Monday, 30 June 2025

याद न जाए बीते दिनों की ...



आज 1 जुलाई है । 

बचपन में गर्मियों की छुट्टियां ननिहाल में बिताने के बाद जबलपुर लौटने पर ये तारीख मानों पैरोल खत्म होने का एहसास करवाती थी।
शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए जरूरी है।लेकिन पारिवारिक रिश्तों की अहमियत सीखना भी बच्चों के लिए उतना ही जरूरी है ।
दादा -दादी , चाचा -ताऊ , चाची-ताई , बुआ फूफा , नाना -नानी , मामा - मामी , मौसा - मौसी  भाई-बहिन के अलावा भी गांव -मोहल्ले के मुंह बोले रिश्ते जीवनपर्यंत निभाने के संस्कारों को पुनर्जीवित करना नितांत आवश्यक है जिससे हमारे नौनिहालों को इंडिया छोड़ भारत में अनुराग हो।

उन्हें समोसे , मंगोड़े , पकोड़े , कचौड़ी , सेव ,चूड़ा , गोलगप्पे और रबड़ी मलाई की कुल्फी भी खिलाते  रहें ताकि वे पिज़्ज़ा और बर्गर और कोल्ड ड्रिंक के ही न होकर रह जाएं।
उनके बचपन को समय से पहले विदा होने से बचाइए वरना मौजूदा दौर में जो सामाजिक विकृतियां पैदा हो रही हैं उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा ।
आप जिस धर्म या पंथ के हों उसकी प्रार्थना में बच्चों को अवश्य साथ रखें जिससे उन्हें अपनी बुनियाद याद रहे ।
संस्कृति के इस संक्रान्तिकाल में बाल्य और किशोरावस्था के बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि शाला कितनी भी अच्छी और महंगी हो , लेकिन संस्कारों की जो शिक्षा परिवार में मिलना सम्भव है वह और कहीं नहीं ।
हो सके तो बच्चों के साथ खेलिये वरना वे एकाकीपन का शिकार होकर मोबाइल और टीवी में दोस्त तलाशने लग जाएंगे जो बाद में आपको नागवार गुजरेगा ।
ध्यान रहे माता - पिता ही बच्चे के सबसे अच्छे शिक्षक और साथी होते हैं ।
बच्चों की हर जिद पूरी करने की बजाय उन्हें समझाएँ कि वैसा करना क्यों सम्भव नहीं , वरना वे उसके आदी हो जाएंगे।
आज जब आधी सदी पीछे की स्मृतियों को क्रमशः कुरेदता हूँ तो पता चलता है कि रिश्तों और परिवार की परवरिश का व्यक्ति के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान होता है ।
समय कभी लौटकर नहीं आता लेकिन उसके पदचिन्ह कभी मिटते नहीं। बरबस पुरानी स्मृतियां आकर मन के दरवाजे खटखटाती हैं । अक्सर बच्चों को विद्यालय जाते देखकर बहुत कुछ याद जाता है । पुराने संगी - साथी , गुरुजन और उन सबसे जुड़ी यादें।
मेरा आशय किसी को उपदेश देने का नहीं अपितु अपने माता-पिता ,गुरुओं और परिवारजनों से जो सीखा और पाया उसे सबके साथ बांटना भी तो मेरा फर्ज है ।
और फिर यादों को अपने तक समेटकर रखना भी आसान नहीं होता।
जीवन की इस पायदान पर जब लगता है कि हमने सब कुछ पा लिया और जी लिया तब कपड़े का वह साधारण बस्ता टांगकर पैदल शाला जाने का उत्साह और उमंग याद आ गये , जिसके आगे आज अपने लैपटॉप का बैग और ब्रीफ़केस बोझ लगते हैं ।

कवि शैलेन्द्र के एक गीत की ये पंक्तियां शायद इसीलिए होठों पर गाहे बगाहे आ जाया करती हैं :-
दिन जो पखेरू होते , पिंजरे में मैं रख लेता।
पालता उनको जतन से , मोती के दाने देता।
सीने से रहता लगाए,
याद न जाए बीते दिनों की ....

- रवीन्द्र वाजपेयी

पुरी हादसा : अव्यवस्था का हिस्सा बनने से बचें


उड़ीसा में  जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा एक विश्वस्तरीय वार्षिक आयोजन है। यूँ तो भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का उत्सव पूरे देश में कहीं बड़े तो कहीं साधारण स्तर पर मनाया जाता है किंतु जगन्नाथ पुरी  आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में है जहाँ जगन्नाथ जी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस मंदिर के साथ अनेक चमत्कारी बातें जुड़ी हुईं हैं जिन्हें लेकर वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हैं। उदाहरण के लिए मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हवा की विपरीत दिशा में फहराता है। इसके अलावा भी जगन्नाथ जी की मूर्तियों के साथ जुड़ी ऐसी बातें हैं जिनका रहस्य आज तक कोई नहीं जानता। पुरी के नाम से प्रसिद्ध समुद्र के किनारे स्थित इस प्राचीन और पवित्र नगरी में साल भर श्रृद्धालुओं का आना - जाना लगा रहता है ।  इसके अलावा अन्य धार्मिक स्थलों की तरह से ही पुरी भी पर्यटकों की बड़ी पसंद बन गई है। लेकिन रथ यात्रा महोत्सव के दौरान यहाँ जनसैलाब उमड़ पड़ता है। उड़ीसा सरकार भी इसका खूब प्रचार करती है जिससे यह उत्सव धार्मिक पर्यटन का रूप लेने लगा है। साल दर साल रथ यात्रा में आने वालों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए सरकार के अलावा पर्यटन व्यवसायी भी काफी व्यवस्थाएं करते हैं किंतु  हर साल कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जिससे समूची व्यवस्था पर उंगली उठती है। गत दिवस भी हादसे की पुनरावृत्ति हो गई जब मुख्य मंदिर के अलावा  एक मंदिर में धक्का - मुक्की के कारण 3 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ गया वहीं लगभग 100 घायल हैं। उनमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुरी के वरिष्ट  प्रशासनिक अधिकारियों को हटाकर दूसरे पदस्थ किये गए हैं। मुख्यमंत्री ने माफी भी मांगते हुए स्वीकार किया है कि ये लापरवाही क्षमा योग्य नहीं हैं। जैसा होता आया है इस घटना के बाद भी  मृतकों के परिजनों को मुआवजे और घायलों के  मुफ्त इलाज की मेहरबानी सरकार द्वारा की जाएगी। एक जांच दल बनेगा जिसकी रिपोर्ट आते - आते अगली रथ यात्रा आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। सरकारी अमले के कुछ लोग निलंबित होंगे और फिर सब सामान्य हो जाएगा। भारत में धार्मिक स्थलों पर जानलेवा हादसे अब स्थायी हो चले हैं। महाकुंभ में तो करोड़ों लोगों की उपस्थिति होने से कोई अनहोनी अस्वाभविक नहीं कही जाती किंतु प्रति वर्ष किसी न किसी मंदिर में  श्रृद्धालुओं की भीड़ व्यवस्थाओं पर भारी पड़ जाने से धक्का- मुक्की में लोग मारे जाते हैं। उत्तराखंड स्थित चार धाम की स्थिति भी ऐसी ही है। विशेष धार्मिक आयोजनों के पहले शासन और प्रशासन हरसंभव व्यवस्था का दावा करते हैं किंतु भीड़ उनके अनुमान से अधिक होने के अलावा अनुशासन तोड़ने पर आमादा रहती है। उससे भी बड़ी समस्या है वी. आई.पी जो अपने ओहदे की ठसक दिखाते हुए सभी इंतजामों की धज्जियां उड़ा देते हैं। पुरी में भी कल हुए दर्दनाक हादसे में भी उनके लिए की गई  विशेष व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा रहा है।  दरअसल इस प्रकार की दुर्घटनाओं की सच्चाई कभी सामने नहीं आती क्योंकि जो शासन और प्रशासन इसके लिए कसूरवार होता है , जाँच भी उसी के नियंत्रण में होती है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय ये है कि ऐसे हादसों से जनता कोई सबक नहीं लेती जबकि जान का खतरा उसे ही रहता है। सूचना क्रांति के इस युग में भीड़ और यातायात की जानकारी प्रसारित होते रहने के बाद भी लोग आयोजन में शामिल होने का दुस्साहस करते हैं। धर्म के प्रति आस्था भारत की आत्मा है किंतु उसका पालन करते समय अनुशासन का ध्यान रखना भी आवश्यक है। भीड़ के प्रबंधन में लगे शासकीय तंत्र की भी अपनी सीमाएं और क्षमता होती है। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में है कि सरकारी प्रबंध पर पूरी तरह निर्भर न रहते हुए अपनी और अपनों की हिफ़ाजत  के प्रति सतर्क रहें। रथ यात्रा अगले साल भी होगी लेकिन जो ज़िंदगी से हाथ धो बैठे उनको ये अवसर दोबारा नहीं मिलेगा। आस्था का पालन स्वागतयोग्य है किंतु उसके अतिरेक से बचना चाहिए। तीर्थ यात्रा के पीछे मोक्ष की कामना छिपी होती है लेकिन वह धक्का - मुक्की में कुचलकर मर जाने से प्राप्त नहीं होता। विवेकशीलता यही है कि हम व्यवस्था का हिस्सा बनें , अव्यवस्था का नहीं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 28 June 2025

उद्धव और राज : फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती


भाषावार प्रांतों के गठन ने क्षेत्रीयता को कितना बढ़ावा दिया ये किसी से छिपा नहीं है। आजादी के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न राज्यों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करते हुए उन्हें नये नाम भी दिये गए। कालांतर में कुछ ने अपना नाम फिर बदला । उदाहरण के लिए मद्रास को तमिलनाडु और मैसूर को कर्नाटक नाम मिला। इसके पीछे भाषायी आधार पर अपनी पहिचान स्थापित करने का उद्देश्य ही था। इस भावना ने अलगाव के बीजों को खाद - पानी देकर अंकुरित होने में मदद की। रोचक बात ये है कि भाषा के नाम पर क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज बुलंद करने वालों में लेखक, कवि या साहित्यकार वर्ग से ज्यादा राजनीतिक नेता ही सामने आते रहे और उनमें भी राष्ट्रीय पार्टियों के कम और क्षेत्रीय दलों से जुड़े चेहरे अधिक  हैं। वैसे तो भाषा के नाम पर अनेक राज्यों में जनभावनाएं भड़काने का खेल चलता है लेकिन उनमें तमिलनाडु सबसे अग्रणी है। वहाँ चूंकि दो प्रमुख क्षेत्रीय दल ही अनेक दशकों से सत्ता पर काबिज हैं लिहाजा राष्ट्रीय पार्टियाँ भावनात्मक मुद्दों पर खुलकर नहीं बोल पातीं। तमिल भाषा के समर्थन की आड़ में वहाँ की दोनों बड़ी पार्टियों द्वारा हिन्दी के विरोध को अपना हथियार बना रखा है।  समय - समय पर अन्य राज्यों में भी भाषा के नाम  पर वातावरण खराब करने का षडयंत्र रचा जाता है। ताजा उदाहरण है महाराष्ट्र का जहाँ केंद्र की नई शिक्षा नीति में हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य किये जाने के विरोध में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे बैर भूलकर साथ आने के संकेत दे रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस साफ तौर पर कह चुके हैं कि मराठी भाषा की उपेक्षा कर हिन्दी लादने की बात  गलत है। लेकिन ठाकरे बंधुओं, की पार्टियां  हिन्दी के विरोध को  राजनीतिक मुद्दा बनाकर उन मराठी भाषियों को वापस अपने पाले में खींचना चाहते हैं जो धीरे - धीरे भाजपा की तरफ झुकते चले गए। एक जमाना था जब स्व. बाल ठाकरे मुंबई और निकटवर्ती जिलों के बेताज बादशाह हुआ करते थे। जब राज ठाकरे ने अलग पार्टी बनाई तब नासिक सहित कुछ इलाकों में उनका सिक्का चलने लगा। नब्बे के दशक में भाजपा के साथ गठबंधन  करने करने के बाद शिवसेना का फैलाव तो पूरे राज्य में हो गया लेकिन अपनी तेज - तर्रार छवि के बावजूद राज की पार्टी मनसे कुछ खास नहीं कर सकी। बाल ठाकरे के अवसान के बाद उनके बेटे उद्धव ने शिवसेना की कमान संभाली जिन्हें वे अपना उत्ताधिकारी बना गए थे और उसी कारण राज ने पार्टी और परिवार छोड़ा था। उद्धव ने  उत्तर भारतीयों के विरोध की नीति को काफी हद तक लचीला किया और हिन्दी के प्रति भी दुराग्रह में कमी की । दूसरी तरफ राज अपने पुराने अंदाज में ही नजर आते रहे किंतु बाल ठाकरे की विरासत उद्धव के पास आकर ठहर गई। भाजपा का  साथ मिलने से उनकी पार्टी बड़ी ताकत बन गई। लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता कायम होते ही भाजपा ने शिवसेना से बड़े भाई का ओहदा छीनने की रणनीति बनाई। कुछ  समय तक हिंदुत्व दोनों को जोड़े रहा किंतु  रूठने - मनाने का सिलसिला नहीं रुका।  अंततः अलगाव हो ही गया और वह भी ऐसा कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की पुण्याई को समुद्र में  डुबोकर सत्ता की लालच में उस कांग्रेस और शरद पवार की गोद में जा बैठे जो हिंदुत्व के नाम से ही बिदकते थे। यहाँ तक कि सपा का साथ भी उन्होंने स्वीकार किया जिसके नेता स्व. मुलायम सिंह यादव ने राम भक्तों पर गोली चलवाने जैसा महापाप किया था। इस वजह से उनकी पार्टी टूट गई और सत्ता भी हाथ से खिसक गई। पिछले विधानसभा चुनाव में उद्धव वाली Bशिवसेना का सितारा पूरे तौर पर डूब चुका है। उधर  राज किसी मुकाम पर नहीं पहुँच पा रहे। प्रदेश सरकार के पास भारी बहुमत है। उद्धव बीमार हैं और राज का जनाधार सिमट चुका है। ऐसे में अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने से  दोनों को अपने बेटों की चिंता सताने लगी है जिनकी जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है। क्योंकि शिवसेना के मूल चरित्र से  उनका व्यक्तित्व मेल नहीं खाता। लगता है हिन्दी  विरोध का सहारा लेकर बेटों को स्थापित करने दोनों वरिष्ट ठाकरे दुश्मनी भुलाकर निकट आ रहे हैं किंतु  ये दाँव पहले भी कारगर नहीं हुआ और आगे भी नहीं होगा क्योंकि जिस मुंबई से  ठाकरे खानदान की पहचान जुड़ी रही वह खुद ही मराठीभाषियों के वर्चस्व से मुक्त है। भले ही उद्धव और राज, भाषायी उन्माद फैलाकर उपद्रव की स्थिति उत्पन्न करने का दुस्साहस करें किंतु महाराष्ट्र और तमिलनाडु की राजनीति और सोच में बड़ा अंतर है। तमिलनाडु के नेता और अभिनेताओं की छवि सीमित क्षेत्र में ही है जबकि महाराष्ट्र से निकली शख्सियतों को देश भर में प्रसिद्धि और दुलार मिलता रहा। लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न न मिला होता तब भी वे देश भर में सम्मानित थे जबकि वह छवि एम. जी. राम चंद्रन की नहीं बन सकी। ठाकरे बंधु ये भूल जाते हैं की मुंबई हिन्दी फिल्मों का गढ़ है। ये देखते हुए उनकी हिन्दी विरोधी मुहिम पानी के बुलबुले से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे भी फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 June 2025

चीन को जोर का झटका धीरे से दिया राजनाथ ने

  

