भारतीय समय के अनुसार रविवार की सुबह अमेरिका के लडाकू विमानों के दस्तों ने ईरान के उन तीन परमाणु केंद्रों पर अत्यंत शक्तिशाली बम बरसाए जो धरती के सैकड़ों मीटर नीचे जाकर भी लक्ष्य को नष्ट कर सकते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का दावा है कि ईरान की परमाणु अस्त्र बनाये जाने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी गई है। वहीं ईरान की मानें तो उसके परमाणु संयंत्रों को बहुत कम नुकसान हुआ क्योंकि हमले की आशंका के कारण उसने उक्त स्थलों से यूरेनियम वगैरह अन्यत्र स्थानांतरित कर दिये थे। सच्चाई जो भी हो किंतु अमेरिका के शामिल होने से ये जंग अब अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप लेने लगी है। प्रमाणस्वरूप रूस के पूर्व राष्ट्रपति का बयान भी आ गया जिसमें ईरान को परमाणु अस्त्र देने की बात कही गई है। ऐसा ही आश्वासन उ. कोरिया के तानाशाह किम जोंग ने दे डाला जो अमेरिका के कट्टर दुश्मन हैं। अमेरिका विरोधी तमाम देश ईरान पर हमले के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी व्यापक समर्थन मिलने से साबित हो गया है कि दुनिया शीत युद्ध वाले दौर में लौट रही है। देखने वाली बात ये है कि ट्रम्प के अड़ियलपन से नाराज यूरोपीय देश भी इजराइल के समर्थक और ईरान द्वारा परमाणु अस्त्र बनाये जाने के घोर विरोधी हैं। मुस्लिम देशों द्वारा अमेरिकी हमले का दबी जुबान से विरोध भले किया जा रहा हो किंतु वे ईरान की मदद करने का साहस भी नहीं दिखा पा रहे। पाकिस्तान ने तो शनिवार को ही नोबल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प के नाम की अनुशंसा किया और कल अमेरिका के हमले की निंदा की। इस युद्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सवाल ये है कि क्या रूस और चीन भी ईरान की तरफ से, इजराइल पर वैसी ही कार्रवाई करेंगे? लेकिन यूक्रेन युद्ध में उलझे रूस के लिए ऐसा करना नामुमकिन है और रही बात चीन की तो उसकी विदेश नीति अब अमेरिका विरोध की बजाय आर्थिक हितों पर केंद्रित होकर रह गई है। ये भी विचारणीय है कि जो रूस यूक्रेन की संप्रभुता को मानने तैयार नहीं है वह किस मुँह से इजराइल और अमेरिका को ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने का उपदेश दे रहा है? इसी तरह चीन भी ताइवान को हड़पने के लिए तैयार बैठा है। यदि अमेरिका का संरक्षण न होता तो उसके मंसूबे कभी के पूरे हो जाते। इस्लामिक कट्टरता से नियंत्रित ईरान में मानवाधिकारों का जो कत्ल होता आया है उसके कारण उसकी छवि मुस्लिम देशों के बीच भी बहुत अच्छी नहीं है। महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की जो घटनाएं जानकारी में आईं वे किसी सभ्य समाज में तो स्वीकार्य नहीं हो सकतीं। ईरान में शिया मुसलमानों, का बाहुल्य भी उसे अन्य मुस्लिम देशों से दूर करता है जहाँ सुन्नियों का प्रभाव है। शिया और सुन्नी दोनों इस्लाम के अनुयायी होने के बाद भी एक दूसरे से घृणा करते हैं। इसीलिए ईरान और ईराक के बीच 10 साल तक युद्ध चला जिसमें लाखों लोगों की जान चली गई। ईरान के पड़ोसी पाकिस्तान में भी शिया असुरक्षित हैं। सऊदी अरब भी ईरान को पसंद नहीं करता। दूसरी तरफ अमेरिका ने अनेक मुस्लिम देशों को अपने प्रभाव में ले लिया है। वहाँ उसके सैनिक अड्डे भी हैं। स्मरणीय है सीरिया में जब रूस समर्थक तानाशाह असद की सत्ता के विरुद्ध चला आ रहा विद्रोह कामयाबी के नजदीक पहुंचा तब असद सपरिवार मास्को भाग गए क्योंकि यूक्रेन के साथ लड़ाई के चलते रूस की सेनाएं मदद करने में असमर्थ साबित हुईं। नतीजा सीरिया के कई टुकड़ों के रूप में सामने आया जिसमें गोलान हाइट्स पर इजराइल ने कब्जा जमा लिया। ऐसे में यदि ये लड़ाई ज्यादा चली जिसका संकेत ईरान द्वारा ट्रम्प का शांति वार्ता प्रस्ताव ठुकराने से मिला तब क्या खामेनेई अपने देश को एकजुट रख पाएंगे ये सवाल उठ खड़ा हुआ है। ईरान के तमाम वैज्ञानिक और सैन्य जनरल मारे जा चुके हैं। याद रहे जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के खात्मे के लिए ईराक पर हमला किया तब भी रूस और चीन सहित दुनिया के तमाम देश ईराक के पक्ष में बयानबाजी से ज्यादा कुछ न कर सके। अंततः सद्दाम का खात्मा हो गया। अमेरिका और इजराइल की मजबूरी ये है कि वे खामेनेई को घायल करके नहीं छोड़ सकते क्योंकि तब वे अमेरिका के सबसे बड़े विरोधी के तौर पर मान्य होंगे जो इजराइल के अस्तित्व के लिए खतरा होगा। इस कारण ईरान के लिए इस लड़ाई से विजेता बनकर निकलना आसान नहीं है क्योंकि कोई भी महाशक्ति उसके साथ उस तरह नहीं दिख रही जैसे अमेरिका ने इजराइल की पीठ पर हाथ रखा हुआ है। यदि खोमेनेई तेल आपूर्ति के समुद्री मार्ग बाधित करने जैसा कदम उठाते हैं तब वे सहानुभूति खो बैठेंगे। कुल मिलाकर ये लड़ाई अब अमेरिका और ईरान के बीच हो गई है। इसके विश्वयुद्ध में परिवर्तित होने की संभावना फिलहाल तो ज्यादा नहीं है क्योंकि रूस और चीन युद्ध से दूर ही रहेंगे जिसे अमेरिका भांप चुका है। सीरिया में असद की सत्ता के पतन ने उसका हौसला मजबूत कर दिया है। ईरान की मिसाइलें इजराइल को नुकसान तो पहुंचा रही हैं किंतु इजराइल के हमलों के कारण उसकी सैन्य क्षमता रोजाना कमजोर हो रही है। खामेनेई का सामने न आना और अपने उत्तराधिकारी का चयन गिरते मनोबल का प्रमाण है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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