आज 25 जून है । कहने को ये एक तिथि मात्र है परंतु आजाद भारत में ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है | आधी सदी पहले आधी रात में तबकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान और लोकतंत्र की हत्या का दुस्साहस किया था ।इसके पूर्व 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से श्रीमती गांधी के विरुद्ध 1971 का लोकसभा चुनाव लड़े समाजवादी नेता स्व. राजनारायण की चुनाव याचिका मंजूर करते हुए उस चुनाव को अवैध करार दिया | न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा के उस फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया । 1971 में बांग्ला देश के निर्माण के बाद पूरे विश्व में इंदिरा जी की प्रशस्ति फैल गई थी। लेकिन चुनाव अवैध हो जाने के कारण उनकी सत्ता खतरे में पड़ गई । अपेक्षित तो ये था कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की खातिर वे त्यागपत्र देतीं । लेकिन जगह - जगह न्यायमूर्ति . सिन्हा के पुतले जलाए जाने लगे। उनके छोटे बेटे स्व. संजय गांधी ने तो ये तक कहा कि करोड़ो लोगों द्वारा चुनी हुई प्रधानमंत्री को एक न्यायाधीश भला कैसे हटा सकता है ? उधर विपक्ष इंदिरा जी से इस्तीफे की मांग करने लगा । असल में विशाल बहुमत होते हुए भी श्रीमती गाँधी अलोकप्रिय होने लगीं थीं। गुजरात से 1974 में प्रारंभ छात्र आन्दोलन बिहार होता हुए पूरे देश में फैल चुका था। सर्वोदयी नेता स्व. जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करते हुए सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया । उसके अंतर्गत 6 मार्च 1975 को दिल्ली में जो सर्वदलीय रैली निकली उससे इंदिरा जी चिंतित हो उठीं। कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी श्रीमती गांधी के रवैये और संजय के व्यवहार से रुष्ट थे । इस तरह से वे चारों तरफ से घिर गईं और 25 जून 1975 की आधी रात में जब पूरा देश नींद में था तब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने वाले अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए । सुबह होते तक जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपालानी , अटल बिहारी वाजपेयी , चौधरी चरण सिंह , लालकृष्ण आडवाणी , चन्द्रशेखर , मधु लिमये , राजनारायण , मधु दंडवते , नानाजी देशमुख , प्रकाश सिंह बादल आदि को तो गिरफ्तार किया ही गया किंतु उनके अलावा देश भर से प्रदेश , जिला और तहसील तक के विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए गये ।अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही मौलिक अधिकार भी निलंबित कर दिए गए । समाचार पत्रों पर सेंसर लग गया। जयप्रकाश जी की तुलना हिटलर से की गई।सरकार के प्रचार माध्यम ये माहौल बनाने लगे कि विपक्ष जनता द्वारा चुनी श्रीमती गाँधी की सरकार को अपदस्थ करने का षडयंत्र रच रहा था ।यद्यपि आपत्काल के औचित्य को साबित करने के लिए जमाखोरों, मुनाफाखोरों सहित अनेक समाज विरोधी तत्वों को भी गिरफ्तार कर लिया गया । लेकिन इस सबका असली कारण अलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह फैसला ही था । 19 महीने देश में श्रीमती गांधी की तानाशाही चली । लोकसभा का कार्यकाल एक वर्ष बढ़ाकर उच्च न्यायालय का फैसला उलट दिया गया । जब लगा कि विपक्ष ठंडा पड़ गया है तब उन्होंने मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव करवाए जिसमें कांग्रेस पराजित हुई और नई गठित जनता पार्टी की सरकार बन गयी । यहाँ तक कि श्रीमती गांधी रायबरेली और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गये । दुनिया के किसी देश के प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए संसद का चुनाव हारने का ये पहला अवसर था । हालांकि जनता पार्टी सरकार भी आपसी खींचतान के चलते 27 महीने में गिर गई और 1980 में इंदिरा जी की वापिसी हो गई । लेकिन आपातकाल रूपी अपराधबोध के कारण पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं । आज जो लोग संविधान को खतरे में बताने का राग अलाप रहे हैं , वे इंदिरा जी द्वारा थोपे गये आपातकाल और उसके दौरान हुए अत्याचारों के बारे में पढ़ें और जानें तब उनको एहसास होगा कि 19 माह का वह दौर कितना भयावह था । हालंकि उस समय की जनता बधाई की हकदार है जिसने तानाशाही को उखाड़ फेंका । तबसे हमारा लोकतंत्र मजबूत तो हुआ लेकिन जनता पार्टी की लहर में ऐसे लोग भी प्रथम पंक्ति के नेता बन बैठे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर प्रस्तुत व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प की धज्जियां उड़ाते हुए जातिवाद का जो जहर फैलाया वही आज भरतीय राजनीति की पहचान बन गया है । उस दृष्टि से 25 जून हर संविधान प्रेमी के लिए आत्मावलोकन का दिन है । ये भी अजीब संयोग है कि उस आपातकाल के शिकार नेता और उनकी पार्टियां आज उसी कांग्रेस की सहयोगी हैं जिसके माथे पर संविधान की हत्या का कलंक है । गत वर्ष नई लोकसभा के शुभारंभ पर काँग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेता संविधान की प्रति लेकर गए थे। देखना है संविधान को सूली पर चढाए जाने की बरसी पर उनके हाथ में क्या होगा? भले ही राहुल अब मानते हैं कि आपातकाल गलत था लेकिन क्या उनमें इतना साहस है कि वे अपनी दादी द्वारा संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाए जाने की निंदा करें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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