चीन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन 
(एस सीओ) की बैठक के बाद संयुक्त घोषणापत्र जारी नहीं हो सका। इसका कारण भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे रक्षा मंत्री राजनाथ का विरोध था जिन्होंने ये कहते हुए  हस्ताक्षर करने से इंकार किया कि घोषणापत्र के प्रारूप में न तो पहलगाम में हुए आतंकी हमले का  उल्लेख था और न ही आतंकवाद संबंधी भारत की चिंताओं को स्थान दिया गया। लेकिन चीन और पाकिस्तान की सांठ - गांठ से बलूचिस्तान में चल रहे संघर्ष का जिक्र आतंकवाद के रूप में किया गया जिस पर  श्री सिंह ने कड़ी आपत्ति जताते हुए दस्तखत से मना कर दिया। ये निश्चित रूप से बड़ा निर्णय था जिसके जरिये भारत ने  कूटनीतिक दृढ़ता के साथ ही इस संगठन के बाकी सदस्यों को ये एहसास करवा दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा  के लिए  आतंकवाद का विरोध करने में पीछे नहीं हटेगा। स्मरणीय है शंघाई सहयोग संगठन दस सदस्य देशों का एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा और व्यापार संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की ओर से की गई थी। बाद में भारत, पाकिस्तान  ईरान और बेलारूस भी इसके सदस्य हो गए थे।  फिलहाल  चीन ही इसका अध्यक्ष  है। इसलिए उसको  लगा कि वह इस बैठक  में सब कुछ अपनी मर्जी से करवा लेगा। ये बात भी सही है कि इस संगठन की सबसे ज्यादा जरूरत उसी को है क्योंकि वन बेल्ट वन बेल्ट सड़क के जरिये वह अपने व्यापारिक हितों को साधना चाह रहा है। चूंकि पाकिस्तान के बिना यह महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी नहीं हो सकती इसलिए चीन उसकी हर गलती पर पर्दा डालने तत्पर रहता है। पहलगाम हमले की उसने निंदा तो की थी किंतु उसमें पाकिस्तान का हाथ होने के  आरोप पर उसका रवैया गोलमोल  रहा और इसीलिए उसने उस घटना की निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए परोक्ष तौर पर पाकिस्तान को बेगुनाह साबित करने का प्रयास किया। इसी तरह जब भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने के लिए  ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया तब चीन ने पाकिस्तान को अपना पक्का दोस्त बताकर भारत पर दबाव बनाने का दांव चला था। पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार और लड़ाकू विमान देकर चीन वैसे भी भारत की सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करता रहता है। संरासंघ में जब भी भारत ने आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान को घेरना चाहा चीन ने वीटो का उपयोग कर उसका बचाव किया। ऐसे में उससे किसी सदाशयता की आशा करना तो फिजूल  है किंतु बतौर मेजबान उसका फ़र्ज़  था कि वह उसके देश में आये अतिथियों को नाराज न होने देता। लेकिन उसकी कूटनीति धूर्तता से भरी हुई होती है। एससीओ बैठक में भी वह इससे बाज नहीं आया तभी उसे बलूचिस्तान में तो आतंकवाद नजर आ गया लेकिन पहलगाम के हत्याकांड की निंदा  जरूरी नहीं लगी। उसका सीधा - सीधा  कारण ये है कि उस घटना के तार सीधे - सीधे पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। चीन को ये उम्मीद थी कि भारत थोड़े से ना - नुकूर के बाद संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर देगा किंतु  रक्षा मंत्री श्री सिंह ने उसकी चाल को समझते हुए मना कर दिया। उल्लेखनीय है आगामी अगस्त में एससीओ का शिखर सम्मेलन भी चीन में ही आयोजित होने जा रहा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिस्सा लेना  है। कूटनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि सम्भवतः वे नहीं जाएंगे। इसका कारण हाल ही में चीन द्वारा लगातार भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थन किये जाने के अलावा ये भी है कि दिल्ली में हुए जी-20 देशों के सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी नहीं आये थे । बहरहाल , एससीओ की बैठक में राजनाथ सिंह ने जो पैंतरा दिखाया वह महज एक संकेत है इस बात का कि चीन की चालाकी और चालबाजी को भारत समझता है। कूटनीति में इस तरह के फैसले दूरगामी असर डालते हैं। संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर रक्षा मंत्री ने चीन को उसी के घर में जोर का झटका धीरे से दे दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 26 June 2025

जान बचाने अमेरिका के आगे झुके खामेनेई


इजराइल और ईरान के बीच भले ही युद्धविराम हो गया लेकिन शत्रुता का भाव बरकरार है। दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। युद्धविराम करवाने का श्रेय श्रेय लूटने में वैसे तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आगे - आगे हो रहे हैं लेकिन दूसरी चर्चा ये भी है कि कतर स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर ईरान के सांकेतिक हमलों के बाद कतर के शासक शेख तमीम ने ईरान पर दबाव डाला जिससे वह भी जंग रोकने राजी हो गया। वरना अमेरिका द्वारा उसके परमाणु संयंत्रों पर बड़े विमान गिराए जाने के बाद जो  खामेनेई अमेरिका को नतीजा भुगतने की धमकी दे रहे थे वे अचानक ठंडे नहीं पड़ते। इस जंग में जीत हार का आकलन भी अपने - अपने नजरिये से हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान काफी बड़ा देश है जिसके पास अकूत तेल संपदा है। उसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है। उसकी तुलना में इजराइल बहुत छोटा देश है जिसके चारों तरफ मुस्लिम देश हैं किंतु उसने ईरान के सभी प्रमुख सेना प्रमुखों के अलावा दर्जनों परमाणु वैज्ञानिकों को चुन - चुनकर मार दिया। यही नहीं तो ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों को भी काफी नुकसान हुआ। युद्धविराम के दो दिन पहले अमेरिका ने उसके परमाणु संयंत्रों पर जो बमबारी की उसके बाद ये दावा विश्वास योग्य नहीं है कि उनको मामूली क्षति पहुंची और ईरान का परमाणु कार्यक्रम जारी रहेगा । यदि इसमें  सच्चाई होती तब खामेनेई भला युद्धविराम के लिए क्यों राजी हुए जबकि पूरी दुनिया में ईरान समर्थक ये ढोल पीट रहे हैं कि इजराइल को हरा दिया गया। सही बात ये है कि इजराइल को जो नुकसान हुआ वह निश्चित रूप से  नई बात है क्योंकि उसका रक्षा तंत्र ईरान की सभी मिसाइलों को रोक नहीं सका। इसी कारण उसके एक बंदरगाह और रिहायशी इलाकों में काफी नुकसान हुआ किंतु जहाँ तक मौतों का प्रश्न है ईरान में  मरने वालों की संख्या जहाँ एक हजार से ज्यादा है वहीं इजराइल में 100 से भी कम लोगों की जान गई। ये आंकड़ा ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। लड़ाई के दिनों में इजराइली हमलों से भयातुर होकर राजधानी तेहरान से लाखों लोग भागकर देश के भीतरी हिस्सों में चले गए जबकि इजराइल की राजधानी तेल अबीब में लोग हमले का सायरन बजते ही बंकरों में चले जाते और खतरा  टलते ही सब सामान्य  हो जाता। ईरान अपनी सैन्य क्षमता का कितना भी बखान करता रहे किंतु आखिरी दो दिनों में वह बदहवासी का शिकार हो चला था। युद्धविराम की घोषणा के बाद इजराइल पर दागी गईं मिसाइलें इसका प्रमाण हैं। लेकिन युद्धविराम के बाद ट्रम्प के जो  बयान आये उनसे लगता है ईरान ने अपने ऐलानिया दुश्मन अमेरिका के साथ कोई समझौता किया है जिसमें खामेनेई की जान बख्शने का प्रावधान भी है। लेकिन इस जंग की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो ये बात स्पष्ट होती है कि 7 अक्टूबर 2023 को  आतंकवादी संगठन हमास ने इजराइल पर राकेट दागकर बर्र के छत्ते को छेड़ने की जो मूर्खता की उसी ने ईरान और इजराइल के बीच युद्ध की नींव रख दी थी। गाजा पट्टी पर हमास का आधिपत्य , अवैध कब्जे जैसा है। इसे ईरान ही पालता - पोसता है। इसके अलावा हिजबुल्ला नामक संगठन भी उसका पालतू है । इनका एकमात्र काम इजराइल को परेशान करना रहा है। लेकिन जब हमास ने पूरे तौर पर हमले  का दुस्साहस करते हुए इजराइलियों की हत्या और अपहरण किया तब जवाबी कार्रवाई में इजराइल ने गाजा को कब्रिस्तान में बदल दिया। ईरान इसके लिए पूरे तौर पर जिम्मेदार था। उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर जरूरत से ज्यादा ग़रूर हो गया था जिसके कारण वह अमेरिका को धमकी देने की जुर्रत करने लगा। लेकिन 12 दिनों की लड़ाई के बाद उसकी परमाणु क्षमता किसी काम नहीं आई । उल्टे उसकी सैन्य शक्ति की कमर टूट गई। थोक में सेना के जनरलों और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कितना बड़ा नुकसान है ये जानकार लोग बता सकते हैं। युद्ध के दौरान खामेनेई द्वारा उत्तराधिकारियों का चयन भी उनके डर का प्रमाण था। इस लड़ाई में भले ही विजेता का औपचारिक ऐलान करना कठिन है किंतु अमेरिका ने ईरान की अकड़ निकाल दी वहीं इजराइल ने उसे इतना कमजोर कर दिया कि वह हमास और हिजबुल्ला को की मदद करने के बजाय अपनी बर्बादी से उबरने में जुटेगा जिसका संकेत उसे ट्रम्प ने दिया है। आने वाले दिनों में ये साबित हो जाएगा कि इजराइल को नष्ट करने वाला ईरान अमेरिका के इशारों पर उठक -  बैठक करेगा और अपनी जान बख्शने के एवज में खामेनेई अमेरिका की पसन्द के व्यक्ति को सत्ता सौंपने मजबूर होंगे। सच बात बात तो ये है कि ईरान के पड़ोसी मुस्लिम देश भी खामेनेई से नफरत करते हैं क्योंकि उनकी वजह से  प. एशिया बारूद के ढेर पर बैठने मजबूर है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 25 June 2025

जब आधी रात को संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाई गईं

आज 25 जून है । कहने को ये एक तिथि  मात्र है परंतु  आजाद भारत में ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है | आधी सदी पहले आधी रात में तबकी प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने संविधान और लोकतंत्र की हत्या का दुस्साहस  किया था ।इसके पूर्व 12 जून  1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से श्रीमती गांधी  के विरुद्ध 1971 का लोकसभा चुनाव लड़े समाजवादी नेता स्व. राजनारायण की चुनाव याचिका मंजूर करते हुए उस चुनाव को अवैध  करार दिया | न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा  के उस फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया । 1971 में बांग्ला देश के  निर्माण के बाद पूरे विश्व में  इंदिरा जी की प्रशस्ति फैल गई थी। लेकिन  चुनाव अवैध हो जाने के कारण उनकी सत्ता  खतरे में पड़ गई । अपेक्षित तो ये था कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की खातिर वे त्यागपत्र  देतीं । लेकिन  जगह -  जगह न्यायमूर्ति . सिन्हा के पुतले जलाए जाने लगे। उनके  छोटे बेटे  स्व. संजय गांधी ने तो ये तक कहा कि करोड़ो लोगों द्वारा चुनी हुई  प्रधानमंत्री को  एक न्यायाधीश भला कैसे हटा सकता है ? उधर विपक्ष इंदिरा जी से  इस्तीफे  की मांग करने लगा । असल में विशाल बहुमत होते हुए भी श्रीमती गाँधी अलोकप्रिय होने लगीं  थीं। गुजरात से 1974 में प्रारंभ छात्र आन्दोलन बिहार होता हुए पूरे  देश में फैल चुका था। सर्वोदयी नेता  स्व. जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करते हुए  सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया । उसके अंतर्गत 6 मार्च 1975 को दिल्ली में जो सर्वदलीय रैली निकली उससे इंदिरा जी चिंतित हो उठीं।  कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी श्रीमती गांधी के रवैये और संजय के व्यवहार  से  रुष्ट थे । इस तरह से वे चारों तरफ से घिर गईं और  25 जून  1975 की आधी रात में जब  पूरा देश नींद में था तब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने वाले  अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए । सुबह होते तक जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपालानी , अटल बिहारी वाजपेयी , चौधरी चरण सिंह , लालकृष्ण आडवाणी , चन्द्रशेखर , मधु लिमये , राजनारायण , मधु दंडवते , नानाजी देशमुख , प्रकाश सिंह बादल आदि को तो गिरफ्तार किया ही गया किंतु  उनके अलावा देश भर से प्रदेश , जिला और तहसील  तक के विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए गये ।अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही  मौलिक अधिकार भी निलंबित कर दिए गए । समाचार पत्रों पर सेंसर  लग  गया। जयप्रकाश जी की तुलना हिटलर से की गई।सरकार के प्रचार माध्यम ये माहौल बनाने लगे कि  विपक्ष जनता द्वारा चुनी श्रीमती गाँधी की सरकार को अपदस्थ करने का षडयंत्र रच रहा था ।यद्यपि आपत्काल के औचित्य को साबित करने के लिए जमाखोरों, मुनाफाखोरों सहित अनेक  समाज विरोधी तत्वों  को भी गिरफ्तार  कर लिया गया । लेकिन इस सबका असली कारण अलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह  फैसला  ही था  ।  19 महीने देश में श्रीमती गांधी की तानाशाही  चली । लोकसभा का कार्यकाल  एक वर्ष बढ़ाकर  उच्च न्यायालय का फैसला उलट दिया गया । जब लगा कि विपक्ष ठंडा पड़ गया है तब उन्होंने मार्च 1977 में लोकसभा  चुनाव करवाए  जिसमें कांग्रेस पराजित हुई और नई गठित जनता पार्टी की सरकार बन गयी ।  यहाँ तक कि श्रीमती गांधी  रायबरेली और संजय  गांधी अमेठी से चुनाव हार गये । दुनिया के किसी देश के  प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए  संसद का चुनाव हारने का ये पहला अवसर था । हालांकि जनता पार्टी  सरकार भी आपसी खींचतान  के चलते  27 महीने में गिर गई और 1980 में इंदिरा जी की वापिसी हो गई । लेकिन आपातकाल रूपी अपराधबोध के कारण  पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं  । आज जो लोग संविधान को खतरे में बताने का राग अलाप रहे हैं , वे इंदिरा जी द्वारा थोपे गये आपातकाल और उसके दौरान हुए अत्याचारों के बारे में पढ़ें और जानें तब उनको एहसास होगा कि 19 माह का वह दौर कितना भयावह था । हालंकि उस समय की  जनता बधाई की हकदार है जिसने  तानाशाही को उखाड़ फेंका । तबसे हमारा लोकतंत्र मजबूत तो हुआ लेकिन जनता पार्टी की लहर में ऐसे लोग भी प्रथम पंक्ति के नेता बन बैठे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर प्रस्तुत व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प की धज्जियां उड़ाते हुए जातिवाद का जो  जहर फैलाया वही आज  भरतीय राजनीति की पहचान बन गया है । उस दृष्टि से  25 जून हर संविधान प्रेमी के लिए आत्मावलोकन का  दिन है । ये भी अजीब संयोग है कि उस आपातकाल के शिकार नेता और उनकी पार्टियां आज उसी कांग्रेस की सहयोगी  हैं जिसके माथे पर संविधान की हत्या का कलंक है । गत वर्ष नई लोकसभा के शुभारंभ पर काँग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेता संविधान की प्रति लेकर गए थे। देखना है संविधान को सूली पर चढाए जाने  की बरसी पर उनके हाथ में क्या होगा? भले ही राहुल अब मानते हैं कि आपातकाल गलत था लेकिन क्या उनमें इतना साहस है कि वे अपनी दादी द्वारा संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाए जाने की निंदा करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 June 2025

ये जंग उबाऊ हो चुकी है


अपने चिर परिचित नाटकीय अंदाज में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान और इजराइल के बीच लगभग दो सप्ताह से चल रही जंग रुकने का ऐलान कर दिया। इजराइल ने तो ये कहते हुए ट्रम्प से सहमत होते हुए कहा कि उसका उद्देश्य पूरा हो गया लिहाजा वह युद्ध रोकने तैयार है। दूसरी तरफ ईरान ने ट्रम्प की घोषणा से किनारा करते हुए कहा कि यदि इजराइल हमला नहीं करेगा तो  ईरान भी हमलावर नहीं रहेगा। हालांकि ट्रम्प के ऐलान के बाद ही उसने इजराइल पर  मिसाइलें दागीं। उधर इजराइल ने भी दावा किया कि उसने ईरान के एक और परमाणु वैज्ञानिक को मौत के घाट उतार दिया। ट्रम्प की घोषणा का आधार क्या है ये अभी तक किसी को नहीं पता। लेकिन एक बात जरूर सोचने में आ रही है कि तीन बड़े परमाणु संयंत्रों पर भारी बमबारी करने के बाद अमेरिका इस बात पर संतुष्ट है कि ईरान की परमाणु अस्त्र बनाने की क्षमता नष्ट हो चुकी है। इसके बाद युद्ध जारी रखने में उसके अपने हाथ भी जले बिना नहीं रहेंगे। दूसरी तरफ उसे इस बात की चिंता भी होने लगी कि ईरान ने कतर में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर  हमला करने के बाद प. एशिया में उसके अन्य अड्डों को निशाना बनाने की धमकी भी दे डाली। कूटनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद रूस की कड़ी प्रतिक्रिया और उसे परमाणु अस्त्र देने के संकेत ने ट्रम्प को चिंतित कर दिया। इजराइल के पास अस्त्र - शस्त्रों का भंडार खत्म होने की खबर ने भी अमेरिका को परेशान कर दिया। वैसे भी जंग अपना उद्देश्य खोती जा रही है। इजराइल खामेनेई की हत्या करने पर अड़ा हुआ था किन्तु ट्रम्प ने इससे साफ इंकार कर दिया। दूसरी तरफ ईरान को इजराइली हमले के बाद मुस्लिम देशों के अलावा रूस और चीन जैसी महाशक्तियों से वैसा समर्थन नहीं मिल सका जैसा अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों ने इजराइल का किया। कतर ने ईरान के हमले पर जिस  तरह की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया दिखाई उसके बाद उसे ये महसूस हुआ होगा कि वह अपने ही इलाके में घिर जाएगा। पाकिस्तान के दोगले रवैये ने भी खामेनेई को निराश कर दिया। हमास और हिजबुल्ला की कमर टूट जाने के बाद ईरान के लिए इजराइल को घेरना कठिन हो चुका था। और फिर भौगोलिक दूरी भी बड़ी दिक्कत है। इजराइल के पड़ोसी जोर्डन और इजिप्ट उसके साथ लड़ाई से तौबा कर चुके हैं। लेबनान भी पिट- पिटकर निराश हो चुका है। सीरिया के टुकड़े होने के बाद इजराइल को पड़ोस से घेरने वाला कोई बड़ा देश बचा नहीं। चूंकि सऊदी अरब ने इस युद्ध में पूरी तरह दूरी बना ली इसलिए भी ईरान को निराशा हुई। लेकिन एक बात जरूर है कि ईरान ने इजराइल ही नहीं अमेरिका को भी हतप्रभ। कर दिया। ऐसे में इजराइल और ईरान दोनों थकने लगे थे। अमेरिका भी सीधे जंग में उतरने का खामियाजा अफगानिस्तान में भुगत चुका है। ऐसे में अब ये जंग उबाऊ होने लगी है। लेकिन ईरान , अमेरिका के इकतरफा प्रस्ताव पर कितना भरोसा करेगा ये फिलहाल कहना कठिन है क्योंकि रूस और चीन उसे अमेरिका के निकट नहीं जाने देंगे। जहाँ तक इस जंग का वैश्विक प्रभाव है तो कच्चे तेल के संकट का खतरा मंडराने लगा है। इसके अलावा ईरान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा भी खाड़ी में उपद्रव मचाने की आशंका है। इजराइल की परेशानी ये है कि ईरान के हमलों ने इजराइल में जिस पैमाने पर तबाही मचाई उसके बाद उसके लिए भी पुनर्निर्माण समस्या है। ऐसे में युद्धविराम की जरूरत दोनों पक्षों को है। हालांकि डोनाल्ड ट्रम्प की बातों पर कितना भरोसा किया जाए ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 23 June 2025

