पंजाब के थे किंतु उन्होंने बसपा को क्षेत्र विशेष तक सीमित रखने से परहेज किया वरना । साथ ही अपने परिवार के किसी सदस्य को आगे बढ़ाने के स्थान पर उ.प्र की एक युवा महिला मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। उनके जीवनकाल में ही मायावती उ.प्र की कई बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं। हालांकि दलित नेता पहले भी उच्च पदों को सुशोभित कर चुके थे किंतु वे ऐसी किसी पार्टी के सहारे वहाँ पहुंचे जिसका नेतृत्व गैर दलितों के पास था। 1992 में बाबरी ढांचा गिरने के बाद उ.प्र विधानसभा के चुनाव में कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव से गठजोड़ किया जिसने जबरदस्त राम लहर के बावजूद भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। यद्यपि वह प्रयोग ज्यादा नहीं चला किंतु उसके बाद से बसपा विशेष रूप से मायावती के भीतर सत्ता की लालसा उछाल मारने लगी। मुलायम सिंह के साथ तो लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड के बाद उनकी निजी दुश्मनी हो गई किंतु मायावती ने विशुद्ध अवसरवाद का सहारा लेते हुए उस भाजपा से हाथ मिलाने में भी संकोच नहीं किया जिसे उच्च जातियों की पार्टी माना जाता था। कांशीराम के अस्वस्थ हो जाने के बाद मायावती अपने महिमामंडन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए जन्मदिन पर उपहारों के नाम पर बहुजन समाज का भावनात्मक दोहन करने लगीं। उनकी समृद्धि के किस्से प्रचलित हो गए। तिलक तराजू और तलवार , इनको मारो जूते चार के नारे का स्थान हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है ने लिया। बहुजन समाज पार्टी सर्वजन की बात करने लगी। मायावती आर्थिक आधार पर आरक्षण के कोटे का समर्थन करती दिखने लगीं। पार्टी के दूसरे सबसे बड़े महासचिव के पद पर कानपुर के सतीश चंद्र मिश्र को नियुक्त किया गया जो बाद में राज्यसभा भी भेजे गए। इस समीकरण ने 2007 में मायावती को स्पष्ट बहुमत के साथ उ.प्र की सत्ता तक पहुँचा दिया जो राष्ट्रीय राजनीति के लिए चौंकाने वाली बात थी। कांशीराम के निधन के बाद मायावती को दलित समाज की देवी के तौर पर देखा जाने लगा। लखनऊ में बने विशाल पार्क में उन्होंने कांशीराम के साथ अपनी प्रतिमा भी लगवा दी। लेकिन सर्वजन के सहारे सत्ता में आने के बाद भी उनका जातिवादी झुकाव जारी रहा जिसके कारण पांच साल बाद ही वे जनता द्वारा नकार दी गईं। उसके बाद से बसपा और मायावती दोनों ढलान पर आते गए। कुछ राज्यों में मामूली उपस्थिति दिखी किंतु बसपा के विधायकों का बिकाऊ होना आम हो जाने से पार्टी की साख खत्म हो गई। मायावती भी अनिश्चितता की पर्याय बन गईं। लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने में उनकी भूमिका चर्चित रही जबकि कुछ घण्टों पहले वे उसके समर्थन का वायदा कर चुकी थीं। इसी तरह उ.प्र में भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए दोनों के बीच ढाई - ढाई मुख्यमंत्री रहने का समझौता हुआ। पहले मायावती गद्दी पर बैठीं किंतु जब भाजपा को सत्ता सौंपने का समय आया तो मुकर गईं। इन्हीं सबके कारण उनके प्रति दलित समाज में ही अरुचि उत्पन्न होने लगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके हाथ शून्य लगा। उ.प्र विधानसभा में भी बसपा अस्तित्वहीन हो गई। आज की स्थिति में मायावती खुद भी किसी सदन में नहीं हैं। जिस सपा से उनकी दुश्मनी सांप - नेवले जैसी थी उसी के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गठबंन्धन कर लिया। हद तो तब हुई जब मैनपुरी में उन मुलायम सिंह का प्रचार करने जा पहुंची जिन पर अपने चीरहरण का आरोप लगाया करती थीं। इसका असर ये हुआ कि बसपा के साथ जुड़े तमाम प्रमुख नेता अलग राह चले गए। पार्टी की टिकिटें बेचे जाने की चर्चा आम हो चली। उ.प्र में ही चंद्रशेखर आजाद नामक युवा दलित नेता मायावती के लिए चुनौती बनकर उभर गया। धीरे - धीरे बहिन जी अकेलेपन में घिरती गईं और असुरक्षा के भाव से ग्रसित होकर उन्होंने अपने भतीजे आनंद को उत्तराधिकारी बनाने की कवायद शुरू की किंतु वह निर्णय भी बसपा के अच्छे दिन वापस नहीं ला सका। बीते कुछ सालों में आनंद को पार्टी की बागडोर सौंपने के बाद कई बार उन्होंने अपना निर्णय बदला। जिसका कोई ठोस कारण किसी की समझ में नहीं आया। गत दिवस अचानक खबर आई कि उन्होंने आनंद को उत्तराधिकार से वंचित करते हुए पार्टी से ही निकाल दिया। आज बसपा राजनीति के जिस हाशिये पर है उसका कारण मायावती का अविश्वसनीय होना भी है। एक समय था जब उनका नाम प्रधानमंत्री के लिए चर्चा में आने लगा था किंतु आज वे सांसद बनने तक के लिए तरस रही हैं। बसपा जैसी पार्टी का सत्यानाश उनके परिवार प्रेम ने कर दिया। कांशीराम ने पार्टी को दलित समाज के हितों पर केंद्रित रखा किंतु मायावती ने उसे निजी संपत्ति बनाकर दलित समाज को अपनी कठपुतली बनाने की जो कोशिश की उसका दुष्परिणाम दलित राजनीति में आये बिखराव के रूप में सामने है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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