Monday, 24 March 2025

औरंगजेब और मुस्लिम आरक्षण पर संघ के विचार संज्ञान योग्य


गलुरू में  रा.स्व.संघ की प्रतिनिधि सभा के समापन पर पत्रकारों से बातें करते हुए सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर संघ का जो दृष्टिकोण स्पष्ट किया उनमें औरंगजेब और कर्नाटक सरकार द्वारा ठेकों में मुस्लिमों को आरक्षण का प्रावधान मुख्य हैं। श्री होसबोले ने औरंगजेब  समर्थकों द्वारा गंगा - जमुनी तहजीब के जिक्र  पर तंज कसते हुए कहा कि भारत के  विरोधी को आदर्श नहीं बनाया जा सकता है। ये लोग  औरंगजेब के भाई दारा शिकोह को याद क्यों नहीं करते हैं जो इस्लामिक कट्टरता के बजाय अन्य धर्मों का भी आदर करता था। उल्लेखनीय है औरंगजेब ने दारा शिकोह सहित अपने अन्य दो भाईयों की हत्या कर सत्ता पर कब्जा कर लिया था। सरकार्यवाह ने टिप्पणी की कि दिल्ली में औरंगजेब रोड को बदलकर अब्दुल कलाम रोड किया गया तो उसका कोई अर्थ है क्योंकि जो हमारी संस्कृति की बात करेंगे, उसका हम लोग अनुसरण करेगें। इसी तरह मुस्लिम आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा बनाये संविधान में धर्म के नाम पर आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे द्वारा मुसलमानों को आरक्षण दिये जाने के निर्णय का उल्लेख करते हुए श्री होसबोले ने याद दिलाया कि सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को रद्द कर दिया था। संघ के विरोधी उसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं किंतु उसकी सोच राष्ट्रीय हितों से जुड़ी होने के कारण हर किसी के लिए ध्यान देने योग्य है। औरंगजेब के विरुद्ध जनमानस में आम तौर पर सम्मान का भाव कभी नहीं रहा इसका कारण उसके द्वारा हिंदुओं पर जजिया कर थोपे जाने के अलावा उनके मंदिरों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त करना ही नहीं अपितु उसकी कट्टरता थी जिसके कारण शरीयत के विरुद्ध आचरण करने वाले को वह बर्दाश्त नहीं करता था। उसके दौर में यदि किसी मुस्लिम ने जरा भी सहिष्णु होने की कोशिश की तो उसे उसके कोप का भाजन होना पड़ा। हाल ही में प्रदर्शित छावा नामक फिल्म को देखने के बाद औरंगजेब के प्रति गुस्सा और बढ़ गया किंतु एक वर्ग विशेष ने बिना देर लगाए औरंगजेब को कुशल शासक, ईमानदार और हिन्दू मंदिरों के लिए भूमि व धन देने वाला प्रचारित करना शुरू कर दिया। यह उस धर्मांध मुस्लिम शासक के अत्याचारों पर पर्दा डालने का चिरपरिचित प्रयास था। ऐसे में संघ सरकार्यवाह द्वारा उठाया गया ये प्रश्न पूरी तरह से उचित है कि औरंगजेब की शान में कसीदे पढ़ने वाले दारा शिकोह को क्यों भूल जाते हैं? इसी तरह कर्नाटक सरकार द्वारा जारी निविदा में मुस्लिमों के लिए आरक्षण पर उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं द्वारा धर्म के नाम पर आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया इसलिए अब ऐसा करना संविधान विरुद्ध है । संघ की आपत्ति  इस आधार पर भी सही है क्योंकि भविष्य में ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय के लोग भी सरकारी ठेकों में अपने लिए मुसलमानों जैसा आरक्षण मांगेंगे जो नये विवादों का आधार बनेगा। ये देखते हुए अब इस बात की जरूरत है कि देश को अल्पसंख्यकवाद से मुक्त किया जाए क्योंकि वोट बैंक के लिए इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बीते चार दशक में राष्ट्रीय राजनीति धर्म और जातिवाद के इर्दगिर्द सिमटकर रह गई है। मुसलमानों के जरूरत से ज्यादा तुष्टीकरण से केवल हिन्दू ही नाराज नहीं अपितु ईसाई, सिख,जैन और बौद्ध भी नाराज हैं। इसी तरह अगड़े - पिछड़े की खींचतान ने समाज को पहले जातियों में विभाजित किया और अब उपजातियों के रूप में नये - नये समूह सामने आ रहे हैं। आरक्षण के नाम पर जो राजनीति कांग्रेस नेता राहुल गाँधी कर रहे हैं उससे जातीय संघर्ष में वृद्धि की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में श्री होसबोले द्वारा कही गई बातों पर खुले मन से विमर्श की आवश्यकता है। चूंकि हमारे देश में चुनाव का मौसम कभी समाप्त ही नहीं होता इसलिए येन - केन - प्रकारेण उसमें जीत हासिल करने के लिए सभी राजनीतिक दल ऐसे हथकंडे अपनाते हैं जिनका दूरगामी परिणाम देश और समाज दोनों के लिए नुकसानदेह होगा। संघ कार्यवाह ने वैसे तो अन्य मुद्दों पर भी  संघ की नीति स्पष्ट की लेकिन औरंगजेब और मुस्लिम आरक्षण संबंधी उनकी टिप्पणियां सामयिक होने से संज्ञान लेने योग्य हैं। उनका ये कहना मायने रखता है कि देश के विरोधी को आदर्श नहीं बनाया जा सकता। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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