अमेरिका के कूदने से ईरान के लिए खतरा बढ़ा

भारतीय समय के अनुसार रविवार की सुबह अमेरिका के लडाकू विमानों के दस्तों ने ईरान के उन तीन परमाणु केंद्रों पर अत्यंत शक्तिशाली बम बरसाए जो धरती के सैकड़ों मीटर नीचे जाकर भी  लक्ष्य को नष्ट कर सकते हैं।  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि ईरान की परमाणु अस्त्र बनाये जाने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी गई है। वहीं ईरान की मानें तो उसके परमाणु संयंत्रों को बहुत कम नुकसान हुआ क्योंकि हमले की आशंका के कारण उसने उक्त स्थलों से यूरेनियम वगैरह अन्यत्र स्थानांतरित कर दिये थे। सच्चाई जो भी हो किंतु  अमेरिका के शामिल होने से  ये जंग अब अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप लेने लगी है। प्रमाणस्वरूप रूस के पूर्व राष्ट्रपति का बयान भी आ गया जिसमें  ईरान को परमाणु अस्त्र देने की बात कही गई है। ऐसा ही आश्वासन उ. कोरिया के तानाशाह किम जोंग ने दे डाला जो अमेरिका के कट्टर दुश्मन हैं। अमेरिका विरोधी तमाम देश ईरान पर  हमले के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी व्यापक समर्थन मिलने से साबित हो गया है कि  दुनिया  शीत युद्ध वाले दौर में लौट  रही है। देखने वाली बात ये है कि ट्रम्प के अड़ियलपन से नाराज यूरोपीय देश भी इजराइल के समर्थक और ईरान द्वारा परमाणु अस्त्र बनाये जाने के घोर विरोधी हैं। मुस्लिम देशों द्वारा अमेरिकी हमले का दबी जुबान से विरोध भले किया जा रहा हो किंतु वे ईरान की मदद करने का साहस भी नहीं दिखा पा रहे। पाकिस्तान ने तो शनिवार को ही नोबल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प के नाम की अनुशंसा किया और कल अमेरिका के हमले की निंदा की। इस युद्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सवाल ये है कि क्या रूस और चीन भी ईरान की तरफ से, इजराइल पर वैसी ही कार्रवाई करेंगे? लेकिन यूक्रेन युद्ध में उलझे रूस के लिए ऐसा करना नामुमकिन है और रही बात चीन की तो उसकी विदेश नीति अब अमेरिका विरोध की बजाय आर्थिक हितों पर केंद्रित होकर रह गई है। ये  भी विचारणीय है कि जो रूस यूक्रेन की संप्रभुता को मानने तैयार नहीं है वह किस मुँह से इजराइल और अमेरिका को ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने का उपदेश दे रहा है? इसी तरह चीन भी ताइवान को हड़पने के लिए तैयार बैठा है। यदि अमेरिका का संरक्षण न होता तो उसके मंसूबे कभी के पूरे हो जाते।  इस्लामिक कट्टरता से नियंत्रित  ईरान में मानवाधिकारों का जो कत्ल होता आया है उसके कारण उसकी छवि मुस्लिम देशों के बीच भी बहुत अच्छी नहीं है। महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की जो घटनाएं जानकारी में आईं वे किसी सभ्य समाज में तो स्वीकार्य नहीं हो सकतीं। ईरान में शिया मुसलमानों, का बाहुल्य भी उसे अन्य मुस्लिम देशों से दूर करता है जहाँ सुन्नियों का प्रभाव है। शिया और सुन्नी दोनों इस्लाम के अनुयायी होने के बाद भी एक दूसरे से घृणा करते हैं। इसीलिए ईरान और ईराक के बीच 10 साल तक युद्ध चला जिसमें लाखों लोगों की जान चली गई। ईरान के पड़ोसी पाकिस्तान में भी शिया  असुरक्षित हैं। सऊदी अरब भी ईरान को पसंद नहीं करता। दूसरी तरफ अमेरिका ने अनेक मुस्लिम देशों को अपने प्रभाव में ले लिया है। वहाँ उसके सैनिक अड्डे भी हैं। स्मरणीय है सीरिया में जब रूस समर्थक तानाशाह असद की सत्ता के विरुद्ध चला आ रहा विद्रोह कामयाबी के नजदीक पहुंचा तब असद सपरिवार मास्को भाग गए क्योंकि यूक्रेन के साथ लड़ाई के चलते रूस की सेनाएं मदद करने में असमर्थ साबित हुईं। नतीजा सीरिया के कई टुकड़ों के रूप में सामने आया जिसमें गोलान हाइट्स  पर इजराइल ने कब्जा जमा लिया। ऐसे में  यदि ये लड़ाई ज्यादा चली जिसका संकेत ईरान द्वारा ट्रम्प का शांति वार्ता प्रस्ताव ठुकराने से मिला तब क्या  खामेनेई अपने देश को एकजुट रख पाएंगे ये सवाल उठ खड़ा हुआ  है। ईरान के तमाम वैज्ञानिक और सैन्य जनरल मारे जा चुके हैं। याद रहे  जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के खात्मे के लिए ईराक पर हमला किया तब भी रूस और चीन सहित दुनिया के तमाम देश ईराक के पक्ष में बयानबाजी से ज्यादा कुछ न कर सके। अंततः सद्दाम का खात्मा हो गया। अमेरिका और इजराइल की मजबूरी ये है कि वे खामेनेई को घायल करके नहीं छोड़ सकते क्योंकि तब वे अमेरिका के सबसे बड़े विरोधी के तौर पर मान्य होंगे जो  इजराइल के अस्तित्व के लिए खतरा होगा। इस कारण ईरान के लिए इस लड़ाई से विजेता बनकर निकलना आसान नहीं है क्योंकि कोई भी महाशक्ति उसके साथ उस  तरह नहीं दिख रही जैसे अमेरिका ने इजराइल की पीठ पर हाथ रखा हुआ है। यदि खोमेनेई तेल आपूर्ति के समुद्री मार्ग बाधित करने जैसा कदम उठाते हैं तब वे सहानुभूति खो बैठेंगे। कुल मिलाकर ये लड़ाई अब  अमेरिका और ईरान के बीच हो गई है। इसके विश्वयुद्ध में परिवर्तित होने की संभावना फिलहाल तो ज्यादा नहीं है क्योंकि रूस और चीन  युद्ध से दूर ही रहेंगे जिसे  अमेरिका  भांप चुका है। सीरिया में असद की सत्ता के पतन ने उसका हौसला मजबूत कर दिया है। ईरान की  मिसाइलें  इजराइल को नुकसान तो पहुंचा रही हैं किंतु इजराइल के हमलों के कारण उसकी सैन्य क्षमता रोजाना कमजोर हो रही है। खामेनेई का सामने न आना और अपने उत्तराधिकारी का चयन गिरते मनोबल का प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 21 June 2025

भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में योग का उल्लेखनीय योगदान

 वर्ष पूर्व  सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर आध्यात्म आधारित  भारतीय जीवन शैली को प्रचारित करने के लिए सं. रा. संघ से योग को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता दिलवाने का  प्रयास शुरू किया । आखिरकार 2015 में  विश्व संस्था ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। शुरुआत में देश के भीतर ही इसका मजाक उड़ाया गया। चूंकि योग गुरु बाबा रामदेव के पिछली सत्ता से अच्छे रिश्ते नहीं थे इसलिए धर्मिनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े बैठे तबके को योग का विश्व भर में प्रतिष्ठित होना नागवार गुजरा क्योंकि इससे भारतीय संस्कृति  वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित होने लगी। प्रारंभ में ये लगा भी कि अन्य अंतर्राष्ट्रीय दिवसों की तरह योग दिवस भी बधाईयों के आदान - प्रदान जैसी रस्म अदायगी में फंसकर रह जाएगा किंतु एक - दो वर्ष के भीतर ही दुनिया के बड़े हिस्से में उसके प्रति रुचि और जागरूकता देखने मिलने लगी। अब तो सैकड़ों  ऐसे देशों में योग को एक आदर्श व्यायाम पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा चुका है जिनका भारतीय संस्कृति से दूरदराज का संबंध नहीं है। भारत में योग को सनातन धर्म  से जोड़कर विरोध करने वाले मज़हबी वर्ग के लिए भी ये किसी धक्के से कम नहीं था कि अनेक मुस्लिम और ईसाई बाहुल्य देशों तक में  योगाभ्यास दैनिक जीवनचर्या  से जुड़ गया। भारतीय ज्ञान परंपरा को विज्ञान की कसौटी पर अंधविश्वास  बताने वाले विकसित  देशों ने भी योग और उसके जरिये की जाने वाली ध्यान साधना की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हुए उसे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक शांति हासिल करने का सशक्त साधन माना। बीते दशक  में भारत की जो उज्ज्वल  छवि विश्व में निर्मित हुई उसमें योग का योगदान भी उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी अक्सर भारत के विश्वगुरु बनने का विश्वास व्यक्त करते हैं। लेकिन  उनके आलोचक उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते । यदि गंभीरता से सोचें तो आर्थिक या सैन्य महाशक्ति बनने से अलग हटकर भारत का जो वास्तविक सम्मान है वह उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पूंजी के कारण ही है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने जब 21 वीं सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी तब उनके मन में आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में हासिल होने वाली उपलब्धियां न होकर  सनातन संस्कृति के वैश्विक प्रसार की कल्पना ही थी। हालांकि विभिन्न आध्यात्मिक विभूतियों ने भी  विदेशों में धर्म और आध्यात्म का प्रचार करते हुए भारत के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न करने का सराहनीय कार्य किया किन्तु योग के विश्वव्यापी होने से वैश्विक परिदृश्य पर भारत की छवि ऐसे देश के तौर पर बन गई जिसका प्राचीन ज्ञान आज भी मानव तन और मन की बेहतरी  में चमत्कारिक योगदान देता है। योग के फायदों का प्रायोगिक परीक्षण पूरी दुनिया में लंबे समय से होता आया है। उनके जो निष्कर्ष निकले उन्हीं के आधार पर उसकी उपयोगिता को स्वीकार्यता मिली। सं .रा.संघ ने भी पूरे अध्ययन के उपरांत ही 21 जून को विश्व योग दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बाबा रामदेव ने राष्ट्रीय स्तर पर उसे  घर - घर में लोकप्रिय बनाने का कार्य किया। साथ ही  विदेशों में भी  इसके प्रति आकर्षण पैदा किया। अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के अनेक प्रसिद्ध चिकित्सक भी दवाओं के साथ योग और ध्यान की सलाह देने लगे हैं। उस दृष्टि से आज का दिन समूचे देश के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है। जो लोग पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की तुलना में भारतीय ज्ञान और उससे संबद्ध जीवनशैली को पिछड़ेपन की निशानी मानकर उसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें विश्व स्तर पर योग की बढ़ती स्वीकार्यता  को देखकर नये सिरे से अपनी राय बनानी चाहिए। प्रधानमंत्री के रूप में श्री मोदी की नीतियों से असहमति रखना लोकतंत्र में सामान्य बात है किन्तु उन्होंने योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में जो सफलता प्राप्त की उसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 20 June 2025

सांप को गले में लटकाने वाली गलती कर बैठे ट्रम्प

भारत - पाकिस्तान में हुए  युद्ध के अचानक रुकने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड  युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने लगे और  पाकिस्तान को भारत के बराबर बताने की जुर्रत भी कर बैठे। भारत में विपक्षी दलों ने इसे  विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। अमेरिका की तरफ से लगातार ऐसा कुछ किया जाता रहा जिससे लगा कि वह भारत को छोड़ पाकिस्तान के पक्ष में झुक रहा है। हालांकि ये अमेरिका की पुरानी नीति है जिसके अंतर्गत वह उसकी आर्थिक , सैनिक और कूटनीतिक सहायता करता रहा। कश्मीर मुद्दे पर भी उसका रुख ज्यादातर उसी के हक में ही नजर आया। लेकिन अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रुख कड़ा होने लगा। कारगिल युद्ध के बाद  अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते सुधरने लगे। इसमें तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी काफी योगदान रहा। हालांकि अमेरिका में रहने वाले अप्रवासी भारतवंशियों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। ये बात भी गौरतलब है कि आर्थिक क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदमों ने भी दोनों देशों को नजदीक लाने का काम किया। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका से रिश्तों का अच्छा समय शुरू हुआ। डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल में उनकी और श्री मोदी की जुगलबंदी काफी चर्चित रही। उनके बाद जो बाइडेन के दौर में रिश्तों में उतार चढ़ाव आये लेकिन स्थिति तब चिंताजनक हुई जब 2024 के लोकसभा चुनाव में बाइडेन के करीबी जॉर्ज सोरोस  ने भाजपा को हराने का कुचक्र रचा।बांग्ला देश में शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट और युनुस की ताजपोशी में अमेरिका की भूमिका भी भारतीय हितों के विपरीत रही। लेकिन ट्रम्प जब दोबारा सत्ता में आये तब उनका शुरुआती रुझान भारत के तरफ दिखा। बांग्ला देश पर उन्होंने अनेक प्रतिबंध लगाए। श्री मोदी के साथ  अपनी निकटता जाहिर करने में भी वे पीछे नहीं रहे। लेकिन पहलगाम की आतंकी घटना के बाद के घटनाक्रम में अमेरिका का रवैया जिस तेजी से बदला वह चौंकाने वाला था। जबकि उक्त घटना के समय उसके उपराष्ट्रपति भारत यात्रा पर ही थे। आतंकवादियों की निंदा  तो वॉशिंगटन ने की किंतु पाकिस्तान को कसूरवार मानने से पीछे हट गया। और जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया तब अमेरिका की ओर से आये बयानों से लगा कि पाकिस्तान की पिटाई से वह परेशान हो उठा। युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने के अलावा कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश कर ट्रम्प भारत के पुराने घाव कुरेदने की शरारत की। लड़ाई रुकने के बाद ये खबर भी तेजी से उड़ी कि भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के जिन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया उनमें से एक परमाणु संयंत्र का हिस्सा था। और उसमें रखी आण्विक सामग्री का संबंध अमेरिका से था।स्मरणीय है युद्धविराम करवाने के लिए अपने हाथों अपनी पीठ ठोकने वाले ट्रम्प ने ये भी कहा था कि  ऑपरेशन सिंदूर जारी रहता तो नौबत परमाणु अस्त्रों के उपयोग तक चली जाती। वहाँ तक तो फिर भी बात ठीक थी किंतु लड़ाई रुकने के बाद पाकिस्तान को अपना दोस्त बताना , उसे अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज दिलवाना और फिर उसके सेना प्रमुख को ट्रम्प द्वारा व्हाइट हाउस में भोज पर बुलाने जैसे कदमों से ये साफ है कि कभी श्री मोदी को अपना दोस्त बताने वाले ट्रम्प ने जबरदस्त पलटी मारी है। लेकिन धीरे - धीरे अब पूरा खेल उजागर होने लगा है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे  युद्ध के दौरान भारत की तटस्थता  अमेरिका को नागवार गुजरी थी। रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को नजरंदाज करते हुए भारत ने उससे कच्चा तेल और अस्त्र - शस्त्र खरीदना जारी रखा। फ्रांस से किये गए लड़ाकू विमान सौदे ने भी अमेरिका को नाराज किया। लेकिन ट्रम्प ने बीते कुछ हफ़्तों में जो हल्कापन दिखाया उसके पीछे इजराइल और ईरान के बीच युद्ध ही है। ये तो सभी जानते हैं कि इजराइल ने जो हमला किया उसकी पूरी योजना अमेरिका द्वारा बनाई गई है। इजराइल के घनिष्ट रिश्तों के बाद भी भारत ने अभी तक उसकी  सैन्य कारवाई का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा भारत अपनी धरती का उपयोग करने की अनुमति अमेरिका को नहीं देगा। ट्रम्प ने यही देखते हुए पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखते हुए भारत की उपेक्षा करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बजाय सेना प्रमुख को साथ बिठाकर भोजन करवाने का उद्देश्य ईरान के विरुद्ध सैन्य कारवाई के लिए पाकिस्तान के हवाई अड्डों के उपयोग की छूट हासिल करना था।  पाकिस्तान का दोगलापन ऐसे मामलों में जगजाहिर है। अफ़ग़ानिस्तान में जब तालिबानी, लड़ाके अमेरिकी कब्जे के विरुद्ध लड़ रहे थे तब पाकिस्तान ने उन्हें अपने यहाँ अड्डे बनाने की अनुमति दे दी। वहीं दूसरी तरफ तालिबानी सैन्य दस्तों पर हवाई हमले करने वाले अमेरिकी विमान भी पाकिस्तानी हवाई अड्डों से उड़ान भरते थे। ट्रम्प ईरान पर हमले के लिए भी यही तरीका अपना रहे हैं। वे इसमें कितने सफल होंगे ये तो पता नहीं किंतु  आतंकवादियों को पालने वाले  देश को गोद में बिठाकर ट्रम्प ने गले में सांप  लटकाने वाली गलती कर दी है। वे भूल गए कि 9/ 11  के दोषी ओसामा बिन लादेन को शरण देने वाला कोई और नहीं पाकिस्तान ही था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 19 June 2025

