पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में बलूच लिबरेशन आर्मी द्वारा एक यात्री ट्रेन को अगवा करने के बाद 150 लोगों को बंधक बनाकर बलूचिस्तान की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले कैदियों को रिहा करने के लिए 48 घंटे का समय दिया गया। ट्रेन में तैनात 20 सुरक्षा कर्मियों को गोली मार दी गई। बलूच विद्रोहियों के विरुद्ध सैन्य कारवाई के निर्देश दे दिये गए हैं। इस घटना ने बलूचिस्तान में चल रहे पाकिस्तान विरोधी आंदोलन के प्रति पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया है। हालांकि 1947 में पाकिस्तान के बनने के साथ ही पृथक बलूचिस्तान और पश्चिमी सीमांत में पख्तूनिस्तान की मांग उठने लगी थी किंतु पाकिस्तान की सरकार ने उसे दबा दिया। कालांतर में पृथक सिंध हेतु भी आंदोलन शुरू हो गया। अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता की वापसी पर खुश हो रहे पाकिस्तान को उस समय जबरदस्त झटका लगा जब तालिबानी लड़ाकों द्वारा उसके उन इलाकों को खाली करने से इंकार कर दिया जिनमें अमेरिका से लड़ाई के लिए अड्डे बनाने के लिए पाकिस्तान ने उन्हें अनुमति दी थी। अब तो तालिबानी लड़ाकों ने उन्हें अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा बताकर पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। इसी के समानांतर पृथक बलूचिस्तान हेतु भी सशस्त्र विद्रोह के हालात बनते चले गए। सिंध का आंदोलन हालांकि फिलहाल शांत है किंतु देर - सवेर वहाँ भी पृथक सिंध की आवाज बुलंद हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। इनके अलावा जो जानकारियां आ रही हैं उनके अनुसार पाक अधिकृत कश्मीर में भी पाकिस्तान के विरुद्ध गुस्से की आग तेज होती जा रही है। चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना पाक अधिकृत कश्मीर के अलावा बलूचिस्तान से भी गुजरनी है किंतु दोनों स्थानों पर उसका विरोध होने से चीन और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव पैदा हो रहा है क्योंकि इसमें चीन के अरबों डॉलर फंसे हुए हैं। पाकिस्तान के राजनीतिक और आर्थिक हालात पूरी तरह बिगड़ चुके हैं। अमेरिका सहित जो पश्चिमी देश भारत की नाराजगी के बाद भी उसको करोड़ों डॉलर खैरात में दिया करते थे वे अब हाथ खींचने लगे हैं। चीन भी चौकन्ना हो चला है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थानों ने पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट कर रखा है। राजनीतिक मोर्चे पर भी देश में भारी उथल- पुथल है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान भले ही जेल में हों किंतु उनके समर्थक पूरे देश में आंदोलन पर उतारू हैं। इधर जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद वहाँ की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में आतंकवादियों की धमकियों के बाद भी मतदान के प्रति जो उत्साह देखा गया उससे अलगाववादियों की कमर टूटी है। घाटी के अंदरूनी इलाकों में भी अब आवाजाही बेरोकटोक हो रही है। स्कूल, कालेज एवं अन्य संस्थान सुचारु रूप से चल रहे हैं। बीते 5 वर्षों में जम्मू कश्मीर में पर्यटन उद्योग में आया उछाल घाटी में आतंकवादियों के खात्मे का संकेत है। इसका असर पाक के कब्जे वाले कश्मीर पर पड़ रहा है। वहाँ भी भारत के समर्थन में आंदोलन होने लगे हैं। कुल मिलाकर पाकिस्तान विभाजन के कगार पर आ खड़ा हुआ है। बलूचिस्तान, पश्चिमी सीमांत और पाक अधिकृत कश्मीर के मौजूदा हालात इस्लामाबाद में बैठी हुकूमत के नियंत्रण से बाहर हैं। राजनीतिक और आर्थिक हालातों का असर सेना पर भी पड़ रहा है अन्यथा वह अभी तक सत्ता पलट कर चुकी होती। इस दुर्दशा के लिए पाकिस्तान के वे नेता जिम्मेदार हैं जिन्होंने भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवादियों को बढ़ावा दिया। धीरे - धीरे वे आतँकवादी सत्ता पर हावी होने लगे और भारत में अलगाववाद फैलाने के साथ - साथ पाकिस्तान को टुकड़े - टुकड़े करने पर भी आमादा हो उठे। इस प्रकार जिस सांप को भारत से नफरत के चलते पाकिस्तान ने दूध पिलाया था वह अब उसी को डसने के लिए फन फैलाये हुए है। खैबर - पख्तून और बलूचिस्तान के हालात बेहद संगीन हैं। बगावत की ये आग पाक अधिकृत कश्मीर में भी फैले बिना नहीं रहेगी। इस प्रकार पाकिस्तान गृहयुद्ध की चपेट में आता जा रहा है। इस्लाम के नाम पर बने इस मुल्क में इस्लाम को मानने वाले ही एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाले खुद भी उसी में किस प्रकार गिरते हैं ये पाकिस्तान को देखकर समझा जा सकता है। उसकी दयनीय हालत को देखते हुए ही अब तो एकाध को छोड़ ज्यादातर मुस्लिम देश भी उससे दूरी बना रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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