ऐसा लगता है अमेरिका की सीमाएं बढ़ाने के फेर में डोनाल्ड ट्रम्प देश को गृहयुद्ध में धकेल रहे हैं। न्यूयॉर्क के बाद दूसरे सबसे बड़े शहर लॉस एंजेलिस में अवैध प्रवासियों की धरपकड़ के विरोध में जबरदस्त उपद्रव, आगजनी और दंगे का माहौल है। ट्रम्प ने कैलिफोर्निया राज्य के गवर्नर को दरकिनार करते हुए केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात कर दिये। इसी राज्य में सिलीकान वैली भी है जिसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ लाखों की संख्या में विदेशी काम करते हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि लॉस एंजेलिस की जनसंख्या 38 लाख है जिसमें 13 लाख अवैध प्रवासी हैं जिनमें बड़ी संख्या लैटिन अमरीकी देशों से आये शरणार्थियों की है। ट्रम्प ने दूसरी बार सत्ता में आते ही अवैध प्रवासियों के विरुद्ध कारवाई प्रारंभ कर दी थी। सैकड़ों प्रवासियों को हवाई जहाजों से वे उनके देश भिजवा चुके हैं जिनमें भारत से गए लोग भी थे। लेकिन लॉस एंजेलिस में जिस तरह का उपद्रव हुआ वह इस बात का संकेत है कि अमेरिका में आकर बस गए अवैध प्रवासियों को निकाल बाहर करना उतना आसान नहीं है जितना ट्रम्प ने समझ रखा है। लॉस एंजेलिस में जो हो रहा है उसके पीछे वामपंथी तत्व बताये जाते हैं जो बीते कुछ सालों में काफी संगठित और शक्तिशाली हो चले हैं। पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन के सलाहकार रहे जॉर्ज सोरोस ने अमेरिका में वामपंथी विचारधारा को काफी संरक्षण दिया। अवैध प्रवासी चूंकि अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं इस कारण वे वामपंथियों से जुड़ते गए। ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर लैटिन अमेरिकी देश अमेरिका से नफरत करते हैं। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि लैटिन देशों में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल - पुथल के पीछे अमेरिका का हाथ रहा है। कुछ देशों में उसने तख्ता पलट तक करवाया। क्यूबा से तो अमेरिका के रिश्ते सांप- नेवले जैसे रहे हैं। लंबे समय तक उसके शासक रहे फिडेल कास्त्रो की हत्या के अनेक असफल प्रयासों के पीछे भी अमेरिका का हाथ होने की बात सामने आती रही। यही कारण है कि लैटिन अमेरिकी देशों से आये अवैध प्रवासी भी अमेरिका की धरती पर वामपंथी विचारधारा के बीज लेकर आये जो अंकुरित होने के बाद अब पौधे का रूप ले चुके हैं। अमेरिका में चीनी आबादी भी तेजी से बढ़ी है जिसके खून में वामपंथ है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से चली आ रही अशांति के चलते जिन मुस्लिम शरणार्थियों को अमेरिका ने मानवीय आधार पर बसने की सुविधा दी वे भी आस्तीन के सांप बन बैठे हैं। इस सबका असर ही लॉस एंजेलिस के मौजूदा संकट के रूप में सामने आया है। अमेरिका अकेला नहीं है जिसे इस समस्या से जूझना पड़ रहा है। उसका पड़ोसी कैनेडा सिख प्रवासियों को गोद में बिठाने के बाद खालिस्तानी आतंक का गढ़ बना हुआ है। यूरोपीय देशों में ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क स्पेन, पुर्तगाल सभी मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देकर खून के आँसू रो रहे हैं। एशियाई देशों में भारत अवैध शरणार्थियों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है जिनकी संख्या करोड़ों में है। बांग्ला देश, म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान से चोरी छिपे आये ये प्रवासी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा तो हैं ही इनके जरिये अलगाववाद भी जड़ें जमा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव भले ही धमाकेदार अंदाज में जीत लिया और कुछ हजार अवैध प्रवासियों को देश निकाला देने में सफल भी हुए लेकिन लॉस एंजेलिस में जो हालात उत्पन्न हो गए वे भारत की राजधानी दिल्ली में हुए शाहीन बाग धरने का ही विस्तारित रूप है। ये सबक है भारत जैसे उन तमाम देशों के लिए जो मानवीय संवेदनाओं के वशीभूत शरणार्थियों को अपने घर में घुसने की अनुमति देने की गलती कर बैठे। बड़ी बात नहीं लॉस एंजेलिस की आग पूरे अमेरिका में फैल जाए क्योंकि इससे अन्य शहरों में फैले अवैध प्रवासी प्रोत्साहित होकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने पर उतारू हो सकते हैं और वह स्थिति अमेरिका की आंतरिक शांति को नुकसान पहुंचाए बिना नहीं रहेगी। लॉस एंजेलिस अमेरिका के वैभव का बड़ा केंद्र है। उसमें अवैध प्रवासियों की इतनी बड़ी संख्या और उनके आक्रामक रवैये से ये बात स्पष्ट है कि उनको निकालना उतना आसान नहीं जितना ट्रम्प समझ रहे थे। उनके और राज्यों के बीच बढ़ती टकराहट भी संघीय ढांचे के लिए खतरा बन रही है। दूसरे कार्यकाल के कुछ महीनों में ही अमेरिका के अंदरूनी हालात जिस तरह बिगड़े उन्हें देखकर ये आशंका उत्पन्न होने लगी है कि कहीं ट्रम्प अमेरिका को उसी तरह विखंडन की ओर न ले जाएं जैसा गोर्बाचोव ने सोवियत संघ में किया था।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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