ईरान और इजराइल भी अंतहीन युद्ध में फंस सकते हैं

रान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खोमेनेई द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  द्वारा आत्मसमर्पण की सलाह के सामने झुकने के बजाय युद्ध जारी रखने की घोषणा करने के बाद  इजराइल पर और भी शक्तिशाली मिसाइलें दाग दीं। साथ ही अमेरिका को ये चेतावनी भी दे डाली कि यदि वह इस लड़ाई में कूदा तो उसे इसका अंजाम भोगना पड़ेगा। खोमेनेई ने ये धमकी ट्रम्प के उस बयान के बाद दी कि ईरान को बिना शर्त आत्मसमर्पण करना होगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें पता है कि खोमेनेई कहां छिपा हुआ है किंतु अमेरिका उन्हें मारने का पक्षधर नहीं है जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ईरान के धार्मिक नेता को मारने की ज़िद पर कायम हैं और उसी के बाद युद्ध रोकने की बात बोल रहे हैं।  हालांकि इजराइली हमलों ने ईरान में जबदस्त तबाही मचा दी है । सैकड़ों लोगों को मौत का शिकार भी होना पड़ा। परमाणु संयंत्रों के अलावा तेल शोधन इकाइयों और तेल भंडारों पर हुई बम वर्षा के द्वारा ईराक के हौसले पस्त करने का प्रयास इजराइल की तरफ से लगातार जारी है। पलटवार तो ईरान भी कर रहा है किंतु उसमें रणनीति कम और खीझ ज्यादा लग रही है। ऐसा लगता है खामेनेई का ठिकाना मालूम होने के बाद भी उनको जान से मारने से परहेज जताकर ट्रम्प ने ईरान को फुसलाने का दांव चला किंतु खामेनेई ने साफ शब्दों में उसे ठुकराकर अमेरिकी राष्ट्रपति को ठेंगा दिखा दिया। ये मामला जिस तरह उलझता जा रहा है उससे लगता है कि अब इजराइल से ज्यादा ये अमेरिका विशेष रूप से ट्रम्प की नाक का सवाल बन  गया है। हालांकि बीते छह महीनों में उन्होंने अपने अस्थिर स्वभाव के चलते जिस गैर जिम्मेदाराना रवैये का परिचय पूरे विश्व को दिया उसके कारण अमेरिका के राष्ट्रपति पद का रुतबा कम हुआ है। संकट में फंसे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की तक ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प के दुर्व्यव्हार से तंग आकर उनसे उसी तरह ऊँची आवाज में बात करने का साहस दिखाया था। जेलेंस्की मूलतः हास्य कलाकार हैं । हालांकि  रूस जैसी महाशक्ति से भिड़ने के उनके फैसले को बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं माना जाता किंतु अब वे हास्य कलाकार की छवि से उबर चुके हैं जबकि डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतों से उनकी छवि जोकरों जैसी बन गई है। यही वजह है कि वे कब क्या बोलते हैं ये अंदाज लगा पाना कठिन है। ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका खुलकर इजराइल के साथ है। लेकिन ट्रम्प के बयानों से उनके देश की नीति स्पष्ट नहीं हो पाती। एक दिन वे दोनों में युद्धविराम करवाने के लिए सक्रिय दिखते हैं किंतु अगले दिन तेहरान खाली करने और ईरान के आण्विक कार्यक्रम को किसी भी कीमत पर रोकने की धमकी देते हैं। नेतन्याहू जहाँ ईरानी सुप्रीमो की जान लेने आमादा हैं वहीं ट्रम्प इसके खिलाफ हैं। बेहतर हो जिस तरह रूस और चीन दूर बैठकर भी ईरान की सहायता कर रहे हैं ठीक वैसे ही अमेरिका को इजराइल का साथ देना चाहिये जो उसकी स्थायी नीति है। लेकिन यदि ईरान की आण्विक शक्ति बनने से रोकना उसकी प्राथमिकता है तब अमेरिका खुद क्यों नहीं  लड़ाई में कूद पड़ता? ईरान के निकटवर्ती समुद्र में उसने अपने युद्धपोत की तैनाती  भी इसी उद्देश्य से की है। इजराइल के हमलों ने ईरान के अनेक परमाणु संयंत्रों  को नेस्तनाबूत कर दिया है। तेहरान खाली करने की चेतावनी नेतन्याहू भी देते आ रहे हैं जिसका असर भी दिखाई दे रहा है। यद्यपि इजराइल द्वारा की जा रही बमवर्षा ने राजधानी के बड़े इलाके को खण्डहर में तब्दील कर दिया है किंतु जिस तरह खामेनेई भी मुकाबले के लिए तैयार हैं उसे देखते हुए ये कहना ही पड़ेगा कि अभी ईरान ने हिम्मत नहीं हारी वरना खामेनेई ने ट्रम्प की चेतावनी को इतने हल्के में न लिया होता। ऐसा लगता है रूस और चीन की तरफ से गोपनीय रूप से सैन्य सहायता या आपातकालीन स्थिति में कूटनीतिक सहयोग का आश्वासन खामेनेई को मिला है। सच्चाई जो भी हो लेकिन इजराइल और ईरान के अलावा बड़ी शक्तियाँ यदि इस विवाद में शामिल हुईं तो फिर ये जंग यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे अंतहीन युद्ध का रूप ले लेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 18 June 2025

ट्रम्प ही दुनिया का भाग्य तय करेंगे तो सं.रा.संघ की क्या उपयोगिता

न - इजराइल युद्ध में अमेरिका की भूमिका अब पूरी तरह सामने आ चुकी है। गत दिवस कैनेडा में चल रही  जी- 7 की बैठक छोड़कर अमेरिका लौटते समय की गई राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की  वह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण थी कि मसला युद्धविराम से भी बड़ा है। उसके बाद  ये बयान भी आ गया कि अमेरिका को पता है कि ईरान का सर्वोच्च धार्मिक नेता खामेनेई कहाँ छिपा है लेकिन वह उसे मारेगा नहीं किंतु उसे बिना शर्त आत्म समर्पण करना होगा। यद्यपि उनके विपरीत  इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू , खामेनेई को जान से मारने की जिद पर कायम हैं। अमेरिका द्वारा ईरान के निकट अपने समुद्री बेड़े की तैनाती की गई है ताकि जमीन के काफी नीचे सुरक्षित ईरान के  परमाणु संयंत्र को नष्ट करने में सक्षम बेहद शक्तिशाली बमों का उपयोग किया जा सके जिसके लिए विशेष विमानों की जरूरत होती है। सवाल ये है कि जो ट्रम्प  दो दिन पहले तक युद्धविराम करवाने के लिए उछलकूद कर रहे थे वे ईरान को बिना शर्त आत्म समर्पण के लिए क्यों धमकाने लगे? सही बात ये है कि इजराइल के कंधों पर बन्दूक रखकर अमेरिका ने ईरान को बर्बाद करने का अपना मंसूबा पूरा कर लिया। कट्टरपंथी इस्लामिक सत्ता चला रहे खामेनेई को जान से नहीं मारने की बात कहने वाले ट्रम्प  आत्म समर्पण के बाद उन्हें बख़्श देंगे इसकी क्या गारंटी है? हालांकि जिन तरह खामेनेई और बाकी ईरानी नेता इजराइल और अमेरिका को धमकाया करते थे वह भी औकात से ज्यादा था। ईरान भौगोलिक  दृष्टि से बड़ा देश है और उसने अपनी सैन्य शक्ति में भी काफी वृद्धि की है। इस युद्ध में उसने इसका प्रमाण भी दे दिया किंतु उसको ये समझ लेना चाहिए था कि इजराइल को अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और फ्रांस जैसी महाशक्तियों का  समर्थन तथा संरक्षण प्राप्त है। इस युद्ध में ईरान विनाश की जिस स्थिति में आ पहुंचा है वहाँ से उबरने में उसे लम्बा समय लगेगा और कहीं खामेनेई ने आत्मसमर्पण कर दिया तब तो उसके और भी बुरे दिन आ जाएंगे क्योंकि इजराइल और अमेरिका उसे फिर पनपने नहीं देंगे। उस दृष्टि से इजराइल और अमेरिका अपने मकसद में काफी कुछ तो सफल हो चुके हैं। गौरतलब है ईरान के साथ खड़े देशों ने इजराइल की निंदा भले ही की किंतु अमेरिका के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं दिखाया। इजराइल के विरुद्ध सैन्य कारवाई की हिम्मत भी किसी की नहीं हुई। ट्रम्प ने जिस प्रकार खामेनेई को धमकाया उसका भी कोई विरोध नहीं हो रहा। नेतन्याहू  ने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या किये बिना युद्ध खत्म नहीं होने जैसी जो टिप्पणी की वह सामान्य  नहीं क्योंकि दो देशों के बीच होने वाली लड़ाई में एक - दूसरे के राष्ट्र प्रमुख को मारने की जिद अटपटी है। हालांकि ईराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के प्रति भी अमेरिका का यही रवैया था और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई। ट्रम्प जबसे दोबारा राष्ट्रपति बने उनका आचरण  कूटनीतिक शिष्टाचार के एकदम विरुद्ध है। कैनेडा में उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रो के बारे में हल्की टिप्पणी कर डाली। रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः व्लादिमिर पुतिन और शी जिनपिंग को लेकर भी वे ऊलजलूल कटाक्ष करते रहे। लेकिन समूचे परिदृश्य को देखने के बाद ये देखकर आश्चर्य और चिन्ता दोनों  हैं कि जब मानवता पर तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा मंडरा रहा हो तब सं. रा.संघ क्या कर रहा है ? यदि ट्रम्प ही दुनिया का भाग्य तय करेंगे तब विश्व संगठन किस काम के लिए बनाया गया? स्मरणीय है कि ट्रम्प कई बार सं. रा. संघ और उसके अंतर्गत आने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं को अनुपयोगी बताकर अमेरिकी अंशदान  देने के प्रति भी अरुचि दिखा चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी वे असंतुष्ट हैं। इन सबसे लगता है  वे पूरी दुनिया को अपनी मर्जी से हांकना चाहते हैं। ये बात सही है कि सं. रा. संघ पर अमेरिका का दबाव और प्रभाव हमेशा रहा है किंतु  यूक्रेन - रूस ,इजराइल -  हमास,  और अब ईरान - इजराइल के बीच लड़ाई के संदर्भ में विश्व संस्था की भूमिका मूकदर्शक जैसी होकर रह गई। पहले दो युद्ध बरसों से जारी हैं। इसी तरह ईरान और इजराइल की ये लड़ाई भी समूचे विश्व को संकट में डालने वाली है। ये देखते हुए सं.रा.संघ को साहस के साथ आगे आना चाहिए। दुर्भाग्य से वह वीटो अधिकार संपन्न पांच देशों के शिकंजे में फंसकर रह गया है। ये देखते हुए उसका होना न होना बराबर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 17 June 2025

जंग अंजाम तक पहुंची तो अरब जगत में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा


इजरायल और ईरान की जंग जिस स्थिति में आ गई है वहाँ से इजराइल के लिए पीछे हटना बेहद कठिन है। इसीलिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कभी जंग रुकवाने के लिए सक्रिय होते हैं किंतु कुछ देर बाद ईरान को धमकाने में जुट जाते हैं। सर्वविदित है कि इजराइल की पीठ पर अमेरिका का हाथ  है। प्रमुख मुस्लिम देश भी  या तो अंदर - अंदर इजराइल के साथ हैं या दूर से तमाशा देख रहे हैं। अरब जगत एकजुट होकर ईरान की तरफदारी करता तब अमेरिका के लिए भी इजराइल को पूरी छूट देना आसान नहीं रहता। यद्यपि ईरान ने भी काफी दमखम दिखाया क्योंकि  इजराइल के सुरक्षा आवरण को भेद पाना वाकई कमाल की बात है किंतु ईरानी प्रत्याक्रमण से विचलित हुए बिना इजराइल के लड़ाकू विमान सैन्य ठिकानों के अलावा हर  महत्वपूर्ण संस्थान और हस्ती को निशाना बनाकर ईरान का हौसला पस्त कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि इजराइल के अस्तित्व को मिटाने की डींग हांकने वाले ईरान के कट्टरपंथी शासक अब युद्धविराम के पैग़ाम भेज रहे हैं। दूसरी तरफ इजराइल ने तेहरान खाली करने का फरमान जारी करते हुए  ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का इरादा व्यक्त करते हुए ये संकेत दे दिया है कि वह ईरान को  घुटनाटेक करवाने पर आमादा है। इन हालातों में  पूरी दुनिया में डर है कि ये बात कहीं परमाणु अस्त्रों के उपयोग तक न पहुँच जाए क्योंकि ईरान को हुए बड़े नुकसान के बाद भी उसके कुछ भूमिगत परमाणु संयंत्रों को नष्ट कर पाना इजराइल के लिए असंभव है और इसीलिए उसने अमेरिका  से आग्रह किया है कि वह ये काम करे क्योंकि उसके पास ही ऐसे शक्तिशाली बम हैं जो जमीन के सैकड़ों  फीट नीचे तक नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि अमेरिका सीधे युद्ध से बचते हुए ईरान को आण्विक हथियार बनाने से रोकने का लक्ष्य लेकर चल रहा है । कैनेडा में चल रहे जी - 7 सम्मेलन को छोड़कर ट्रम्प का अमेरिका लौट आने का  कदम किसी बड़े फैसले का संकेत है।  इधर  नेतन्याहू द्वारा तेहरान खाली करने का आदेश देने के साथ ही खामेनेई के खात्मे की रट लगाने से लगता है अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान में इस्लामिक कट्टरपंथी सत्ता को उसी तरह हटाने में जुट गए हैं जैसे कुछ दशक पूर्व ईराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन को युद्ध के जरिये गद्दी से उतारकर मृत्युदंड दे दिया। ये योजना किस हद तक कामयाब होगी ये आज की स्थिति में कोई बताने की स्थिति में नहीं है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपने शत्रु से निपटने के मामले में बेहद सख्त माने जाते हैं। गाजा में जिस तरह की तबाही इजराइल ने मचाई वह इसका उदाहरण है। लेकिन ईरान बड़ा  देश तो है ही उसके पास अपना सैन्य तंत्र भी है। जिसका प्रमाण  तेल अबीब में मिसाइलें गिराकर वह दे चुका है। आने वाले कुछ ही समय में उसके द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने की आशंका ने ही अमेरिका को चौंका दिया और इसीलिए पहले दिन से ही इजराइल के हमलों में परमाणु संयंत्रों को नुकसान पहुंचाकर ईरान की आक्रामक क्षमता खत्म करने का प्रयास देखने मिला। अब ट्रम्प द्वारा नेतन्याहू को युद्ध रोकने की सलाह दी जाती है या वे आग में और घी डालने का काम करेंगे ये उनके अलावा कोई नहीं बता सकता क्योंकि उनकी सनक और ऊलजलल बयानबाजी कूटनीतिक मापदंडों के सर्वथा विपरीत है। बहरहाल युद्ध से विश्व व्यापार और आवागमन प्रभावित होने लगा है। अनेक देशों के हवाई मार्ग बंद होने से विमान सेवाएं अवरुद्ध हो रही हैं। कच्चे तेल के दाम उछलने लगे हैं जिनसे भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा जो इसका 85 फीसदी आयात करता है। ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के अलावा अमेरिका वहाँ इस्लामिक सत्ता को हटाकर अपने अनुकूल शासक बिठाना चाह रहा है जिससे उसकी तेल संपदा का मनमाफिक दोहन कर सके। इसलिए  ये जंग अंतिम परिणाम तक जारी रही तो अरब जगत का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा। सही बात ये है मुस्लिम देशों में भी अब दुबई और अबूधाबी जैसा बनने की तलब पैदा हो चुकी है जिनने  इस्लामिक स्वरूप को बरकरार रखते हुए भी अपने को आधुनिक और विकसित स्वरूप प्रदान किया। हो सकता है ईरान में भी शाह युग लौटे क्योंकि खामेनेई की इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध वहाँ विद्रोह की जो चिंगारी दबी हुई है वह जरा सी हवा मिलते ही भड़क सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 16 June 2025

