कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने गत दिवस पार्टी के चुनिंदा नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस में तीन तरह के घोड़े हैं। लेकिन उनका उपयोग सही तरीके से नहीं होता। मसलन बारात के घोड़े को रेस में खड़ा कर देते हैं जबकि रेस के घोड़े को बरात में भेज देते हैं। एक तीसरी किस्म लंगड़े घोड़े की भी है । उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा कि बारात वाले घोड़ों को बारात में भेजकर रेस वाले घोड़ों को काम में लगाना है। साथ ही पार्टीजनों को रेस का घोड़ा बनने की सलाह दी। लेकिन उनका ये कहना काफी रोचक रहा कि जो लंगड़े घोड़े हैं उन्हें ये कहते हुए रिटायर करना है कि भैया थोड़ी सी घास खाओ, पानी पियो, रिलेक्स करो और दूसरों को तंग मत करो। वरना कारवाई की जाएगी। उनका आशय ये था कि गुटबाजी में लिप्त नेता बाहर होंगे , टिकिट जनाधार वालों को ही मिलेगी और उनका प्रदर्शन ही उसका आधार होगा। श्री गाँधी ने बड़े नेताओं को गुटबाजी से दूर रहने की नसीहत के साथ वही बातें दोहराईं जो वे तब से कहते आ रहे हैं जब उन्हें पार्टी का महामंत्री बनाया गया था। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र लाने के वायदे के साथ उन्होंने युवाओं को बागडोर सौंपने का भरोसा भी दिलाया। 2017 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी बनाये गए लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया। फ़िलहाल पार्टी के अध्यक्ष हालांकि मल्लिकार्जुन खरगे हैं किंतु असली बागडोर राहुल के हाथ में ही है । लेकिन भोपाल में उन्होंने घोड़ों का जो उदाहरण दिया वह कुछ दिन चर्चा का विषय रहने के बाद हवा- हवाई होकर रह जाएगा। श्री गाँधी ने जो यूथ ब्रिगेड बनाई थी उसके ज्यादातर सदस्य अपनी उपेक्षा के कारण पार्टी छोड़ गए । और सचिन पायलट जैसे जो इक्का - दुक्का बचे भी हैं तो वे अभी तक अपनी जगह नहीं बना सके। ऐसे में बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों का वर्गीकरण कौन करेगा ये यक्ष प्रश्न है। लंगड़े घोड़ों को निकाल बाहर करने की जो बात कही गई वह भी आसान नहीं है क्योंकि आज पार्टी में जो भी नेता हैं वे सभी खुद को रेस का घोड़ा मानकर चलते हैं। जनाधार और प्रदर्शन को टिकिट का आधार मानने की जो बात भी अविश्वसनीय लगती है क्योंकि श्री गाँधी के हाथ कमान आने के बाद भी टिकिट वितरण में पुरानी संस्कृति ही लागू रही और नेताओं के कृपापात्रों को ही उपकृत किया जाता रहा। युवाओं को अगली पंक्ति में शामिल करने का जो संकल्प उन्होंने शुरुआत में लिया था वह भी अमल में नहीं आ सका। वरना सचिन पायलट राजस्थान और ज्योतिरादित्य सिंधिया म.प्र के मुख्यमंत्री बनाये जाते। सही बात तो ये है कि चाहे पार्टी का नेतृत्व सोनिया गाँधी के हाथ रही या राहुल के उनके इर्द - गिर्द ज्यादातर लंगड़े घोड़े ही नजर आते हैं। कुछ कांग्रेसियों को बिना बुलाये बारात में घुसने की आदत है। लेकिन जो सही अर्थों में रेस के घोड़े हैं उनको घास खाने, पानी पीने और रिलेक्स करने के साथ ही दूसरों को परेशान न करने की हिदायत के साथ रेसकोर्स से बाहर रहने कह दिया जाता है। ज्यादा दूर क्यों जाएं म.प्र में ही दो दशक से भी अधिक से जिन प्रादेशिक छत्रपों के कारण कांग्रेस सत्ता से वंचित है आज भी वे उसके सिर पर सवार हैं। जिन युवाओं के हाथ में संगठन की बागडोर दी गई उनकी कितनी पकड़ पार्टी पर है ये सभी जानते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कमलनाथ भले ही जनता द्वारा ठुकराए जा चुके हैं किंतु वे अपने बेटों को स्थापित करने के लिए जबरन लदे हुए हैं। यही हाल लगभग हर प्रदेश में कांग्रेस संगठन का है। ये सब देखते हुए यदि श्री गाँधी की मंशानुसार कांग्रेस में बारात, रेस और लंगड़े घोड़ों को उनकी सही जगह दिखाई जाए तो फिर उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनकी बातें सैद्धांतिक तौर पर भले सही हों किंतु वे व्यवहारिक तौर पर कारगर नहीं होतीं । ये बात भी सही है कि वे अपनी कही बातों को खुद भी भूल जाते हैं। इसीलिए जिस इंडिया गठबंधन की ओर से वे प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार बने वह लोकसभा चुनाव के बाद से ही बिखरने लगा। दरअसल कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या वह खुद है क्योंकि वह अपना रास्ता भूल चुकी है । राहुल जितनी ताकत भाजपा और रा.स्व.संघ को गरियाने में खर्च करते हैं उससे आधी भी वे पार्टी को मजबूत करने में लगाते तो आज उसकी ये दशा नहीं होती।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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