उड़ीसा में जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा एक विश्वस्तरीय वार्षिक आयोजन है। यूँ तो भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का उत्सव पूरे देश में कहीं बड़े तो कहीं साधारण स्तर पर मनाया जाता है किंतु जगन्नाथ पुरी आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में है जहाँ जगन्नाथ जी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस मंदिर के साथ अनेक चमत्कारी बातें जुड़ी हुईं हैं जिन्हें लेकर वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हैं। उदाहरण के लिए मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हवा की विपरीत दिशा में फहराता है। इसके अलावा भी जगन्नाथ जी की मूर्तियों के साथ जुड़ी ऐसी बातें हैं जिनका रहस्य आज तक कोई नहीं जानता। पुरी के नाम से प्रसिद्ध समुद्र के किनारे स्थित इस प्राचीन और पवित्र नगरी में साल भर श्रृद्धालुओं का आना - जाना लगा रहता है । इसके अलावा अन्य धार्मिक स्थलों की तरह से ही पुरी भी पर्यटकों की बड़ी पसंद बन गई है। लेकिन रथ यात्रा महोत्सव के दौरान यहाँ जनसैलाब उमड़ पड़ता है। उड़ीसा सरकार भी इसका खूब प्रचार करती है जिससे यह उत्सव धार्मिक पर्यटन का रूप लेने लगा है। साल दर साल रथ यात्रा में आने वालों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए सरकार के अलावा पर्यटन व्यवसायी भी काफी व्यवस्थाएं करते हैं किंतु हर साल कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जिससे समूची व्यवस्था पर उंगली उठती है। गत दिवस भी हादसे की पुनरावृत्ति हो गई जब मुख्य मंदिर के अलावा एक मंदिर में धक्का - मुक्की के कारण 3 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ गया वहीं लगभग 100 घायल हैं। उनमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुरी के वरिष्ट प्रशासनिक अधिकारियों को हटाकर दूसरे पदस्थ किये गए हैं। मुख्यमंत्री ने माफी भी मांगते हुए स्वीकार किया है कि ये लापरवाही क्षमा योग्य नहीं हैं। जैसा होता आया है इस घटना के बाद भी मृतकों के परिजनों को मुआवजे और घायलों के मुफ्त इलाज की मेहरबानी सरकार द्वारा की जाएगी। एक जांच दल बनेगा जिसकी रिपोर्ट आते - आते अगली रथ यात्रा आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। सरकारी अमले के कुछ लोग निलंबित होंगे और फिर सब सामान्य हो जाएगा। भारत में धार्मिक स्थलों पर जानलेवा हादसे अब स्थायी हो चले हैं। महाकुंभ में तो करोड़ों लोगों की उपस्थिति होने से कोई अनहोनी अस्वाभविक नहीं कही जाती किंतु प्रति वर्ष किसी न किसी मंदिर में श्रृद्धालुओं की भीड़ व्यवस्थाओं पर भारी पड़ जाने से धक्का- मुक्की में लोग मारे जाते हैं। उत्तराखंड स्थित चार धाम की स्थिति भी ऐसी ही है। विशेष धार्मिक आयोजनों के पहले शासन और प्रशासन हरसंभव व्यवस्था का दावा करते हैं किंतु भीड़ उनके अनुमान से अधिक होने के अलावा अनुशासन तोड़ने पर आमादा रहती है। उससे भी बड़ी समस्या है वी. आई.पी जो अपने ओहदे की ठसक दिखाते हुए सभी इंतजामों की धज्जियां उड़ा देते हैं। पुरी में भी कल हुए दर्दनाक हादसे में भी उनके लिए की गई विशेष व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा रहा है। दरअसल इस प्रकार की दुर्घटनाओं की सच्चाई कभी सामने नहीं आती क्योंकि जो शासन और प्रशासन इसके लिए कसूरवार होता है , जाँच भी उसी के नियंत्रण में होती है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय ये है कि ऐसे हादसों से जनता कोई सबक नहीं लेती जबकि जान का खतरा उसे ही रहता है। सूचना क्रांति के इस युग में भीड़ और यातायात की जानकारी प्रसारित होते रहने के बाद भी लोग आयोजन में शामिल होने का दुस्साहस करते हैं। धर्म के प्रति आस्था भारत की आत्मा है किंतु उसका पालन करते समय अनुशासन का ध्यान रखना भी आवश्यक है। भीड़ के प्रबंधन में लगे शासकीय तंत्र की भी अपनी सीमाएं और क्षमता होती है। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में है कि सरकारी प्रबंध पर पूरी तरह निर्भर न रहते हुए अपनी और अपनों की हिफ़ाजत के प्रति सतर्क रहें। रथ यात्रा अगले साल भी होगी लेकिन जो ज़िंदगी से हाथ धो बैठे उनको ये अवसर दोबारा नहीं मिलेगा। आस्था का पालन स्वागतयोग्य है किंतु उसके अतिरेक से बचना चाहिए। तीर्थ यात्रा के पीछे मोक्ष की कामना छिपी होती है लेकिन वह धक्का - मुक्की में कुचलकर मर जाने से प्राप्त नहीं होता। विवेकशीलता यही है कि हम व्यवस्था का हिस्सा बनें , अव्यवस्था का नहीं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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