पचमढ़ी में दी गई सीख हवा- हवाई होकर न रह जाए


भाजपा का पचमढ़ी प्रशिक्षण वर्ग संपन्न हो गया। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उपस्थित जनप्रतिनिधियों को साफ - साफ समझा दिया कि वे अपनी सफलता पर आत्ममुग्ध न हों क्योँकि ये सब पार्टी की लोकप्रियता का प्रतिफल है और इसके पीछे जनसंघ से लेकर आज तक कई पीढ़ियों की तपस्या है।   उपस्थित सांसद - विधायकों और मंत्रियों को सोच - समझकर बयानबाजी करने, सोशल मीडिया का उपयोग करते समय सावधानी बरतने और सार्वजनिक आचरण का उच्च स्तर बनाये रखने की सीख श्री शाह के अलावा सत्ता और संगठन से जुड़े अन्य नेताओं द्वारा दी गई। पार्टी और सरकार के फैसलों के बारे में बोलते समय संयम और  समझदारी का परिचय देने की नसीहत भी इस आयोजन का हिस्सा थी। वैसे तो भाजपा में समय - समय पर रास्वसंघ की तर्ज पर इस तरह के आयोजन होते रहते हैं किंतु ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रदेश सरकार के दो  वरिष्ट मंत्रियों के बयानों से उत्पन्न विवाद ने पूरे देश में पार्टी को शर्मिंदा होने मजबूर कर दिया। विजय शाह नामक मंत्री के विरुद्ध तो उच्च न्यायालय ने  स्वतः संज्ञान लेकर  आपराधिक प्रकरण दर्ज करने का आदेश दिया।  दूसरा मामला उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के बयान से संबद्ध है। अपने नेताओं खासकर जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक बयानों के साथ ही सोशल मीडिया पर टिप्पणियों में संयम और सावधानी बरतने का सबक सिखाने उक्त वर्ग रखा गया। सत्ता में लंबे समय से रहने के कारण भाजपा में भी अनेक ऐसी बुराइयाँ दिखने लगी हैं जिनके लिए वह कांग्रेस को कोसा करती थी। श्री शाह ने इसीलिए जनप्रतिनिधियों को  चेतावनी दे डाली कि चुनाव जीत जाने के बाद आसमान पर उड़ने की बजाय अपने पाँव जमीन पर टिकाए रखें। विवादित बयानों के बारे में उन्होंने दो टूक कह दिया कि गलती एक बार ही बर्दाश्त की जाएगी, दोबारा नहीं।  शिविर में उपस्थित जनप्रतिनिधियों पर उक्त  उपदेशों का कितना असर हुआ ये तो कह पाना मुश्किल है किंतु पार्टी नेतृत्व की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने इस बात को महसूस किया कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के साथ ही मंत्री जैसे जिम्मेदार पदों पर विराजमान अनेक  नेताओं के बयानों में गंभीरता और शालीनता का अभाव होता है । सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर सक्रिय रहते हुए उनका समुचित उपयोग करने की अपेक्षा तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते हैं किंतु इन पर की जाने वाली टिप्पणियों में  छोटी सी चूक भी बड़ा नुकसान कर बैठती है। दरअसल सत्ता में आने के बाद भाजपा में ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है जिन्हें उसके इतिहास, मौलिक सिद्धांत और नीतियों में रत्ती भर रुचि नहीं है। उनका मकसद येन - केन - प्रकारेण सत्ता का दोहन करना है। लेकिन कुछ पुराने नेता भी ऐसे  हैं जो सत्ता के मद में अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रख पाते। केन्द्र और राज्य सरकारों के जनहितैषी  कार्यों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के स्थान पर वे अपनी दुकान सजाने में जुटे देखे जा सकते हैं। इसी तरह  लगातार चुनाव जीतने वाले कतिपय नेताओं को ये घमंड हो चला है कि उनकी जीत  निजी लोकप्रियता के कारण होती है। ऐसे नेता ही पार्टी पर हावी होने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं। मंत्रीपद और टिकिट से वंचित किये जाते ही इनके बगावती तेवर इस बात का प्रमाण होते हैं कि पार्टी के प्रति इनकी निष्ठा दिखावटी है। श्री शाह ने  स्पष्ट शब्दों में  ऐसे ही जनप्रतिनिधियों को ये समझाइश दी कि वे अपनी सीमाओं के भीतर ही रहें और खुद को पार्टी से बड़ा समझने की जुर्रत न करें। भाजपा संगठन आधारित पार्टी है जिसकी पहिचान अलग हटकर है। लालकृष्ण आडवाणी ने इसीलिए इसे पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। यद्यपि सत्ता में आने के लिए पार्टी ने कई बेमेल गठबंध किये  और ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल कर महत्वपूर्ण पदों से भी उपकृत किया जिनको वह दागी ठहराया करती थी। बावजूद उसकी मूलभूत नीतियों के कारण वह लोकप्रिय बनी हुई है। लेकिन ऐसा ही एक जमाने में कांग्रेस के साथ था । आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने की पुण्याई जुड़ी होने से उसकी बड़ी - से बड़ी गलतियां जनता नजरंदाज करती रही किंतु एक सीमा के बाद जनता का धैर्य भी जाता रहा। प. बंगाल का वामपंथी किला अभेद्य समझा जाता था किंतु समय आने पर वह भी धराशायी हो गया। ऐसे में यदि भाजपा समय रहते अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सत्ता की अंतर्निहित बुराइयों से बचाये रखने प्रयासरत है तो ये सकारात्मक कदम है। लेकिन पचमढ़ी वर्ग के बाद भी उसे ये देखते रहना होगा कि पचमढ़ी में मिली सीख हवा - हवाई होकर न रह जाएं। पचमढ़ी में मिली सीख हवा - हवाई होकर न रह जाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 14 June 2025

ईरान पर इजराइल का हमला अमेरिका की रणनीति का हिस्सा


हालांकि जबसे इजराइल और हमास के बीच जंग शुरू हुई तभी से ईरान भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उससे जुड़ा हुआ था। ये कहना भी गलत नहीं है कि हमास नामक इस्लामिक उग्रपंथी संगठन का गाजा पर आधिपत्य ईरान की सहायता से ही हुआ और वही उसे पूरी तरह से संरक्षण देता आ रहा है। इजराइल पर हमास ने जो पहला हमला किया उसके पीछे भी ईरान का ही दिमाग बताया जाता है। हमास के तमाम बड़े नेता भी ईरान में रहते हुए ही इजराइल विरोधी गतिविधियां संचालित करते आये हैं जिनमें से कुछ को इजराइल ने अपनी अचूक मिसाइलों से मार गिराया। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की किंतु इजराइल के सुरक्षा प्रबंध के सामने वह कमजोर साबित हुआ। लेकिन छिटपुट आक्रमण और प्रत्याक्रमण से आगे बढ़कर दो दिन पूर्व इजराइल ने ईरान पर जबरदस्त हमला बोलते हुए उसके रक्षा प्रतिष्ठानों के साथ ही परमाणु संयंत्रों को तो नुकसान पहुंचाया ही उसके अनेक सेनाध्यक्षों को भी मौत की नींद सुला दिया। जवाब में ईरान ने ड्रोन से जो हमला किया वह तो इजराइल के एयर डिफेंस ने नाकाम कर दिया किंतु कुछ मिसाइलें  राजधानी तेल अबीब में गिरने ने जान - माल का नुकसान हुआ। दोनों तरफ से आरपार की लड़ाई के संकेत मिल रहे हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को धमकी दे डाली कि यदि वह परमाणु निषेध संधि पर हस्ताक्षर नहीं करता तो बर्बाद होने तैयार रहे। जानकार सूत्रों का कहना है कि ईरान जल्द ही आण्विक परीक्षण करने वाला था। अमेरिका को इसकी भनक लगते ही उसने इजराइल के जरिये उसकी तैयारी पर पानी फेरने की रणनीति बनाई। इसमें कुछ भी छिपा नहीं है कि इजराइल जो कुछ भी करता है उसमें अमेरिका का संरक्षण और सहयोग रहता ही है। इजराइल सैन्य शक्ति और तकनीक के विकास में कितना भी आगे निकल जाए किंतु अमेरिका के वरद हस्त के बिना वह अरब मुल्कों से लड़ने में अक्षम है। कुछ दिन पहले तक जो ट्रम्प इजराइल और हमास के बीच युद्धविराम करवा रहे थे वे ही इजराइल द्वारा  किये गए भीषण हमले को रोकने के बजाय ईरान को बर्बादी का भय दिखा रहे हैं। दरअसल इस हमले की तैयारी करने के लिए ही ट्रम्प ने सऊदी अरब और कतर आदि का दौरा किया था। गौरतलब है पश्चिम एशिया के अनेक बड़े देशों ने इजराइल से व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते  न सिर्फ बनाये बल्कि मजबूत भी कर लिए। जिसकी वजह से ईरान और हमास दोनों अलग - थलग पड़ते गए। इसीलिए गाजा में जब इजराइल ने कहर बरपाया तब वहाँ से भागने वालों को पड़ोसी मिस्र ने शरण देने के बजाय अपनी सीमा बन्द कर ली। सीरिया के पतन के बाद अब ईरान ही बड़ा इस्लामिक देश है जो अभी तक अमेरिका के आगे  झुकने राजी नहीं। उसकी मुख्य आय का स्रोत कच्चा तेल है किंतु अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते वह मनमाफिक बिक्री नहीं कर पाने के कारण आर्थिक नुकसान झेलता आया है। इसी वजह से भारत और उसके बीच का तेल खरीदी सौदा खटाई में पड़ गया। अरब मुल्कों में ईराक और लीबिया के बाद ईरान ही अकेला अमेरिका और इजराइल के विरोध में खड़ा रहा। हालांकि इजराइल के अनेक पड़ोसी उससे नफरत करते हैं किंतु उसकी आक्रामकता का सामना करने की हिम्मत किसी में नहीं है। ये भी सत्य है कि इस्लामिक कट्टरता के मामले में अब ईरान ही बड़ा मुल्क है। यूएई के बाद सऊदी अरब भी आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा चुका है। ट्रम्प के हालिया दौरे का ही असर है कि इजराइल के जबरदस्त हमले के बाद भी बड़े मुस्लिम देश ईरान की सहायता करने के बजाय चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि ईरान  पर हमला दरअसल हमास की श्वास नलिका अवरुद्ध करने का सोचा समझा दांव है जिसके जरिये अमेरिका पश्चिम एशिया में अपने बचे खुचे बड़े विरोधी को निपटवा रहा है वहीं इजराइल द्वारा गाजा पर कब्जे की योजना को मूर्तरूप देना चाह रहा है। स्मरणीय है शपथ लेते ही ट्रम्प ने गाजा का विकास करने की घोषणा की थी। ये लड़ाई लंबी चलेगी या बिना किसी निर्णय पर पहुंचे रुक जाएगी ये आज कहना कठिन है क्योंकि रूस के यूक्रेन के साथ अंतहीन युद्ध में फंस जाने से ईरान के पास किसी विश्वशक्ति का समर्थन नहीं बचा। रही बात चीन की तो वह भी दिखावा कितना भी करे किंतु अपने हाथ जलने से  बचाएगा। हालांकि ईरान का अमेरिका के विरोध में खड़ा रहना चीन के दूरगामी हितों के लिए जरूरी है। यदि युद्ध लंबा चला और ईरान  में कट्टरवादी इस्लामिक सत्ता का पराभव हुआ तो  पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व का नया युग प्रारंभ होने के साथ ही विश्व राजनीति का संतुलन पूरी तरह वाशिंगटन के हाथ आ जाएगा जिसके अंतर्निहित खतरे भी हैं। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो उसे बहुत ही संभलकर  इस मामले में अपनी नीति तय करनी होगी क्योंकि ईरान और इजराइल दोनों से हमारे अच्छे रिश्ते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 13 June 2025

इंसानी ज़िंदगी की क्षतिपूर्ति मुआवजा और बीमा राशि से होना असंभव



गत दिवस अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ा एयर इंडिया का बोइंग विमान  2 मिनिट बाद ही  सिटी सिविल अस्पताल और बीजे मेडिकल कालेज के छात्रावास पर गिर गया। उसमें सवार 242 यात्रियों और 12 क्रू सदस्यों सहित 50 अन्य लोगों की मौत हो गई जबकि दर्जनों घायल हैं। दोपहर तक 265 शव अस्पताल पहुँच चुके थे।  एयर इंडिया ने मृतकों के परिजनों को 1 करोड़ रु. का मुआवजा, घायलों का संपूर्ण इलाज एवं जिन इमारतों से विमान टकराया उनके पुनर्निर्माण का आश्वासन दिया है। विमान में सवार केवल एक यात्री जीवित बच सका है। विमान चालक द्वारा भेजे गए सांकेतिक संदेश के फ़ौरन बाद ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इसलिए ब्लैक बॉक्स में हुई रिकार्डिंग से स्पष्ट निष्कर्ष निकालना मुश्किल होगा। वैसे भी ऐसे  विमान का तकनीकी पक्ष  बेहद  जटिल होने से दुर्घटना का कारण पता न चल सके तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बोइंग अमेरिका की प्रतिष्ठित कंपनी है जिसके बनाये यात्री विमान पूरी दुनिया में उपयोग आ रहे हैं। उनकी कुछ खामियों को लेकर काफी समय से चर्चा चल रही थी किंतु ऐसा कोई कारण अब तक सामने नहीं आया था जिससे उनका परिचालन पूरी तरह से रोक दिया जाए। ये भी उल्लेखनीय है कि दुर्घटनाग्रस्त विमान के पायलट काफी अनुभवी थे। ऐसे में एक वजह उड़ान के पहले विमान की सुरक्षा जाँच में लापरवाही भी मानी जा रही है। लेकिन सबसे अधिक टिप्पणियां एयर इंडिया को टाटा को बेच दिये जाने पर हो रही है। सोशल मीडिया पर बहुतेरे लोगों का मानना है टाटा भले ही अपनी कार्य कुशलता के लिए प्रतिष्ठित हो किंतु  है तो निजी कंपनी ही जिसका प्रमुख उद्देश्य लाभ अर्जित करना है। लेकिन ऐसा कहने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है जो एयर इंडिया के सरकार के हाथ में रहते हुए उसकी गैर पेशेवर कार्यशैली के कारण उसे बंद करने अथवा निजी हाथों में देने की सलाह दिया करते थे। उसके लगातार बढ़ते घाटे के कारण उसे बेच देने का निर्णय किसी भी लिहाज से ग़लत नहीं था। और फिर  एयर इंडिया खरीदने के पहले ही टाटा समूह ने  उड्ड्यन व्यवसाय में कदम रखते हुए कुछ विदेशी विमानन कंपनियों से करार कर लिए थे।  स्मरणीय है  आजादी के पहले देश की पहली हवाई सेवा टाटा एयरलाइंस थी जिसे 1946 में एयर इंडिया नाम दे दिया गया। 1953 में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया । एक दौर था जब एयर इंडिया का प्रतीक चिन्ह महाराजा बेहद लोकप्रिय था। एकाधिकार होने से उसकी आर्थिक स्थिति भी ठीक - ठाक रही किंतु ज्योंही उड्ड्यन के क्षेत्र में निजी कंपनियों को अनुमति मिली त्योंही एयर इंडिया और उसकी सहयोगी इंडियन एयर लाइंस की ठसक कम होने लगी। हालांकि बीते कुछ सालों में अनेक निजी उड्ड्यन कंपनियां विभिन्न कारणों से बंद हो गईं । ऐसे में जब टाटा समूह ने एयर इंडिया को खरीदा तब ये उम्मीद जागी कि वह अपनी  प्रतिष्ठा के अनुरूप उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अग्रणी साबित करेगा। टाटा समूह ने नये विमानों का जो सौदा बोइंग के अलावा फ्रांस और ब्रिटिश विमान  कंपनियों के साथ किया उसकी चर्चा पूरे विश्व में हुई। लेकिन घरेलू उड़ानों में एयर इंडिया की सहयोगी कंपनियों की सेवाएं ग्राहकों को संतुष्ट करने  में विफल रही हैं। यद्यपि ये मान लेना गलत नहीं होगा कि कोई भी एयर लाइंस  कभी नहीं चाहेगी कि उसके विमान दुर्घटना का शिकार हों क्योंकि उसमें चालक दल के साथ ही यात्रियों की ज़िंदगी जाने की आशंका रहती है। पेशेवर पायलट  कभी भी  खतरा उठाने का पक्षधर नहीं होता। ऐसे में इस दुर्घटना के कारणों का पता लगे  बिना कुछ भी कहना सही नहीं है।  लेकिन अहमदाबाद की घटना इसलिए चौंकाने वाली है क्योंकि विमान मात्र 600 फुट ही ऊपर जाने के बाद नीचे आ गिरा। निश्चित रूप से ये घटना जितनी दुखद है उतनी ही चिंताजनक भी क्योंकि इससे न सिर्फ एयर इंडिया और टाटा समूह बल्कि उड्ड्यन के क्षेत्र में भारत की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा वहीं बोइंग कंपनी की साख भी  गिरी है। इसलिए वह  इस हादसे की तह में जाए बिना नहीं रहेगी किंतु सरकार को देखना होगा कि हवाई अड्डों पर विमानों की उड़ान पूर्व जाँच के बारे में अचूक व्यवस्था हो। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में हवाई यात्रा केवल संपन्न वर्ग तक सीमित नहीं रही बल्कि मध्यम वर्ग में भी इसका आकर्षण बढ़ा है। ऐसे में सरकार ने भले ही उड्ड्यन व्यवसाय से हाथ खींच लिया किंतु वह इसके व्यवस्थित संचालन में अपनी भूमिका से पीछे नहीं हट सकती। रही बात टाटा समूह की तो ये दुर्घटना उसकी प्रतिष्ठा के लिए बड़ा  धक्का है। इससे वह कैसे उबरती है ये देखने वाली बात होगी। अन्य विमानन कंपनियों को भी सावधानी रखनी होगी क्योंकि एक विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने पर आर्थिक से बड़ा नुकसान उससे होने वाली मानवीय क्षति है जिसकी भरपाई न कोई मुआवजा कर सकता है और न ही बीमा से मिलने वाली राशि। ज्यादा लाभ कमाने। के फेर में एयर लाइंस द्वारा सेवा और सुविधाओं के स्तर में लालगातार गिरावट भी आलोचना का विषय बना हुआ है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 12 June 2025

