Wednesday, 11 June 2025

राजनीतिक कटुता और संवादहीनता दूर करने की दिशा में अच्छा प्रयास


विदेश भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लौट आये। प्रधानमंत्री ने उनमें शामिल नेताओं से मुलाकात कर उनके अनुभव जाने। इस दौरान वातावरण बहुत ही अनौपचारिक रहा भारतीय राजनीति में बढ़ती कटुता और आलोचना के घटते स्तर से प्रत्येक समझदार व्यक्ति चिंतित और दुखी है। संसद में सार्थक बहस गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। ऐसा नहीं है कि संसदीय प्रक्रिया और उससे जुड़ी मर्यादाओं  के जानकार अनुभवी सांसद लोकसभा और राज्यसभा में न हों किंतु अव्वल तो उनकी पार्टी उन्हें अवसर  नहीं देती और यदि देती भी है तो सदन में होने वाले होहल्ले में उनका वक्तव्य अनसुना रह जाता है। वरिष्ट सांसदों तक के भाषण के बीच टोकाटाकी आम बात है। मुद्दों की बजाय व्यक्तिगत छींटाकशी से सदन का वातावरण गरिमा विहीन होकर रह जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल विपक्ष ही इसके लिए दोषी है। सत्तापक्ष में भी कतिपय सांसद ऐसे हैं जिनकी टिप्पणियों से विवाद पैदा हो जाते हैं। दुख तो तब होता है जब आसंदी के सम्मान का ध्यान तक नहीं  रखा जाता। ये स्थिति रातों - रात नहीं बनी बल्कि 1980 में इंदिरा गाँधी के सत्ता में लौटने के बाद सदन में आई संजय गाँधी की कथित ब्रिगेड ने संसद के भीतर हंगामे की शुरुआत की जो धीरे - धीरे सभी दलों ने अपना ली। संसद के बाहर का वातावारण तो और भी विषैला है। चुनाव के दौरान अपने विरोधी की आलोचना करते हुए तीखे तीर छोड़ना एक बार स्वीकार्य हो भी जाए किंतु उसके बाद के समय में भी   वातावरण में कटुता इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है कि राजनीतिक विरोध  शत्रुता में बदल चुका है। ये भी सही है कि राजनीति सिद्धांतों के बजाय व्यवसायिक हित साधने पर केंद्रित हो गई है। इसीलिए नेताओं की पहिचान वैचारिक प्रतिबद्धता के  । आधार पर करना मुश्किल है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि वैचारिक विरोध और दुश्मनी में अंतर रखा जाए। दुर्भाग्य से लोकतंत्र को अपनाने के बाद भी  राजनीतिक जगत उसके अंतर्निहित गुणों को आत्मसात नहीं कर सका। इसलिए सत्तर के दशक तक संसद और उसके बाहर राजनीति का जो स्तर नजर आता था वह आज दुर्लभ है। इसका कारण हर पार्टी और नेता में सत्ता हथियाने की हवस है। आजादी के बाद  अनेक नेता पंडित नेहरू से असहमत होने पर कांग्रेस से बाहर आ गए । कुछ ने अलग दल बनाया तो कुछ समान विचारधारा वाले दल में चले आये। वहीं कुछ ने राजनीति छोड़ समाज सेवा का दूसरा क्षेत्र चुन लिया। लेकिन आपसी रिश्तों में सौजन्यता और आत्मीयता सदैव बनी रही। आज उसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। दल बदलने का कारण सिद्धांत न होकर सत्ता की चाहत और स्वार्थों की पूर्ति हो गया है। चुनावी गठबंधन भी क्षणिक लाभ पर आधारित होते हैं। सरकार का समर्थन या विरोध भी सौदेबाजी पर आधारित होता है। सत्ता और विपक्ष के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं किंतु राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर एकजुटता का अभाव लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रहा है। ऐसे में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद जो सर्वदलीय एकता नजर आई वह भी काफी हद तक रस्म अदायगी रही क्योंकि बैठक के दौरान एकता की सौगंध खाने वाले नेता गण बाहर आकर अपनी ढपली अपना राग लेकर बैठने लगे। यहाँ तक कि पाकिस्तान के विरुद्ध शुरू किये गए ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भी जिस प्रकार के बयान आते रहे वे उस भावना से अलग थे जो  सर्वदलीय बैठक में देखने मिली । बावजूद इसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान की कूटनीतिक घेराबंदी करने जब 7 प्रतिनिधिमंडलों को विभिन्न देशों में भेजने का फैसला किया तब उनमें केवल केन्द्र सरकार में शामिल पार्टियों के सांसदों और नेताओं को शामिल करने के बजाय समूचे विपक्ष को साझेदारी दी। यही नहीं कुछ प्रतिनिधिमंडलों का मुखिया भी विपक्षी नेताओं को बनाकर भारत की एकता का संदेश पूरे विश्व को दिया। यद्यपि मंथरा और शकुनी की मानसिकता से प्रेरित विघ्न संतोषियों ने रायता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ पार्टियों को अपने नेताओं का चयन तक नागवार गुजरा किंतु देश पर आये संकट के समय जिस दायित्वबोध और एकता की जरूरत होती है उसका परिचय देते हुए सभी प्रतिनिधिमंडलों में शामिल सदस्यों ने बेहतरीन परिपक्वता का प्रदर्शन विदेशों में किया। उनके दौरों की सफलता पर सवाल  उठाने वालों से केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उनसे दुनिया को ये संदेश देने में सफलता मिली कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर आये खतरे के समय भारत एकजुट है। प्रतिनिधिमंडलों की वापसी पर प्रधानमंत्री द्वारा उनसे भेंट का जो कार्यक्रम रखा वह एक अच्छी शुरुआत कही जायेगी। इससे राजनीतिक कटुता कम होने के अलावा पक्ष - विपक्ष में चली आ रही संवादहीनता भी दूर होगी। जिसे ये भी अच्छा न लग रहा हो उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि उसे केवल अपने राजनीतिक स्वार्थ की चिंता है, देशहित की नहीं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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