Saturday, 28 June 2025

उद्धव और राज : फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती


भाषावार प्रांतों के गठन ने क्षेत्रीयता को कितना बढ़ावा दिया ये किसी से छिपा नहीं है। आजादी के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न राज्यों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करते हुए उन्हें नये नाम भी दिये गए। कालांतर में कुछ ने अपना नाम फिर बदला । उदाहरण के लिए मद्रास को तमिलनाडु और मैसूर को कर्नाटक नाम मिला। इसके पीछे भाषायी आधार पर अपनी पहिचान स्थापित करने का उद्देश्य ही था। इस भावना ने अलगाव के बीजों को खाद - पानी देकर अंकुरित होने में मदद की। रोचक बात ये है कि भाषा के नाम पर क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज बुलंद करने वालों में लेखक, कवि या साहित्यकार वर्ग से ज्यादा राजनीतिक नेता ही सामने आते रहे और उनमें भी राष्ट्रीय पार्टियों के कम और क्षेत्रीय दलों से जुड़े चेहरे अधिक  हैं। वैसे तो भाषा के नाम पर अनेक राज्यों में जनभावनाएं भड़काने का खेल चलता है लेकिन उनमें तमिलनाडु सबसे अग्रणी है। वहाँ चूंकि दो प्रमुख क्षेत्रीय दल ही अनेक दशकों से सत्ता पर काबिज हैं लिहाजा राष्ट्रीय पार्टियाँ भावनात्मक मुद्दों पर खुलकर नहीं बोल पातीं। तमिल भाषा के समर्थन की आड़ में वहाँ की दोनों बड़ी पार्टियों द्वारा हिन्दी के विरोध को अपना हथियार बना रखा है।  समय - समय पर अन्य राज्यों में भी भाषा के नाम  पर वातावरण खराब करने का षडयंत्र रचा जाता है। ताजा उदाहरण है महाराष्ट्र का जहाँ केंद्र की नई शिक्षा नीति में हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य किये जाने के विरोध में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे बैर भूलकर साथ आने के संकेत दे रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस साफ तौर पर कह चुके हैं कि मराठी भाषा की उपेक्षा कर हिन्दी लादने की बात  गलत है। लेकिन ठाकरे बंधुओं, की पार्टियां  हिन्दी के विरोध को  राजनीतिक मुद्दा बनाकर उन मराठी भाषियों को वापस अपने पाले में खींचना चाहते हैं जो धीरे - धीरे भाजपा की तरफ झुकते चले गए। एक जमाना था जब स्व. बाल ठाकरे मुंबई और निकटवर्ती जिलों के बेताज बादशाह हुआ करते थे। जब राज ठाकरे ने अलग पार्टी बनाई तब नासिक सहित कुछ इलाकों में उनका सिक्का चलने लगा। नब्बे के दशक में भाजपा के साथ गठबंधन  करने करने के बाद शिवसेना का फैलाव तो पूरे राज्य में हो गया लेकिन अपनी तेज - तर्रार छवि के बावजूद राज की पार्टी मनसे कुछ खास नहीं कर सकी। बाल ठाकरे के अवसान के बाद उनके बेटे उद्धव ने शिवसेना की कमान संभाली जिन्हें वे अपना उत्ताधिकारी बना गए थे और उसी कारण राज ने पार्टी और परिवार छोड़ा था। उद्धव ने  उत्तर भारतीयों के विरोध की नीति को काफी हद तक लचीला किया और हिन्दी के प्रति भी दुराग्रह में कमी की । दूसरी तरफ राज अपने पुराने अंदाज में ही नजर आते रहे किंतु बाल ठाकरे की विरासत उद्धव के पास आकर ठहर गई। भाजपा का  साथ मिलने से उनकी पार्टी बड़ी ताकत बन गई। लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता कायम होते ही भाजपा ने शिवसेना से बड़े भाई का ओहदा छीनने की रणनीति बनाई। कुछ  समय तक हिंदुत्व दोनों को जोड़े रहा किंतु  रूठने - मनाने का सिलसिला नहीं रुका।  अंततः अलगाव हो ही गया और वह भी ऐसा कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की पुण्याई को समुद्र में  डुबोकर सत्ता की लालच में उस कांग्रेस और शरद पवार की गोद में जा बैठे जो हिंदुत्व के नाम से ही बिदकते थे। यहाँ तक कि सपा का साथ भी उन्होंने स्वीकार किया जिसके नेता स्व. मुलायम सिंह यादव ने राम भक्तों पर गोली चलवाने जैसा महापाप किया था। इस वजह से उनकी पार्टी टूट गई और सत्ता भी हाथ से खिसक गई। पिछले विधानसभा चुनाव में उद्धव वाली Bशिवसेना का सितारा पूरे तौर पर डूब चुका है। उधर  राज किसी मुकाम पर नहीं पहुँच पा रहे। प्रदेश सरकार के पास भारी बहुमत है। उद्धव बीमार हैं और राज का जनाधार सिमट चुका है। ऐसे में अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने से  दोनों को अपने बेटों की चिंता सताने लगी है जिनकी जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है। क्योंकि शिवसेना के मूल चरित्र से  उनका व्यक्तित्व मेल नहीं खाता। लगता है हिन्दी  विरोध का सहारा लेकर बेटों को स्थापित करने दोनों वरिष्ट ठाकरे दुश्मनी भुलाकर निकट आ रहे हैं किंतु  ये दाँव पहले भी कारगर नहीं हुआ और आगे भी नहीं होगा क्योंकि जिस मुंबई से  ठाकरे खानदान की पहचान जुड़ी रही वह खुद ही मराठीभाषियों के वर्चस्व से मुक्त है। भले ही उद्धव और राज, भाषायी उन्माद फैलाकर उपद्रव की स्थिति उत्पन्न करने का दुस्साहस करें किंतु महाराष्ट्र और तमिलनाडु की राजनीति और सोच में बड़ा अंतर है। तमिलनाडु के नेता और अभिनेताओं की छवि सीमित क्षेत्र में ही है जबकि महाराष्ट्र से निकली शख्सियतों को देश भर में प्रसिद्धि और दुलार मिलता रहा। लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न न मिला होता तब भी वे देश भर में सम्मानित थे जबकि वह छवि एम. जी. राम चंद्रन की नहीं बन सकी। ठाकरे बंधु ये भूल जाते हैं की मुंबई हिन्दी फिल्मों का गढ़ है। ये देखते हुए उनकी हिन्दी विरोधी मुहिम पानी के बुलबुले से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे भी फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

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