न्यायिक सक्रियता के बारे में मुख्य न्यायाधीश की चेतावनी विचारणीय


सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने लंदन के सुप्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड वि.वि में व्याख्यान देते हुए जिन मुद्दों को छुआ उन पर  भारत के न्यायिक क्षेत्र में लंबे समय से बहस चली आ रही है। उन्होंने  भारत के संविधान को स्याही में रचा गया शांत क्रांति का दस्तावेज़ बताते हुए कहा कि यह  सिर्फ अधिकार नहीं देता, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को सशक्त भी करता है। जिसके उदाहरणस्वरूप आज देश की राष्ट्रपति साधारण परिस्थिति से आईं अनु. जनजाति की महिला है वहीं न्यायपालिका की सर्वोच्च आसंदी पर एक दलित विद्यमान है। लेकिन उनके भाषण की जो सबसे उल्लेखनीय बात ये रही कि  न्यायिक सक्रियता एक स्थायी वास्तविकता है, लेकिन इसे न्यायिक आतंकवाद में  बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने ये भी कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और केवल तभी किया जाना चाहिए, जब कोई कानून संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता हो। श्री गवई के अनुसार न्यायिक सक्रियता हमेशा बनी रहेगी। लेकिन वह न्यायिक आतंकवाद में न बदल जाए, इसका ध्यान रखना चाहिए,क्योंकि कभी-कभी न्यायपालिका अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर और उन क्षेत्रों में दखल देने लगती है, जहां उसे सामान्यतः नहीं जाना चाहिए। ध्यान रहे भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। सविधान निर्माताओं ने लंबे विचार - विमर्श के बाद कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार और सीमाएं तय कर दी थीं। विधायिका के पास कानून बनाने का दायित्व  है।  लेकिन न्यायपालिका को  न्यायिक समीक्षा का अधिकार देकर ये शक्ति प्रदान की गई  कि वह विधायिका और कार्यपालिका के ऐसे किसी भी फैसले की समीक्षा कर ये देखे कि कहीं वह संविधान के मौलिक स्वरूप के विरुद्ध तो नहीं है। नियंत्रण और संतुलन की  यह व्यवस्था तीनों अंगों में से किसी को भी स्वेच्छाचारी होने से रोकने के लिये बनाई गई है। ये अच्छी बात है कि हमारे देश में न्यायपालिका के प्रति विधायिका और कार्यपालिका दोनों ही सम्मान का भाव रखते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी जो न्यायिक नियुक्ति आयोग संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से बनाया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द करते हुए संसद को भी झटका दे दिया। उस विषय पर सरकार और न्यायपालिका के बीच जुबानी जंग चलती रहती है किंतु दोबारा उस आयोग को स्थापित करने का प्रयास नहीं हुआ। हालांकि अपने पूर्ववर्ती मुख्य न्यायाधीशों की तरह श्री गवई भी न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु वर्तमान कालेजियम व्यवस्था के पक्षधर होंगे किंतु ब्रिटेन में उनके द्वारा न्यायिक सक्रियता के न्यायिक आतंकवाद  में बदलने से बचने के बारे में जो कहा गया उसके पीछे भारतीय न्यायपालिका में नजर आ रही अंतिरंजित न्यायिक सक्रियता ही है। अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें वह तेज गति से चलती है जबकि आम तौर पर वह  सुस्त कार्यशैली के कारण आलोचना का पात्र बनती है और उसकी सक्रियता चौंकाती है । ताजा उदाहरण वक़्फ़ संशोधन का है जिस पर पेश की गई याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल सुनवाई शुरू कर दी किंतु उसके पहले जब वक़्फ़ संबंधी कोई  प्रकरण उसके समक्ष लाया गया तब उस पर ऐसी तत्परता नहीं दिखाई गई। किसी आतंकवादी और बलात्कारी की फांसी रुकवाने आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खोल दिये जाना न्यायपालिका की छवि पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। इस  तरह के दर्जनों दृष्टांत हैं जहाँ न्यायपालिका ने अपनी सीमा लांघने का  दुस्साहस किया। हालांकि आलोचना को उसकी स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जाता है किंतु जब खुद मुख्य न्यायाधीश  ने न्यायिक सक्रियता को न्यायिक आतंकवाद में बदलने से रोकने की समझाइश दे डाली तब न्यायपालिका को आगे आकर अपनी भूमिका निर्धारित करनी चाहिए। श्री गवई ने जो कुछ भी कहा  वह न्याय के क्षेत्र में उनके सुदीर्घ अनुभव का निचोड़ कहा जा सकता है। उनका कार्यकाल बेहद सीमित है। यदि इस दौरान यदि न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों और श्रेष्ठता के अहंकार को दूर करने में सफल हो सके तो वे अविस्मरणीय हो जाएंगे और न्यायपालिका का सम्मान भी बढ़ेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 11 June 2025

राजनीतिक कटुता और संवादहीनता दूर करने की दिशा में अच्छा प्रयास


विदेश भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लौट आये। प्रधानमंत्री ने उनमें शामिल नेताओं से मुलाकात कर उनके अनुभव जाने। इस दौरान वातावरण बहुत ही अनौपचारिक रहा भारतीय राजनीति में बढ़ती कटुता और आलोचना के घटते स्तर से प्रत्येक समझदार व्यक्ति चिंतित और दुखी है। संसद में सार्थक बहस गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि संसदीय प्रक्रिया और उससे जुड़ी मर्यादाओं  के जानकार अनुभवी सांसद लोकसभा और राज्यसभा में न हों किंतु अव्वल तो उनकी पार्टी उन्हें अवसर  नहीं देती और यदि देती भी है तो सदन में होने वाले होहल्ले में उनका वक्तव्य अनसुना रह जाता है। वरिष्ट सांसदों तक के भाषण के बीच टोकाटाकी आम बात है। मुद्दों की बजाय व्यक्तिगत छींटाकशी से सदन का वातावरण गरिमा विहीन होकर रह जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल विपक्ष ही इसके लिए दोषी है। सत्तापक्ष में भी कतिपय सांसद ऐसे हैं जिनकी टिप्पणियों से विवाद पैदा हो जाते हैं। दुख तो तब होता है जब आसंदी के सम्मान का ध्यान तक नहीं  रखा जाता। ये स्थिति रातों - रात नहीं बनी बल्कि 1980 में इंदिरा गाँधी के सत्ता में लौटने के बाद सदन में आई संजय गाँधी की कथित ब्रिगेड ने संसद के भीतर हंगामे की शुरुआत की जो धीरे - धीरे सभी दलों ने अपना ली। संसद के बाहर का वातावारण तो और भी विषैला है। चुनाव के दौरान अपने विरोधी की आलोचना करते हुए तीखे तीर छोड़ना एक बार स्वीकार्य हो भी जाए किंतु उसके बाद के समय में भी   वातावरण में कटुता इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है कि राजनीतिक विरोध  शत्रुता में बदल चुका है। ये भी सही है कि राजनीति सिद्धांतों के बजाय व्यवसायिक हित साधने पर केंद्रित हो गई है। इसीलिए नेताओं की पहिचान वैचारिक प्रतिबद्धता के  । आधार पर करना मुश्किल है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि वैचारिक विरोध और दुश्मनी में अंतर रखा जाए। दुर्भाग्य से लोकतंत्र को अपनाने के बाद भी  राजनीतिक जगत उसके अंतर्निहित गुणों को आत्मसात नहीं कर सका। इसलिए सत्तर के दशक तक संसद और उसके बाहर राजनीति का जो स्तर नजर आता था वह आज दुर्लभ है। इसका कारण हर पार्टी और नेता में सत्ता हथियाने की हवस है। आजादी के बाद  अनेक नेता पंडित नेहरू से असहमत होने पर कांग्रेस से बाहर आ गए । कुछ ने अलग दल बनाया तो कुछ समान विचारधारा वाले दल में चले आये। वहीं कुछ ने राजनीति छोड़ समाज सेवा का दूसरा क्षेत्र चुन लिया। लेकिन आपसी रिश्तों में सौजन्यता और आत्मीयता सदैव बनी रही। आज उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। दल बदलने का कारण सिद्धांत न होकर सत्ता की चाहत और स्वार्थों की पूर्ति हो गया है। चुनावी गठबंधन भी क्षणिक लाभ पर आधारित होते हैं। सरकार का समर्थन या विरोध भी सौदेबाजी पर आधारित होता है। सत्ता और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं किंतु राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर एकजुटता का अभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रहा है। ऐसे में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जो सर्वदलीय एकता नजर आई वह भी काफी हद तक रस्म अदायगी रही क्योंकि बैठक के दौरान एकता की सौगंध खाने वाले नेता गण बाहर आकर अपनी ढपली अपना राग लेकर बैठने लगे। यहाँ तक कि पाकिस्तान के विरुद्ध शुरू किये गए ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भी जिस प्रकार के बयान आते रहे वे उस भावना से अलग थे जो  सर्वदलीय बैठक में देखने मिली । बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान की कूटनीतिक घेराबंदी करने जब 7 प्रतिनिधिमंडलों को विभिन्न देशों में भेजने का फैसला किया तब उनमें केवल केन्द्र सरकार में शामिल पार्टियों के सांसदों और नेताओं को शामिल करने के बजाय समूचे विपक्ष को साझेदारी दी। यही नहीं कुछ प्रतिनिधिमंडलों का मुखिया भी विपक्षी नेताओं को बनाकर भारत की एकता का संदेश पूरे विश्व को दिया। यद्यपि मंथरा और शकुनी की मानसिकता से प्रेरित विघ्न संतोषियों ने रायता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ पार्टियों को अपने नेताओं का चयन तक नागवार गुजरा किंतु देश पर आये संकट के समय जिस दायित्वबोध और एकता की जरूरत होती है उसका परिचय देते हुए सभी प्रतिनिधिमंडलों में शामिल सदस्यों ने बेहतरीन परिपक्वता का प्रदर्शन विदेशों में किया। उनके दौरों की सफलता पर सवाल  उठाने वालों से केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उनसे दुनिया को ये संदेश देने में सफलता मिली कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर आये खतरे के समय भारत एकजुट है। प्रतिनिधिमंडलों की वापसी पर प्रधानमंत्री द्वारा उनसे भेंट का जो कार्यक्रम रखा वह एक अच्छी शुरुआत कही जायेगी। इससे राजनीतिक कटुता कम होने के अलावा पक्ष - विपक्ष में चली आ रही संवादहीनता भी दूर होगी। जिसे ये भी अच्छा न लग रहा हो उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि उसे केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ की चिंता है, देशहित की नहीं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 10 June 2025

ट्रम्प कहीं अमेरिका के गोर्बाचेव न बन जाएं


ऐसा लगता है अमेरिका की सीमाएं बढ़ाने के फेर में  डोनाल्ड ट्रम्प  देश को गृहयुद्ध में धकेल रहे हैं। न्यूयॉर्क के बाद  दूसरे सबसे बड़े शहर लॉस एंजेलिस में अवैध प्रवासियों की धरपकड़ के विरोध  में जबरदस्त उपद्रव, आगजनी और दंगे का माहौल है। ट्रम्प ने कैलिफोर्निया राज्य के गवर्नर को दरकिनार करते हुए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात कर दिये। इसी राज्य में सिलीकान वैली भी है जिसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ लाखों की संख्या में विदेशी काम करते हैं। चौंकाने वाली बात ये  है कि लॉस एंजेलिस  की जनसंख्या  38 लाख है जिसमें 13 लाख अवैध प्रवासी हैं जिनमें बड़ी संख्या लैटिन अमरीकी देशों से आये शरणार्थियों की है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता में आते ही अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कारवाई प्रारंभ कर दी थी। सैकड़ों प्रवासियों को हवाई जहाजों से वे उनके देश भिजवा चुके हैं जिनमें भारत से गए लोग भी थे। लेकिन लॉस एंजेलिस में जिस तरह का उपद्रव हुआ वह इस बात का संकेत है कि अमेरिका में आकर बस गए अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करना उतना आसान नहीं है जितना ट्रम्प ने समझ रखा है। लॉस एंजेलिस में जो हो रहा है उसके पीछे वामपंथी तत्व बताये जाते हैं जो बीते कुछ सालों में काफी संगठित और शक्तिशाली हो चले हैं। पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन के सलाहकार रहे जॉर्ज सोरोस ने अमेरिका में वामपंथी विचारधारा को काफी संरक्षण दिया। अवैध प्रवासी चूंकि अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं इस कारण वे वामपंथियों से जुड़ते गए। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर लैटिन अमेरिकी देश  अमेरिका से नफरत करते हैं।  ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि लैटिन देशों में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल - पुथल के पीछे अमेरिका का हाथ रहा है। कुछ देशों में उसने तख्ता पलट तक करवाया। क्यूबा से तो अमेरिका के रिश्ते सांप- नेवले जैसे रहे हैं। लंबे समय तक उसके शासक रहे फिडेल कास्त्रो की हत्या के अनेक असफल  प्रयासों के पीछे भी अमेरिका का हाथ होने की बात सामने आती रही। यही कारण है कि लैटिन अमेरिकी देशों से आये अवैध प्रवासी भी अमेरिका की धरती पर वामपंथी विचारधारा के बीज लेकर आये जो अंकुरित होने के बाद अब पौधे का रूप ले चुके हैं।  अमेरिका में चीनी आबादी भी तेजी से बढ़ी है जिसके खून में वामपंथ है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से चली आ रही अशांति के चलते जिन मुस्लिम शरणार्थियों को अमेरिका ने मानवीय आधार पर बसने की सुविधा दी वे भी आस्तीन के सांप बन बैठे हैं। इस सबका असर ही लॉस एंजेलिस के मौजूदा संकट के रूप में सामने आया है। अमेरिका अकेला नहीं है जिसे इस समस्या से जूझना पड़ रहा है। उसका पड़ोसी कैनेडा सिख प्रवासियों को गोद में बिठाने के बाद खालिस्तानी आतंक का गढ़ बना हुआ है। यूरोपीय देशों में ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क स्पेन, पुर्तगाल सभी मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देकर खून के आँसू रो रहे हैं। एशियाई देशों में भारत अवैध शरणार्थियों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है जिनकी संख्या करोड़ों में है। बांग्ला देश, म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान से चोरी छिपे आये ये प्रवासी आंतरिक  सुरक्षा के लिए खतरा तो हैं ही इनके जरिये अलगाववाद भी जड़ें जमा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव भले ही धमाकेदार अंदाज में जीत लिया और कुछ हजार अवैध प्रवासियों को देश निकाला देने में सफल भी हुए लेकिन लॉस एंजेलिस में जो हालात उत्पन्न हो गए वे भारत की राजधानी दिल्ली में हुए शाहीन बाग धरने का ही विस्तारित रूप है। ये सबक है भारत जैसे उन तमाम देशों के लिए जो मानवीय संवेदनाओं के वशीभूत शरणार्थियों को अपने घर में घुसने की अनुमति देने की गलती कर बैठे। बड़ी बात नहीं लॉस एंजेलिस की आग पूरे अमेरिका में फैल जाए क्योंकि इससे अन्य शहरों में फैले अवैध प्रवासी प्रोत्साहित होकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं और वह स्थिति अमेरिका की आंतरिक शांति को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगी। लॉस एंजेलिस अमेरिका के वैभव का बड़ा केंद्र है।  उसमें अवैध प्रवासियों की इतनी बड़ी संख्या और उनके आक्रामक रवैये से ये बात स्पष्ट है कि उनको निकालना उतना आसान नहीं जितना ट्रम्प समझ रहे थे। उनके और राज्यों के बीच बढ़ती टकराहट भी  संघीय ढांचे के लिए खतरा बन रही है। दूसरे कार्यकाल के कुछ महीनों में ही अमेरिका के अंदरूनी हालात जिस तरह बिगड़े उन्हें देखकर ये आशंका उत्पन्न होने लगी है कि कहीं ट्रम्प अमेरिका को उसी तरह  विखंडन की ओर न ले जाएं जैसा गोर्बाचोव ने सोवियत संघ में किया था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 9 June 2025

कोई कुछ भी कहे किंतु मोदी देश की जरूरत हैं


1989 के बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता का एक लंबा दौर चला।  जल्दी - जल्दी सरकारों के बदलने से प्रधानमंत्री पद पर भी नvaajpeyiये चेहरे देखने मिले जिनमें विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, पी. वी नरसिम्हा राव, एच. डी. देवगौड़ा, इंदर कुमार गुजराल और  अटल बिहारी वाजपेयी  थे। अटल जी के पहले दो कार्यकाल क्रमशः 13 दिन और 13 महीने के रहे लेकिन  तीसरे कार्यकाल में वे  कार्यकाल लगभग पूरा कर सके। उनके पहले श्री राव ने भी 5 साल सरकार चलाई ।   डाॅ.मनमोहन सिंह भी 10 साल प्रधानमंत्री रहे । लेकिन उक्त सभी को  स्पष्ट बहुमत नहीं होने से  सहयोगी दलों का दबाव झेलना पड़ा। डाॅ. सिंह  गाँधी परिवार के शिकंजे के कारण  अपनी प्रतिभा का उपयोग नहीं कर सके। यही कारण रहा कि  वे  अपना असर नहीं छोड़ सके और इसीलिए जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को 2014 में प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया तो 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। भाजपा ने 283 और उसके गठबंधन एनडीए को 336 सीटें मिलीं। इसी वजह से भाजपा अपना एजेंडा लागू करने का साहस बटोर सकी । पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद 2019 के चुनाव में मोदी सरकार और भी बड़े बहुमत से लौटी और भाजपा अकेले 300 का आंकड़ा पार गई।और श्री मोदी न सिर्फ राष्ट्रीय अपितु वैश्विक स्तर पर भी एक मजबूत राजनेता के तौर पर स्थापित हुए।नीतीश कुमार ने जरूर दो बार एनडीए छोड़कर  प्रधानमंत्री से टकराने का दुस्साहस किया और 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले विपक्षी गठबंधन को अस्तित्व में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु अचानक वे वापस एनडीए में लौट आये। हालांकि  तीन तलाक, धारा 370 और राम मंदिर जैसे बड़े काम करने के बाद भी 2024 में भाजपा 240 पर रुक गई किंतु चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार ने बिना देर लगाए श्री मोदी के तीसरे शपथ ग्रहण का रास्ता साफ कर दिया। सवाल ये उठा कि जबरदस्त छवि , प्रभावशाली कार्यशैली और जनहित की योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने के बाद भी श्री मोदी बहुमत से वंचित कैसे रह गए जबकि  10 वर्ष  में भारत हर दृष्टि से आगे बढ़ा। अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। कोरोना जैसी महामारी का जिस तरह मुकाबला किया गया उसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई। 140 करोड़ लोगों का टीकाकरण , 80 करोड़ जनता को मुफ्त खाद्यान्न और गरीबों को 5 लाख रु. तक मुफ्त इलाज जैसी सौग़ातें कम नहीं थीं किंतु नागरिकता संशोधन जैसे फैसलों को लेकर विपक्षी दलों के दुष्प्रचार से  मुस्लिम ध्रुवीकरण को गति मिली। ऐसा ही हुआ दलित मतदाताओं के साथ जिन्हें आरक्षण खत्म होने का भय दिखाकर भाजपा के विरुद्ध लामबंद किया गया। दूसरी तरफ भाजपा के  प्रतिबद्ध समर्थक अबकी बार 400 पार  की खुशफहमी का शिकार हो गए। निश्चित रूप से वह परिणाम राष्ट्रवादी राजनीति के लिए बड़ा झटका था ।  हालांकि  श्री मोदी सरकार बनाने में सफल रहे।किंतु तीसरे कार्यकाल के बारे में ये कयास लगने लगा कि वे दबाव में आकर भाजपा के एजेंडे पर अमल नहीं कर पाएंगे किंतु वक्फ संशोधन को संसद से पारित करवाकर उन्होंने दिखा दिया कि वे विषम परिस्थितियों में भी कार्य करने में सक्षम हैं। लोकसभा चुनाव  के बाद ये कहा जाने लगा कि मोदी का जादू खत्म हो चला  है किंतु हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जिस धमाकेदार अंदाज में जीत दर्ज की उसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और जिस विपक्षी एकता के बल पर राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे थे वह ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। शरद पवार, उद्धव ठाकरे और अरविंद केजरीवाल का नूर उतर गया। इस सबके पीछे श्री मोदी का जबरदस्त आत्मविश्वास और अथक परिश्रम है। पहलगाम हादसे के बाद ऑपरेशन सिंदूर के जरिये उन्होंने अपनी दृढ़ता से पूरे विश्व को अवगत करवा दिया। भले ही विपक्ष कुछ भी कहे किंतु श्री मोदी आज देश की जरूरत हैं। आधारभूत संरचना में भारत को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने में उनकी सरकार का ऐतिहासिक योगदान है। दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बनने की हैसियत हासिल करना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। देश को रक्षा क्षेत्र में शक्तिशाली बनाने में इस सरकार की भूमिका सराहनीय रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि  श्री मोदी ने भारत और भारतीयों की प्रतिष्ठा को अकल्पनीय ऊंचाई प्रदान की।  11 वर्ष का कार्यकाल पूरा करना निःसंदेह बड़ी उपलब्धि है। हालांकि अभी अनेक चुनौतियाँ हैं। पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश भी नई समस्या के रूप में सामने आया है। मणिपुर की आग बुझने का नाम नहीं ले रही। वक़्फ़ संशोधन को लेकर एक बार फिर मुस्लिम ध्रुवीकरण का प्रयास हो रहा है। विपक्ष को श्री मोदी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं हो रहे लेकिन देश की जनता आज भी उनमें अपना भविष्य देखती है। आलोचनाओं से विचलित हुए बिना वे जिस तन्मयता से अपने काम में  जुटे रहते हैं वह अन्य किसी में नजर नहीं आता। देश के हर हिस्से में बिना भेदभाव के विकास की रोशनी पहुंचना मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 6 June 2025

तेज चलने के फेर में ट्रम्प की गाड़ी संतुलन खो रही



अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। अमेरिका के विरोधी भी उसकी उपेक्षा नहीं कर पाते। ये देश चूंकि विज्ञान और तकनीक के मामले में दुनिया का सिरमौर है लिहाजा निर्विवाद रूप से आर्थिक और सामरिक महाशक्ति है। रूस, चीन, जर्मनी , फ्रांस और जापान भी हालांकि काफी विकसित और समृद्ध हैं किंतु अमेरिका की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता निर्विवाद है। उसका सफल लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खुलापन पूरी दुनिया को आकृष्ट करता रहा है। साहित्य, संगीत, कला, खेल, फिल्में , शिक्षा जैसे  हर क्षेत्र में अमेरिका ने नये - नये कीर्तिमान रचे हैं। अध्यक्षीय प्रणाली की शासन व्यवस्था वाले इस देश में संसद के दो सदन होने के बाद भी राष्ट्रपति काफी शक्तिशाली होता है। और इसीलिए उसे वैश्विक राजनीति में विशेष महत्व प्राप्त  है। इस पद पर आये अनेक व्यक्तियों को उनके निजी गुणों और कार्यप्रणाली के लिए महानता की श्रेणी में भी रखा गया किंतु यहाँ के लोकतंत्र की ये खूबसूरती है कि राष्ट्रपति कितना भी लोकप्रिय और सक्षम क्यों न हो किंतु उसे अधिकतम दो कार्यकाल ही मिलते हैं। दूसरे महायुद्ध के कारण उत्पन्न असामान्य परिस्थितियों में जरूर थियोडोर रूजवेल्ट को चार बार राष्ट्रपति बनाया गया किंतु वह अपवाद ही है। वर्तमान राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रम्प के साथ संयोग ये है कि वे 2020 तक राष्ट्रपति रहने के बाद दूसरा चुनाव हार गए। तब लगा था कि उनका राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया किंतु 2024 में उन्होंने तमाम संभावनाओं को नकारते हुए चुनाव जीतकर शानदार वापसी की। उनकी जीत में अमेरिका के धनकुबेर इलान मस्क ने सक्रिय भूमिका निभाई जिसमें असामान्य कुछ भी नहीं था क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र में पूंजीवादी व्यवस्था को संरक्षण प्राप्त है। ख़ुद ट्रम्प भी एक बड़े व्यवसायी हैं। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में भी जार्ज सोरोस नामक धनकुबेर उनके दाहिने हाथ के तौर पर बने रहे। ट्रम्प ने भी राष्ट्रपति बनते ही मस्क, को अपने उपराष्ट्रपति से ज्यादा महत्व और शक्तियाँ दे डालीं जिससे पूरी दुनिया को ये एहसास हो चला कि व्हाइट हाउस में मस्क की समानांतर सत्ता चलेगी । सुनीता विलियम को अंतरिक्ष से सुरक्षित वापस लाने में नासा जैसी प्रसिद्ध एजेंसी की बजाय मस्क की अंतरिक्ष कंपनी स्पेस एक्स की सेवाएं लिए जाने के बाद नासा के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे। मस्क ने सरकारी खर्च घटाने के लिए बड़े पैमाने पर छंटनी करवा दी। उधर टैरिफ बढ़ाने की ट्रम्प की  सनक ने देश में महंगाई बढ़ा दी। जिससे आम जनता में नाराजगी व्याप्त है। उनके फैसलों और  गैर जिम्मेदार बयानों ने अमेरिका की विश्वसनीयता  भी संदिग्ध बना दी। युक्रेन और यूरोप संबंधी  निर्णयों ने अमेरिका की साख को भी नुकसान पहुंचाया।  परिणाम ये हुआ कि ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटे ट्रम्प बजाय दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष बनने के पहले तो विवादास्पद हुए और उनकी छवि एक गैर गंभीर नेता या मसखरे जैसी स्थापित होती गई। कार्यभार संभालने के कुछ महीने के भीतर ही उनकी ऊल- जलूल हरकतों से अमेरिका की साख और धाक दोनों को नुकसान हुआ। अपने बयानों और फैसलों को वे जिस तेजी से बदलते हैं उसकी वजह से पूरी दुनिया उन पर हंस रही है। हॉलीवुड की फिल्मों  में काऊ बॉय की छवि रखने वाले रोनाल्ड रीगन जब राष्ट्रपति बने थे तब पूरे विश्व में उनकी सफलता को लेकर शंका व्यक्त की गई किंतु उनके कार्यकाल में  सोवियत संघ का ऐतिहासिक विखंडन हुआ । उसके बाद के तीन दशकों में अमेरिका दुनिया का अघोषित चौधरी बना रहा। विश्व व्यापार संगठन के जरिये पूरी दुनिया को मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार में बदलना भी तभी संभव हो सका। यहाँ तक कि चीन भी माओ युग के लौह आवरण से निकलकर पूंजी के प्रवाह में बहने लगा। ट्रम्प का पहला कार्यकाल कुछ खास नहीं  रहा। लेकिन इस बार उन्होंने जिस दबंगी से चुनाव लड़ा और अमेरिकी मतदाताओं को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाये उससे लगा था कि वे इस बार कुछ बेहतर करेंगे किंतु ज्यादा तेज चलाने के फेर में उनकी गाड़ी संतुलन खोती दिख रही है। इसका प्रमाण उनके दाहिने हाथ बने मस्क ने  साथ  छोड़कर उन पर महाभियोग चलाकर उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस को राष्ट्रपति बनाने जैसी मांग कर दी। उधर जो ट्रम्प कुछ दिन पहले तक  मस्क की तारीफ के पुल बांधते थे वे उन्हें धोखेबाज कहते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं। मस्क का ये कहना कि ट्रम्प उनके बिना चुनाव नहीं जीत सकते थे काफी महत्वपूर्ण है। ऐसा लगता है उन दोनों के बीच कोई सौदेबाजी हुई थी जिसके पूरे न  होने पर रिश्तों में आई खटास अब कड़वाहट में बदल गई। हालांकि ये अमेरिका का आंतरिक मामला है लेकिन मस्क जैसे नजदीकी का साथ छोड़कर विरोध में खड़े हो जाने से ट्रम्प कमजोर हुए हैं। उधर उनके फैसलों का न्यायालयों  में भी विरोध हो रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे इसमें संदेह है और इसका असर दुनिया भर में होगा। अमेरिका के इतिहास में  सबसे कमजोर और गैर जिम्मेदार राष्ट्रपति के रूप में उनका नाम दर्ज हो तो आश्चर्य नहीं होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 June 2025

निजी कंपनी की टीम का विधानसभा में स्वागत समझ से परे



इंग्लैंड के काउंटी क्रिकेट की तर्ज पर भारत के  कंट्रोल बोर्ड (बी.सी.सी.आई) द्वारा वर्ष 2008 में आई. पी. एल नामक लीग क्रिकेट प्रतियोगिता प्रारम्भ की गई। इसमें प्रायोजकों द्वारा खिलाड़ियों को ऊंची बोली लगाकर अपनी टीम में शामिल किया जाता है। पाकिस्तान के अलावा क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों के खिलाड़ी इस आयोजन का हिस्सा होते हैं। हालांकि आई.पी.एल शुरुआत में काफी विवादित हुई और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में घिरे उसके अध्यक्ष ललित मोदी देश छोड़कर भाग गए। बी.सी.सी.आई  में चूंकि राजनेताओं की दखल शुरू से रही इसलिए ललित  के अलावा  कुछ बड़ी हस्तियों के नाम भी आरोपित हुए किंतु आई. पी. एल को मिली आर्थिक सफलता ने उन सबको दबा दिया। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस प्रतियोगिता ने इंग्लैंड के काउंटी और आस्ट्रेलिया के क्लब क्रिकेट की चमक फीकी कर दी। सबसे बड़ी बात ये है कि आई.पी.एल का समूचा आयोजन जिस भव्य और पेशेवर तरीके से किया जाता है उसने इस तरह के विश्वस्तरीय आयोजन करने में भारत के प्रबंध कौशल से पूरे विश्व को परिचित करवा दिया।  इसके जरिये दर्जनों ऐसे नवोदित खिलाड़ियों की प्रतिभा उजागर हो गई जो अन्यथा उपेक्षित पड़े रहते। लेकिन आर्थिक लाभ और खिलाड़ियों पर होने वाली धनवर्षा से अलग हटकर देखें तो इस प्रतियोगिता की छवि सट्टेबाजी से जुड़ गई है और ये गलत भी नहीं है। जिस तरह से इसके मैचों का प्रचार होता है उससे अमेरिका में होने वाली हैवीवेट मुक्केबाजी प्रतियोगिताओं को लेकर किया जाने वाला प्रोपेगंडा याद आ जाता है। यही वजह है कि आई.पी.एल एक खेल प्रतियोगिता की बजाय विशुद्ध व्यवसायिक आयोजन बन गया जिसका उद्देश्य नये - नये तरीकों से धन बटोरना हो गया है। जनता के लिए यह मनोरंजन का साधन तो है ही किंतु चूंकि टीमों को किसी राज्य या शहर का नाम दे दिया जाता है इसलिए भले ही उनमें देश - विदेश के बाहरी खिलाड़ी शामिल हों,  जीत - हार के साथ स्थानीय भावनाएं भी जुड़ जाती हैं। गत दिवस इस वर्ष की विजेता रॉयल चेलेन्जर्स बेंगलुरु के स्वागत में बेंगलुरू में जमा भीड़  अनियंत्रित हो गई जिसके कारण दर्जन भर लोग कुचलकर जान गँवा बैठे जबकि दर्जनों घायल हैं। विधानसभा के बाहर  विजेता टीम के स्वागत के लिए  एक लाख लोग जमा थे  वहीं मुख्य स्टेडियम में तीन लाख जनता जमा होने से सभी व्यवस्थाएँ चरमरा गईं। इस दर्दनाक घटना के बाद आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। भाजपा कर्नाटक सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है तो कांग्रेस प्रयागराज महाकुम्भ में हुई मौतों को लेकर भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। लेकिन ऐसे हादसों में राजनीति से अलग हटकर ऐसे कदम उठाना चाहिए। जिससे उनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। धर्मस्थलों पर होने वाले आयोजनों में भीड़ के आधिक्य से प्रतिवर्ष  सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। हर बार प्रशासन और शासन पर लापरवाही का आरोप लगता है और व्यवस्थाएं सुधारने का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन होता कुछ भी नहीं है और अगली घटना का इंतजार किया जाता है। बेंगलुरू में गत दिवस जो कुछ हुआ उसके लिए किसको दोष दिया जाए ये बड़ा सवाल है क्योंकि एक निजी कंपनी के स्वामित्व वाली टीम का स्वागत विधानसभा में करने का औचित्य समझ से परे है। यदि कर्नाटक की क्रिकेट टीम रंजी ट्राफी जीत लेती तब तो विधानसभा में उसका अभिनंदन उचित भी होता किंतु सिर्फ बेंगलुरू नाम होने से भावनाओं का ज्वार उठना समझदारी नहीं है। हो सकता है टीम के मालिक ने अपने भावी व्यवसायिक हितों के लिए इतनी भीड़ जमा की हो। लेकिन जनता को भी ऐसे आयोजनों में जाने के पहले अपनी सुरक्षा  की चिंता करनी चाहिए। इस घटना के लिए एक - दूसरे पर  जिम्मेदारी थोपने का खेल भी दुखद है। आई. पी. एल के आयोजकों  और रॉयल चेलेन्जेर्स का ये दायित्व है कि वे मृतकों के परिजनों को क्षतिपूर्ति एवं घायलों का इलाज करवाएं। घटना के लिए बेंगुलुरु का प्रशासन तो जिम्मेदार है ही किंतु इस  बात का पता लगाना जरूरी है कि ये जमावड़ा किसके दिमाग की उपज थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 June 2025

