Friday, 20 June 2025

सांप को गले में लटकाने वाली गलती कर बैठे ट्रम्प

भारत - पाकिस्तान में हुए  युद्ध के अचानक रुकने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड  युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने लगे और  पाकिस्तान को भारत के बराबर बताने की जुर्रत भी कर बैठे। भारत में विपक्षी दलों ने इसे  विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया। अमेरिका की तरफ से लगातार ऐसा कुछ किया जाता रहा जिससे लगा कि वह भारत को छोड़ पाकिस्तान के पक्ष में झुक रहा है। हालांकि ये अमेरिका की पुरानी नीति है जिसके अंतर्गत वह उसकी आर्थिक , सैनिक और कूटनीतिक सहायता करता रहा। कश्मीर मुद्दे पर भी उसका रुख ज्यादातर उसी के हक में ही नजर आया। लेकिन अमेरिका में 9/11 की घटना के बाद पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रुख कड़ा होने लगा। कारगिल युद्ध के बाद  अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते सुधरने लगे। इसमें तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी काफी योगदान रहा। हालांकि अमेरिका में रहने वाले अप्रवासी भारतवंशियों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। ये बात भी गौरतलब है कि आर्थिक क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदमों ने भी दोनों देशों को नजदीक लाने का काम किया। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमेरिका से रिश्तों का अच्छा समय शुरू हुआ। डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल में उनकी और श्री मोदी की जुगलबंदी काफी चर्चित रही। उनके बाद जो बाइडेन के दौर में रिश्तों में उतार चढ़ाव आये लेकिन स्थिति तब चिंताजनक हुई जब 2024 के लोकसभा चुनाव में बाइडेन के करीबी जॉर्ज सोरोस  ने भाजपा को हराने का कुचक्र रचा।बांग्ला देश में शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट और युनुस की ताजपोशी में अमेरिका की भूमिका भी भारतीय हितों के विपरीत रही। लेकिन ट्रम्प जब दोबारा सत्ता में आये तब उनका शुरुआती रुझान भारत के तरफ दिखा। बांग्ला देश पर उन्होंने अनेक प्रतिबंध लगाए। श्री मोदी के साथ  अपनी निकटता जाहिर करने में भी वे पीछे नहीं रहे। लेकिन पहलगाम की आतंकी घटना के बाद के घटनाक्रम में अमेरिका का रवैया जिस तेजी से बदला वह चौंकाने वाला था। जबकि उक्त घटना के समय उसके उपराष्ट्रपति भारत यात्रा पर ही थे। आतंकवादियों की निंदा  तो वॉशिंगटन ने की किंतु पाकिस्तान को कसूरवार मानने से पीछे हट गया। और जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया तब अमेरिका की ओर से आये बयानों से लगा कि पाकिस्तान की पिटाई से वह परेशान हो उठा। युद्धविराम का झूठा श्रेय लूटने के अलावा कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश कर ट्रम्प भारत के पुराने घाव कुरेदने की शरारत की। लड़ाई रुकने के बाद ये खबर भी तेजी से उड़ी कि भारतीय मिसाइलों ने पाकिस्तान के जिन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया उनमें से एक परमाणु संयंत्र का हिस्सा था। और उसमें रखी आण्विक सामग्री का संबंध अमेरिका से था।स्मरणीय है युद्धविराम करवाने के लिए अपने हाथों अपनी पीठ ठोकने वाले ट्रम्प ने ये भी कहा था कि  ऑपरेशन सिंदूर जारी रहता तो नौबत परमाणु अस्त्रों के उपयोग तक चली जाती। वहाँ तक तो फिर भी बात ठीक थी किंतु लड़ाई रुकने के बाद पाकिस्तान को अपना दोस्त बताना , उसे अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज दिलवाना और फिर उसके सेना प्रमुख को ट्रम्प द्वारा व्हाइट हाउस में भोज पर बुलाने जैसे कदमों से ये साफ है कि कभी श्री मोदी को अपना दोस्त बताने वाले ट्रम्प ने जबरदस्त पलटी मारी है। लेकिन धीरे - धीरे अब पूरा खेल उजागर होने लगा है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे  युद्ध के दौरान भारत की तटस्थता  अमेरिका को नागवार गुजरी थी। रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को नजरंदाज करते हुए भारत ने उससे कच्चा तेल और अस्त्र - शस्त्र खरीदना जारी रखा। फ्रांस से किये गए लड़ाकू विमान सौदे ने भी अमेरिका को नाराज किया। लेकिन ट्रम्प ने बीते कुछ हफ़्तों में जो हल्कापन दिखाया उसके पीछे इजराइल और ईरान के बीच युद्ध ही है। ये तो सभी जानते हैं कि इजराइल ने जो हमला किया उसकी पूरी योजना अमेरिका द्वारा बनाई गई है। इजराइल के घनिष्ट रिश्तों के बाद भी भारत ने अभी तक उसकी  सैन्य कारवाई का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा भारत अपनी धरती का उपयोग करने की अनुमति अमेरिका को नहीं देगा। ट्रम्प ने यही देखते हुए पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखते हुए भारत की उपेक्षा करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की बजाय सेना प्रमुख को साथ बिठाकर भोजन करवाने का उद्देश्य ईरान के विरुद्ध सैन्य कारवाई के लिए पाकिस्तान के हवाई अड्डों के उपयोग की छूट हासिल करना था।  पाकिस्तान का दोगलापन ऐसे मामलों में जगजाहिर है। अफ़ग़ानिस्तान में जब तालिबानी, लड़ाके अमेरिकी कब्जे के विरुद्ध लड़ रहे थे तब पाकिस्तान ने उन्हें अपने यहाँ अड्डे बनाने की अनुमति दे दी। वहीं दूसरी तरफ तालिबानी सैन्य दस्तों पर हवाई हमले करने वाले अमेरिकी विमान भी पाकिस्तानी हवाई अड्डों से उड़ान भरते थे। ट्रम्प ईरान पर हमले के लिए भी यही तरीका अपना रहे हैं। वे इसमें कितने सफल होंगे ये तो पता नहीं किंतु  आतंकवादियों को पालने वाले  देश को गोद में बिठाकर ट्रम्प ने गले में सांप  लटकाने वाली गलती कर दी है। वे भूल गए कि 9/ 11  के दोषी ओसामा बिन लादेन को शरण देने वाला कोई और नहीं पाकिस्तान ही था। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment