Saturday, 21 June 2025

भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में योग का उल्लेखनीय योगदान

 वर्ष पूर्व  सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर आध्यात्म आधारित  भारतीय जीवन शैली को प्रचारित करने के लिए सं. रा. संघ से योग को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता दिलवाने का  प्रयास शुरू किया । आखिरकार 2015 में  विश्व संस्था ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। शुरुआत में देश के भीतर ही इसका मजाक उड़ाया गया। चूंकि योग गुरु बाबा रामदेव के पिछली सत्ता से अच्छे रिश्ते नहीं थे इसलिए धर्मिनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े बैठे तबके को योग का विश्व भर में प्रतिष्ठित होना नागवार गुजरा क्योंकि इससे भारतीय संस्कृति  वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित होने लगी। प्रारंभ में ये लगा भी कि अन्य अंतर्राष्ट्रीय दिवसों की तरह योग दिवस भी बधाईयों के आदान - प्रदान जैसी रस्म अदायगी में फंसकर रह जाएगा किंतु एक - दो वर्ष के भीतर ही दुनिया के बड़े हिस्से में उसके प्रति रुचि और जागरूकता देखने मिलने लगी। अब तो सैकड़ों  ऐसे देशों में योग को एक आदर्श व्यायाम पद्धति के रूप में स्वीकार किया जा चुका है जिनका भारतीय संस्कृति से दूरदराज का संबंध नहीं है। भारत में योग को सनातन धर्म  से जोड़कर विरोध करने वाले मज़हबी वर्ग के लिए भी ये किसी धक्के से कम नहीं था कि अनेक मुस्लिम और ईसाई बाहुल्य देशों तक में  योगाभ्यास दैनिक जीवनचर्या  से जुड़ गया। भारतीय ज्ञान परंपरा को विज्ञान की कसौटी पर अंधविश्वास  बताने वाले विकसित  देशों ने भी योग और उसके जरिये की जाने वाली ध्यान साधना की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हुए उसे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक शांति हासिल करने का सशक्त साधन माना। बीते दशक  में भारत की जो उज्ज्वल  छवि विश्व में निर्मित हुई उसमें योग का योगदान भी उल्लेखनीय है। प्रधानमंत्री श्री मोदी अक्सर भारत के विश्वगुरु बनने का विश्वास व्यक्त करते हैं। लेकिन  उनके आलोचक उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते । यदि गंभीरता से सोचें तो आर्थिक या सैन्य महाशक्ति बनने से अलग हटकर भारत का जो वास्तविक सम्मान है वह उसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पूंजी के कारण ही है। महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने जब 21 वीं सदी भारत की होने की जो भविष्यवाणी की थी तब उनके मन में आर्थिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में हासिल होने वाली उपलब्धियां न होकर  सनातन संस्कृति के वैश्विक प्रसार की कल्पना ही थी। हालांकि विभिन्न आध्यात्मिक विभूतियों ने भी  विदेशों में धर्म और आध्यात्म का प्रचार करते हुए भारत के प्रति श्रद्धा का भाव उत्पन्न करने का सराहनीय कार्य किया किन्तु योग के विश्वव्यापी होने से वैश्विक परिदृश्य पर भारत की छवि ऐसे देश के तौर पर बन गई जिसका प्राचीन ज्ञान आज भी मानव तन और मन की बेहतरी  में चमत्कारिक योगदान देता है। योग के फायदों का प्रायोगिक परीक्षण पूरी दुनिया में लंबे समय से होता आया है। उनके जो निष्कर्ष निकले उन्हीं के आधार पर उसकी उपयोगिता को स्वीकार्यता मिली। सं .रा.संघ ने भी पूरे अध्ययन के उपरांत ही 21 जून को विश्व योग दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बाबा रामदेव ने राष्ट्रीय स्तर पर उसे  घर - घर में लोकप्रिय बनाने का कार्य किया। साथ ही  विदेशों में भी  इसके प्रति आकर्षण पैदा किया। अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के अनेक प्रसिद्ध चिकित्सक भी दवाओं के साथ योग और ध्यान की सलाह देने लगे हैं। उस दृष्टि से आज का दिन समूचे देश के लिए गौरव की अनुभूति का अवसर है। जो लोग पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति की तुलना में भारतीय ज्ञान और उससे संबद्ध जीवनशैली को पिछड़ेपन की निशानी मानकर उसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें विश्व स्तर पर योग की बढ़ती स्वीकार्यता  को देखकर नये सिरे से अपनी राय बनानी चाहिए। प्रधानमंत्री के रूप में श्री मोदी की नीतियों से असहमति रखना लोकतंत्र में सामान्य बात है किन्तु उन्होंने योग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने में जो सफलता प्राप्त की उसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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