लेकिन लंगड़े घोड़ों को निकालेगा कौन

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गत दिवस पार्टी के चुनिंदा  नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस में तीन तरह के घोड़े हैं। लेकिन उनका उपयोग सही तरीके से नहीं होता। मसलन बारात के घोड़े को रेस में खड़ा कर देते हैं जबकि रेस के घोड़े को बरात में भेज देते हैं। एक तीसरी किस्म लंगड़े घोड़े की भी है ।  उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि बारात वाले घोड़ों को बारात में भेजकर रेस वाले घोड़ों को काम में लगाना है। साथ ही  पार्टीजनों को  रेस का घोड़ा बनने की सलाह दी। लेकिन उनका ये कहना काफी रोचक रहा कि जो लंगड़े घोड़े हैं उन्हें ये कहते हुए  रिटायर करना है कि भैया थोड़ी सी  घास खाओ, पानी पियो, रिलेक्स करो और दूसरों को तंग मत करो। वरना कारवाई की जाएगी। उनका आशय ये था कि गुटबाजी में लिप्त नेता बाहर होंगे , टिकिट जनाधार वालों को ही मिलेगी  और उनका प्रदर्शन ही उसका आधार होगा। श्री गाँधी ने बड़े नेताओं को  गुटबाजी से दूर रहने की नसीहत  के साथ  वही बातें दोहराईं जो वे तब से कहते आ रहे हैं जब उन्हें पार्टी का महामंत्री बनाया गया था। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने के वायदे के साथ उन्होंने युवाओं को बागडोर सौंपने का भरोसा भी दिलाया। 2017 में  वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी बनाये गए लेकिन  2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया। फ़िलहाल पार्टी के अध्यक्ष हालांकि मल्लिकार्जुन खरगे हैं किंतु असली बागडोर राहुल के हाथ में ही है । लेकिन भोपाल में उन्होंने घोड़ों का जो उदाहरण दिया वह कुछ दिन चर्चा का विषय रहने के बाद हवा-  हवाई होकर रह जाएगा। श्री गाँधी ने जो यूथ ब्रिगेड बनाई थी उसके ज्यादातर सदस्य  अपनी उपेक्षा के कारण पार्टी  छोड़ गए  । और सचिन पायलट जैसे जो इक्का - दुक्का बचे भी हैं तो वे अभी तक अपनी जगह नहीं बना सके। ऐसे में  बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों का वर्गीकरण कौन करेगा ये यक्ष प्रश्न है।  लंगड़े घोड़ों को निकाल बाहर करने की जो बात कही गई वह भी आसान नहीं है क्योंकि आज पार्टी में जो भी नेता हैं वे सभी खुद को रेस का घोड़ा मानकर चलते हैं। जनाधार और प्रदर्शन को टिकिट का आधार मानने की जो बात  भी अविश्वसनीय  लगती है क्योंकि श्री गाँधी के हाथ  कमान आने के बाद भी  टिकिट वितरण में पुरानी  संस्कृति ही लागू रही और नेताओं के कृपापात्रों को ही उपकृत किया जाता रहा। युवाओं को  अगली पंक्ति में शामिल करने का जो संकल्प उन्होंने शुरुआत में लिया था वह भी अमल में नहीं आ सका। वरना सचिन पायलट राजस्थान और ज्योतिरादित्य सिंधिया म.प्र के मुख्यमंत्री बनाये जाते। सही बात तो ये है कि चाहे पार्टी का नेतृत्व सोनिया गाँधी के हाथ रही या राहुल के उनके इर्द - गिर्द  ज्यादातर लंगड़े घोड़े ही नजर आते हैं। कुछ कांग्रेसियों को बिना बुलाये बारात में घुसने की आदत है। लेकिन जो सही अर्थों में रेस के घोड़े हैं उनको घास खाने, पानी पीने और रिलेक्स करने के साथ ही दूसरों को परेशान न करने की हिदायत के साथ रेसकोर्स से बाहर रहने कह दिया जाता है। ज्यादा दूर क्यों जाएं म.प्र में ही दो दशक से भी अधिक से जिन प्रादेशिक छत्रपों के कारण कांग्रेस सत्ता से वंचित है आज भी वे उसके सिर पर सवार  हैं। जिन युवाओं के हाथ में संगठन की बागडोर दी गई उनकी कितनी पकड़ पार्टी पर  है ये सभी जानते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ भले ही जनता द्वारा ठुकराए जा चुके हैं किंतु वे अपने बेटों को स्थापित करने के लिए जबरन लदे हुए हैं। यही हाल लगभग हर प्रदेश में कांग्रेस संगठन का है। ये सब देखते हुए यदि श्री गाँधी की मंशानुसार  कांग्रेस में  बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों को उनकी सही जगह दिखाई जाए तो फिर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनकी बातें सैद्धांतिक तौर पर भले सही हों किंतु वे व्यवहारिक तौर पर कारगर नहीं होतीं । ये बात भी सही है कि वे अपनी कही बातों को खुद भी भूल जाते हैं। इसीलिए जिस इंडिया गठबंधन की ओर से वे  प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार बने वह लोकसभा चुनाव के बाद से ही बिखरने लगा। दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या वह खुद है क्योंकि वह अपना रास्ता भूल चुकी है । राहुल जितनी ताकत भाजपा और रा.स्व.संघ को गरियाने में  खर्च करते हैं उससे आधी भी वे पार्टी को मजबूत करने में लगाते तो आज उसकी ये दशा नहीं होती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 June 2025

यूक्रेन और रूस का युद्ध खतरनाक स्थिति में



दो दिन पहले यूक्रेन द्वारा रूस पर किये गए ड्रोन हमले दुनिया भर में चर्चा का विषय बन गए। रूस के भीतर घुसकर उसके लड़ाकू विमानों को नष्ट करने के लिए जो तरीका उसने अपनाया वह युद्ध तकनीक में एक नये अध्याय का प्रारंभ कहा जा सकता है। सुनने में आया है कि जिन ट्रकों में ड्रोन छुपाकर ले जाए गए उनको चलाने वालों ने खुद को भी उड़ा दिया। इस तरह के आत्मघाती हमलों के अनेक उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं। लेकिन आज, की दुनिया में आतंकवादियों द्वारा ही ऐसा किया जाता है। अमेरिका में हुए 9/11 हमले में भी ओसामा बिन लादेन के इशारों पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जिन दो इमारतों को विमान टकराकर जमींदोज किया गया उन्हें चलाने वाले भी मारे गए। लेकिन यूक्रेन ने जो किया वह उसका नतीजा वह जानता है।  उल्लेखनीय है कि जब कुछ महीनों पहले व्हाइट हाउस में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने गए तब उन्होंने इकतरफा युद्धविराम का जो दबाव डाला उसे जब यूक्रेनी  राष्ट्रपति ने मंजूर नहीं किया तब ट्रम्प ने उन्हें बेहद अपमानजनक तरीके से बाहर निकाल दिया। उस समय ऐसा लगा था कि वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन की तरफदारी कर रहे थे। ये बात भी सामने आई कि उनकी नजर  यूक्रेन के बहुमूल्य खनिजों पर थी। जेलेंस्की के बारे में काफी ऊलजलूल बातें भी ट्रम्प सार्वजनिक तौर पर कहते रहे। लेकिन हाल ही में उन्होंने पुतिन की भी तीखी आलोचना कर डाली जिस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रूसी राष्ट्रपति ने उन्हें चेतावनी दी कि वे आग से न खेलें। इस  बयान से ये लगा कि ट्रम्प और पुतिन के बीच तालमेल की संभावनाएं खत्म हो चली हैं। इसी बीच जब बीते सप्ताह यूक्रेन ने अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला कर रूस की सैन्य क्षमता को ललकारा तब दुनिया चौंक गई क्योंकि इतनी तबाही झेलने के बाद  उसमें इतना भीषण हमला करने का साहस कहाँ से आया ये बड़ा सवाल है। लेकिन जल्द ही यूक्रेन ने ये खुलासा किया कि उसने इस हमले के पहले अमेरिका को उसकी जानकारी दे दी थी। इसके बाद ये संदेह पैदा हुआ कि  इसके पीछे अमेरिका का हाथ था। उसके बाद रूस की प्रतिक्रिया बड़ी ही शांत रही क्योंकि उसने अभी भी जो नुकसान हुआ उसकी पुष्टि तो नहीं की किंतु इतना संकेत अवश्य दे दिया कि इसका जवाब बहुत भयानक होगा। जाहिर है लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहा यूक्रेन अपने से कई गुना ताकतवर रूस पर इतना बड़ा हमला किसी बड़ी शक्ति की मदद के बिना नहीं कर सकता था। एक संभावना ये भी है कि यूरोप के कुछ देश इसके प्रायोजक हों क्योंकि पुतिन अनेक देशों की जमीन पर कब्जा करने की धमकी दे चुके हैं। दरअसल अमेरिका द्वारा यूक्रेन का साथ छोड़ दिये जाने के बाद यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित हो उठे थे। हालांकि अभी तक यूक्रेन के इस कदम का उद्देश्य समझ नहीं आ रहा क्योंकि इससे रूस को कितना भी बड़ा नुकसान हो जाए किंतु यूक्रेन  जीत हासिल करने में कामयाब हो जायेगा ये उम्मीद करना सपने देखने जैसा है। ऐसा लगता है कुछ अदृश्य ताकतें इस लड़ाई को खतरनाक मोड पर ले जाना चाह रही हैं और यूक्रेन उनके लिये मोहरा बन गया है। वैसे भी  यूक्रेन रूस से टकराने की जुर्रत कभी नहीं करता यदि अमेरिका और उसके समर्थक यूरोपीय देश उसकी मदद न करते। इतनी लंबी लड़ाई के बाद भी यदि रूस उसे  पूरी तरह परास्त नहीं कर सका तो यह उसके हौसले को तो दर्शाता है किंतु उसकी अपनी क्षमता इतनी नहीं थी कि वह इतना लंबा युद्ध लड़ पाता। इसीलिए उसने रूस पर जो ताजा वार किया वह चौंकाने वाला है। कुछ दिनों बाद पुतिन, ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच फोन पर बातचीत होने वाली है।  इस दौरान यूक्रेन द्वारा किये गए ताजा ड्रोन हमले पर भी चर्चा हो सकती है। हालांकि सही स्थिति तो पता नहीं चल सकेगी क्योंकि ऐसे मामलों पर सदैव परदा पड़ा रहता है किंतु रूस इसका जवाब जरूर देगा। राष्ट्रपति पुतिन के स्वभाव को देखते हुए पूरी दुनिया इस बात के प्रति भयभीत है कि वे यूक्रेन की कमर तोड़ने जैसा कदम उठा सकते हैं। अमेरिका उनको रोक पाने की स्थिति में नहीं है और चीन रूस के साथ खड़ा है। ये देखते हुए रूस - यूक्रेन के बीच की जंग खतरनाक स्थिति में आ गई  है। चूंकि पुतिन  किसी भी स्थिति में  शांत नहीं बैठेंगे इसलिए दुनिया को किसी बड़ी घटना के लिए तैयार रहना होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 June 2025

आयकर जैसी राहत जीएसटी में भी दी जाए


बीते वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो आंकड़े आये वे उत्साहित करने वाले हैं। विदेशी निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है। एक अच्छी खबर ये भी है कि कोरोना काल के बाद से आम जनता की जो घरेलू बजट लगभग खत्म हो गई थी वह फिर पुरानी रफ्तार पर लौट रही है। बैंकों और बड़े औद्योगिक समूह नगदी की कमी से उबरने लगे हैं। शेयर बाजार में मध्यमवर्गीय नये निवेशक तेजी से बढ़ रहे हैं। सरकारी बैंकों का लाभ निजी बैंकों से ज्यादा होना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वार्षिक विकास दर 6.5 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था के सही दिशा में बढ़ने का प्रमाण है। निर्यात के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से व्यापार असंतुलन में निरंतर कमी हो रही है। ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय रक्षा उपकरणों की धाक पूरी दुनिया में जमा दी जिसका परिणाम बड़ी संख्या में विदेशी ऑर्डर मिलना है। इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए निजी क्षेत्र को भी रक्षा उपकरण बनाने की अनुमति दी गई जो दूरदर्शी कदम है। हाल ही में रिजर्व बैंक ने बीते वित्तीय वर्ष के लाभांश के रूप में केन्द्र सरकार को रिकार्ड 2.69 लाख करोड़ बतौर  लाभांश दिया जो गत वर्ष से 27 फीसदी अधिक है। इस राशि से केन्द्र सरकार को अपना बजट घाटा घटाने में मदद तो मिली ही ऑपरेशन सिंदूर के कारण आये आर्थिक बोझ से निपटने में भी सुविधा हुई। जीएसटी का संग्रह हर माह पिछले वर्ष का कीर्तिमान ध्वस्त करता जा रहा है। ऑटोमोबाइल और रियल सेक्टर जैसे क्षेत्र निरंतर अच्छे परिणाम दे रहे हैं। उत्पादन के आंकड़े भी संतोषजनक स्तर पर आ गए हैं। सबसे बड़ी बात उपभोक्ताओं में नजर आ रहा उत्साह है जिससे मांग बनी हुई है। पर्यटन और सेवा जैसे व्यवसाय  उम्मीद के मुताबिक तेज गति से बढ़ रहे हैं। इन सबका परिणाम ही है कि भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सक्षम हो सका। यद्यपि अभी भी पड़ोसी चीन हमसे काफी आगे है किंतु अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार भारत पर टैरिफ थोपने और एप्पल जैसी कंपनी को अपने मोबाइल फोन का उत्पादन भारत में न करने के लिए धमका  रहे हैं उससे लग जाता है कि विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति तक हमारे बढ़ते कदमों से परेशान हो उठी है। हाल ही में भारत ने पाकिस्तान पर जो सफल सैन्य कार्रवाई की वह आतंकवाद के विरुद्ध हमारी मारक क्षमता का बड़ा उदाहरण है। वैश्विक मंचों पर भारत के प्रति सम्मान और आकर्षण दोनों बढ़ा है। दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपनी उत्पादन इकाइयां लगाने आतुर हैं। उससे भी आगे बढ़कर हमारे उद्योगपति दुनिया के अनेक देशों में अपने कारखाने स्थापित कर भारतीय उद्यमशीलता का गौरवगान कर रहे हैं। प्रत्यक्ष करों से हो रही आय उम्मीद से बढ़कर होना ये जताता है कि करदाताओं  में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा है। कारपोरेट के अलावा निजी करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि से ये आकलन करना आसान हुआ है कि लोगों की आय बढ़ रही है और वे देश के विकास में अपना योगदान देने तत्पर हैं। ये सभी संकेत भारत के उज्ज्वल भविष्य का परिचायक हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जो आम जनता के लिहाज से अखरने वाली हैं। मसलन यदि अर्थव्यवस्था सुखद स्थिति में है तब उसका लाभ उसी  अनुपात में जनता को भी मिलना चाहिए। यद्यपि मोदी  सरकार ने बीते 11 वर्ष के कार्यकाल में अधो संरचना और सामाजिक कल्याण जैसी योजनाओं पर काफी खर्च किया। उच्चस्तरीय राजमार्ग, फ्लाईओवर, हवाई अड्डे, आदि के साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, शौचालय के अलावा आयुष्मान भारत जैसे प्रकल्पों ने देश में विकास और जनकल्याण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर दिया। आज की स्थिति में ये कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगा है। राजमार्गों से गुजरते हुए भारत में आये बदलाव का सुखद अनुभव हो जाता है। इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि जीएसटी की दरों में कमी की जाए। जाहिर है प्रारंभिक दौर में सरकार को मिलने वाले राजस्व में गिरावट आयेगी किंतु लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से वह घाटा तो पूरा होगा ही, कर की चोरी भी रुकेगी। इसके साथ ही जीएसटी के विभिन्न स्तरों को घटाकर दो रखे जाएं तो व्यापार करना आसान होगा। जिस तरह इस वर्ष आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख रु.  किये जाने से देश के विशाल मध्यम वर्ग को जबरदस्त राहत मिली तो उसका असर बाजार में उठाव के तौर पर देखने मिला ठीक वैसे ही यदि जीएसटी में भी ऐसा ही क्रांतिकारी बदलाव किया जावे तो वह आम जनता के साथ ही उद्योग - व्यापार जगत के लिए भी उत्साहवर्धक रहेगा । आर्थिक सुधारों के लिहाज से ये बड़ा कदम होगा क्योंकि इससे भारत में आने वाली विदेशी कंपनियां भी आकर्षित होंगी। अपेक्षा की जा सकती है कि आगामी वित्तीय वर्ष के बजट में आयकर जैसी राहत  जीएसटी में भी दी जाएगी। जीएसटी को जिस तरह लोगों ने अपनाया और सरकार का खजाना भरा उसके बाद अब सरकार को भी चाहिए वह उदारता दिखाये। 


- रवीन्द्र वाजपेयी