Saturday, 1 March 2025

ट्रम्प की हरकतों से अमेरिका की विश्वसनीयता खतरे में



कूटनीतिक शिष्टाचार से परे व्यक्तिगत छींटाकशी का जो नजारा गत दिवस अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेन्स्की के बीच दुनिया ने देखा वह  अभूतपूर्व था। दोनों के बीच जिस प्रकार की शब्दावली का आदान - प्रदान हुआ उसने कूटनीतिक व्यवहार की स्थापित मान्यताओं को पूरी तरह उलट - पुलट दिया है। हालांकि जेलेंस्की में वह परिपक्वता नहीं है जो किसी राष्ट्राध्यक्ष में होनी चाहिए।  उनकी नासमझी ने देश को ऐसे संकट में फंसा दिया जिससे  निकल पाना बेहद कठिन लग रहा है। हालांकि रूस के राष्ट्रपति पुतिन की विस्तारवादी नीति इस संकट की असली वजह है । यूक्रेन की भौगोलिक स्थिति और खनिज संपदा पर रूस की नजर शुरू से थी। उसके एक  शहर क्रीमिया पर उसने एक दशक पहले जबरन कब्जा कर लिया।  उस समय कोई देश रूस के विरुद्ध नहीं खड़ा हुआ इसलिए पुतिन का हौसला बुलंद हो गया और उन्होंने यूक्रेन के कुछ और हिस्सों पर आधिपत्य हेतु  सैन्य कारवाई शुरू कर दी। रूस के दबाव से बचने यूक्रेन ने अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो नामक सैन्य संगठन से जुड़ना चाहा जो अपने सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। उस खतरे को भांपकर पुतिन ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया। यूक्रेन चूंकि उसका मुकाबला करने की स्थिति में नहीं था इसलिए बाइडेन ने उसे हथियारों के साथ ही करोड़ों डॉलर देकर मुकाबले में खड़ा कर दिया। साथ ही रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसके साथ व्यापार बन्द कर दिया। अमेरिका के दबाव में तमाम यूरोपीय  देश भी उस प्रतिबन्ध में शामिल हो गए।  अमेरिकी सहयोग के कारण जेलेंस्की रूस के सामने झुके तो नहीं किंतु उनके देश का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो चुका है। इसी बीच अमेरिका में ट्रम्प दोबारा राष्ट्रपति बन गए। उन्होंने अमेरिका के आर्थिक हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता  देने की नीति अपनाते हुए आक्रामक रुख अपनाया। अमेरिका में होने वाले आयात पर ज्यादा शुल्क लगाने के अलावा कैनेडा को अमेरिका में विलय करने, डेनमार्क से ग्रीनलैंड हासिल करने और पनामा नहर पर फिर से अमेरिका का नियंत्रण स्थापित करने की उनकी मंशा ने पूरी दुनिया को हिला दिया। यूरोप के देशों को अमेरिका का संरक्षण देने से भी वे इंकार कर रहे हैं। गाज़ा पट्टी पर कब्जा कर उसके पुनर्निर्माण का उनका प्रस्ताव भी चिंता पैदा करने वाला है। इसी के साथ उन्होंने यूक्रेन और रूस के बीच युद्धविराम की पहल करते हुए जेलेंस्की पर उसे स्वीकार करने का दबाव बनाते हुए उन्हें कामेडियन और तानाशाह कह डाला। यही नहीं तो यूक्रेन में मौजूद बहुमूल्य खनिज अमेरिका को देने का  दबाव बनाते हुए धमकी दी कि वैसा नहीं करने पर उसे लड़ाई हेतु दिये करोड़ों डॉलर लौटाना होंगे। उसी पर बात करने जेलेंस्की भागे - भागे वाशिंगटन जा पहुंचे। ट्रम्प ने उन्हें जिस शैली में दबाना चाहा उसे आम बोलचाल में दादा गिरी ही कहा जाएगा। जेलेंस्की ने युद्ध विराम की स्थिति में यूक्रेन की सुरक्षा की गारंटी मांगी जिस पर ट्रम्प ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया ।  इस पर हुई तनातनी  पत्रकारों के सामने होने से बड़ी खबर बन गई।  इस बीच  फ्रांस और ब्रिटेन खुलकर यूक्रेन को मदद देने आगे आ गए जिससे ट्रम्प भड़क उठे और जेलेंस्की पर तीसरा विश्वयुद्ध भड़काने का आरोप लगा बैठे। माहौल इतना बिगड़ गया कि ट्रम्प ने उनको व्हाइट हाउस से चले जाने कहलवा दिया। संयुक्त पत्रकार वार्ता भी रद्द हो गई। जेलेंस्की ने दोबारा बातचीत की  इच्छा जताई किंतु उन पर अमेरिका के अपमान का आरोप लगाकर ट्रम्प ने इंकार कर दिया। इस कूटनीतिक टकराव ने यूक्रेन को बहुत ही शोचनीय स्थिति में ला खड़ा किया।  इस घटनाक्रम ने अमेरिका की विश्वसनीयता को भी खतरे में डाल दिया। ट्रम्प  यूरोप को धमकाने के अलावा अपने पड़ोसियों पर जिस प्रकार  धौंस जमा रहे हैं उससे उनकी छवि सनकी नेता की बन रही है। चीन के प्रति शुरुआती ऐंठ दिखाने के बाद अब वे जिनपिंग को दोस्त बता रहे हैं। इसके पहले वे ब्रिक्स नामक संगठन के विरुद्ध भी कड़े कदम उठाने की चेतावनी दे चुके हैं।जिसमें रूस, चीन, भारत, द. अफ्रीका और ब्राजील हैं। ऐसा लगता है वे  पूरी दुनिया को अपने अंगूठे के नीचे लाना चाहते हैं जो नामुमकिन है। वे अमेरिका के हित में सोचें और नीतियाँ बनाएं ये उनका अधिकार है किंतु उन्हें याद रखना होगा कि ये  साठ और सत्तर वाला दौर नहीं रहा। दुनिया के अनेक देश आर्थिक दृष्टि से इतने आगे आ चुके हैं कि  वे अमेरिका के बिना भी आराम से रह सकते हैं। रूस पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद भारत और चीन ने उसके साथ व्यापार जारी रखा। हाल ही में संरासंघ में रूस विरोधी प्रस्ताव से  अमेरिका ने दूरी बनाकर भी यूक्रेन पर दबाव बनाने का दांव चला था। लेकिन यूरोप के कुछ बड़े देश यूक्रेन के साथ खड़े होने से ही जेलेंस्की ने ट्रम्प के सामने ऊँची आवाज में बोलने का दुस्साहस किया। आगे क्या होगा ये कहना मुश्किल है क्योंकि ट्रम्प  जल्दबाजी में ऊट पटांग फैसले लेने पर आमादा हैं। लेकिन इससे अमेरिका की विश्वसनीयता पर  आंच आ रही है। यूक्रेन मुद्दे पर ट्रम्प ने जिस तरह पलटी मारी उससे ताईवान और जापान भी भयभीत हैं जो अमेरिका के दम पर ही चीन का विरोध कर पाते हैं । 
 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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