इजरायल और ईरान की जंग जिस स्थिति में आ गई है वहाँ से इजराइल के लिए पीछे हटना बेहद कठिन है। इसीलिए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कभी जंग रुकवाने के लिए सक्रिय होते हैं किंतु कुछ देर बाद ईरान को धमकाने में जुट जाते हैं। सर्वविदित है कि इजराइल की पीठ पर अमेरिका का हाथ है। प्रमुख मुस्लिम देश भी या तो अंदर - अंदर इजराइल के साथ हैं या दूर से तमाशा देख रहे हैं। अरब जगत एकजुट होकर ईरान की तरफदारी करता तब अमेरिका के लिए भी इजराइल को पूरी छूट देना आसान नहीं रहता। यद्यपि ईरान ने भी काफी दमखम दिखाया क्योंकि इजराइल के सुरक्षा आवरण को भेद पाना वाकई कमाल की बात है किंतु ईरानी प्रत्याक्रमण से विचलित हुए बिना इजराइल के लड़ाकू विमान सैन्य ठिकानों के अलावा हर महत्वपूर्ण संस्थान और हस्ती को निशाना बनाकर ईरान का हौसला पस्त कर रहे हैं। इसी का परिणाम है कि इजराइल के अस्तित्व को मिटाने की डींग हांकने वाले ईरान के कट्टरपंथी शासक अब युद्धविराम के पैग़ाम भेज रहे हैं। दूसरी तरफ इजराइल ने तेहरान खाली करने का फरमान जारी करते हुए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का इरादा व्यक्त करते हुए ये संकेत दे दिया है कि वह ईरान को घुटनाटेक करवाने पर आमादा है। इन हालातों में पूरी दुनिया में डर है कि ये बात कहीं परमाणु अस्त्रों के उपयोग तक न पहुँच जाए क्योंकि ईरान को हुए बड़े नुकसान के बाद भी उसके कुछ भूमिगत परमाणु संयंत्रों को नष्ट कर पाना इजराइल के लिए असंभव है और इसीलिए उसने अमेरिका से आग्रह किया है कि वह ये काम करे क्योंकि उसके पास ही ऐसे शक्तिशाली बम हैं जो जमीन के सैकड़ों फीट नीचे तक नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि अमेरिका सीधे युद्ध से बचते हुए ईरान को आण्विक हथियार बनाने से रोकने का लक्ष्य लेकर चल रहा है । कैनेडा में चल रहे जी - 7 सम्मेलन को छोड़कर ट्रम्प का अमेरिका लौट आने का कदम किसी बड़े फैसले का संकेत है। इधर नेतन्याहू द्वारा तेहरान खाली करने का आदेश देने के साथ ही खामेनेई के खात्मे की रट लगाने से लगता है अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान में इस्लामिक कट्टरपंथी सत्ता को उसी तरह हटाने में जुट गए हैं जैसे कुछ दशक पूर्व ईराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन को युद्ध के जरिये गद्दी से उतारकर मृत्युदंड दे दिया। ये योजना किस हद तक कामयाब होगी ये आज की स्थिति में कोई बताने की स्थिति में नहीं है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपने शत्रु से निपटने के मामले में बेहद सख्त माने जाते हैं। गाजा में जिस तरह की तबाही इजराइल ने मचाई वह इसका उदाहरण है। लेकिन ईरान बड़ा देश तो है ही उसके पास अपना सैन्य तंत्र भी है। जिसका प्रमाण तेल अबीब में मिसाइलें गिराकर वह दे चुका है। आने वाले कुछ ही समय में उसके द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने की आशंका ने ही अमेरिका को चौंका दिया और इसीलिए पहले दिन से ही इजराइल के हमलों में परमाणु संयंत्रों को नुकसान पहुंचाकर ईरान की आक्रामक क्षमता खत्म करने का प्रयास देखने मिला। अब ट्रम्प द्वारा नेतन्याहू को युद्ध रोकने की सलाह दी जाती है या वे आग में और घी डालने का काम करेंगे ये उनके अलावा कोई नहीं बता सकता क्योंकि उनकी सनक और ऊलजलल बयानबाजी कूटनीतिक मापदंडों के सर्वथा विपरीत है। बहरहाल युद्ध से विश्व व्यापार और आवागमन प्रभावित होने लगा है। अनेक देशों के हवाई मार्ग बंद होने से विमान सेवाएं अवरुद्ध हो रही हैं। कच्चे तेल के दाम उछलने लगे हैं जिनसे भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा जो इसका 85 फीसदी आयात करता है। ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के अलावा अमेरिका वहाँ इस्लामिक सत्ता को हटाकर अपने अनुकूल शासक बिठाना चाह रहा है जिससे उसकी तेल संपदा का मनमाफिक दोहन कर सके। इसलिए ये जंग अंतिम परिणाम तक जारी रही तो अरब जगत का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा। सही बात ये है मुस्लिम देशों में भी अब दुबई और अबूधाबी जैसा बनने की तलब पैदा हो चुकी है जिनने इस्लामिक स्वरूप को बरकरार रखते हुए भी अपने को आधुनिक और विकसित स्वरूप प्रदान किया। हो सकता है ईरान में भी शाह युग लौटे क्योंकि खामेनेई की इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध वहाँ विद्रोह की जो चिंगारी दबी हुई है वह जरा सी हवा मिलते ही भड़क सकती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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