Monday, 16 June 2025

पचमढ़ी में दी गई सीख हवा- हवाई होकर न रह जाए


भाजपा का पचमढ़ी प्रशिक्षण वर्ग संपन्न हो गया। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उपस्थित जनप्रतिनिधियों को साफ - साफ समझा दिया कि वे अपनी सफलता पर आत्ममुग्ध न हों क्योँकि ये सब पार्टी की लोकप्रियता का प्रतिफल है और इसके पीछे जनसंघ से लेकर आज तक कई पीढ़ियों की तपस्या है।   उपस्थित सांसद - विधायकों और मंत्रियों को सोच - समझकर बयानबाजी करने, सोशल मीडिया का उपयोग करते समय सावधानी बरतने और सार्वजनिक आचरण का उच्च स्तर बनाये रखने की सीख श्री शाह के अलावा सत्ता और संगठन से जुड़े अन्य नेताओं द्वारा दी गई। पार्टी और सरकार के फैसलों के बारे में बोलते समय संयम और  समझदारी का परिचय देने की नसीहत भी इस आयोजन का हिस्सा थी। वैसे तो भाजपा में समय - समय पर रास्वसंघ की तर्ज पर इस तरह के आयोजन होते रहते हैं किंतु ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रदेश सरकार के दो  वरिष्ट मंत्रियों के बयानों से उत्पन्न विवाद ने पूरे देश में पार्टी को शर्मिंदा होने मजबूर कर दिया। विजय शाह नामक मंत्री के विरुद्ध तो उच्च न्यायालय ने  स्वतः संज्ञान लेकर  आपराधिक प्रकरण दर्ज करने का आदेश दिया।  दूसरा मामला उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के बयान से संबद्ध है। अपने नेताओं खासकर जनप्रतिनिधियों को सार्वजनिक बयानों के साथ ही सोशल मीडिया पर टिप्पणियों में संयम और सावधानी बरतने का सबक सिखाने उक्त वर्ग रखा गया। सत्ता में लंबे समय से रहने के कारण भाजपा में भी अनेक ऐसी बुराइयाँ दिखने लगी हैं जिनके लिए वह कांग्रेस को कोसा करती थी। श्री शाह ने इसीलिए जनप्रतिनिधियों को  चेतावनी दे डाली कि चुनाव जीत जाने के बाद आसमान पर उड़ने की बजाय अपने पाँव जमीन पर टिकाए रखें। विवादित बयानों के बारे में उन्होंने दो टूक कह दिया कि गलती एक बार ही बर्दाश्त की जाएगी, दोबारा नहीं।  शिविर में उपस्थित जनप्रतिनिधियों पर उक्त  उपदेशों का कितना असर हुआ ये तो कह पाना मुश्किल है किंतु पार्टी नेतृत्व की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने इस बात को महसूस किया कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों के साथ ही मंत्री जैसे जिम्मेदार पदों पर विराजमान अनेक  नेताओं के बयानों में गंभीरता और शालीनता का अभाव होता है । सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर सक्रिय रहते हुए उनका समुचित उपयोग करने की अपेक्षा तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करते हैं किंतु इन पर की जाने वाली टिप्पणियों में  छोटी सी चूक भी बड़ा नुकसान कर बैठती है। दरअसल सत्ता में आने के बाद भाजपा में ऐसे लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही है जिन्हें उसके इतिहास, मौलिक सिद्धांत और नीतियों में रत्ती भर रुचि नहीं है। उनका मकसद येन - केन - प्रकारेण सत्ता का दोहन करना है। लेकिन कुछ पुराने नेता भी ऐसे  हैं जो सत्ता के मद में अपनी वाणी पर नियंत्रण नहीं रख पाते। केन्द्र और राज्य सरकारों के जनहितैषी  कार्यों की जानकारी जनता तक पहुंचाने के स्थान पर वे अपनी दुकान सजाने में जुटे देखे जा सकते हैं। इसी तरह  लगातार चुनाव जीतने वाले कतिपय नेताओं को ये घमंड हो चला है कि उनकी जीत  निजी लोकप्रियता के कारण होती है। ऐसे नेता ही पार्टी पर हावी होने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं। मंत्रीपद और टिकिट से वंचित किये जाते ही इनके बगावती तेवर इस बात का प्रमाण होते हैं कि पार्टी के प्रति इनकी निष्ठा दिखावटी है। श्री शाह ने  स्पष्ट शब्दों में  ऐसे ही जनप्रतिनिधियों को ये समझाइश दी कि वे अपनी सीमाओं के भीतर ही रहें और खुद को पार्टी से बड़ा समझने की जुर्रत न करें। भाजपा संगठन आधारित पार्टी है जिसकी पहिचान अलग हटकर है। लालकृष्ण आडवाणी ने इसीलिए इसे पार्टी विथ डिफरेंस कहा था। यद्यपि सत्ता में आने के लिए पार्टी ने कई बेमेल गठबंध किये  और ऐसे लोगों को पार्टी में शामिल कर महत्वपूर्ण पदों से भी उपकृत किया जिनको वह दागी ठहराया करती थी। बावजूद उसकी मूलभूत नीतियों के कारण वह लोकप्रिय बनी हुई है। लेकिन ऐसा ही एक जमाने में कांग्रेस के साथ था । आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने की पुण्याई जुड़ी होने से उसकी बड़ी - से बड़ी गलतियां जनता नजरंदाज करती रही किंतु एक सीमा के बाद जनता का धैर्य भी जाता रहा। प. बंगाल का वामपंथी किला अभेद्य समझा जाता था किंतु समय आने पर वह भी धराशायी हो गया। ऐसे में यदि भाजपा समय रहते अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सत्ता की अंतर्निहित बुराइयों से बचाये रखने प्रयासरत है तो ये सकारात्मक कदम है। लेकिन पचमढ़ी वर्ग के बाद भी उसे ये देखते रहना होगा कि पचमढ़ी में मिली सीख हवा - हवाई होकर न रह जाएं। पचमढ़ी में मिली सीख हवा - हवाई होकर न रह जाएं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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