बीते वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो आंकड़े आये वे उत्साहित करने वाले हैं। विदेशी निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है। एक अच्छी खबर ये भी है कि कोरोना काल के बाद से आम जनता की जो घरेलू बजट लगभग खत्म हो गई थी वह फिर पुरानी रफ्तार पर लौट रही है। बैंकों और बड़े औद्योगिक समूह नगदी की कमी से उबरने लगे हैं। शेयर बाजार में मध्यमवर्गीय नये निवेशक तेजी से बढ़ रहे हैं। सरकारी बैंकों का लाभ निजी बैंकों से ज्यादा होना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वार्षिक विकास दर 6.5 प्रतिशत रहना अर्थव्यवस्था के सही दिशा में बढ़ने का प्रमाण है। निर्यात के मोर्चे पर भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से व्यापार असंतुलन में निरंतर कमी हो रही है। ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय रक्षा उपकरणों की धाक पूरी दुनिया में जमा दी जिसका परिणाम बड़ी संख्या में विदेशी ऑर्डर मिलना है। इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए निजी क्षेत्र को भी रक्षा उपकरण बनाने की अनुमति दी गई जो दूरदर्शी कदम है। हाल ही में रिजर्व बैंक ने बीते वित्तीय वर्ष के लाभांश के रूप में केन्द्र सरकार को रिकार्ड 2.69 लाख करोड़ बतौर लाभांश दिया जो गत वर्ष से 27 फीसदी अधिक है। इस राशि से केन्द्र सरकार को अपना बजट घाटा घटाने में मदद तो मिली ही ऑपरेशन सिंदूर के कारण आये आर्थिक बोझ से निपटने में भी सुविधा हुई। जीएसटी का संग्रह हर माह पिछले वर्ष का कीर्तिमान ध्वस्त करता जा रहा है। ऑटोमोबाइल और रियल सेक्टर जैसे क्षेत्र निरंतर अच्छे परिणाम दे रहे हैं। उत्पादन के आंकड़े भी संतोषजनक स्तर पर आ गए हैं। सबसे बड़ी बात उपभोक्ताओं में नजर आ रहा उत्साह है जिससे मांग बनी हुई है। पर्यटन और सेवा जैसे व्यवसाय उम्मीद के मुताबिक तेज गति से बढ़ रहे हैं। इन सबका परिणाम ही है कि भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सक्षम हो सका। यद्यपि अभी भी पड़ोसी चीन हमसे काफी आगे है किंतु अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार भारत पर टैरिफ थोपने और एप्पल जैसी कंपनी को अपने मोबाइल फोन का उत्पादन भारत में न करने के लिए धमका रहे हैं उससे लग जाता है कि विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति तक हमारे बढ़ते कदमों से परेशान हो उठी है। हाल ही में भारत ने पाकिस्तान पर जो सफल सैन्य कार्रवाई की वह आतंकवाद के विरुद्ध हमारी मारक क्षमता का बड़ा उदाहरण है। वैश्विक मंचों पर भारत के प्रति सम्मान और आकर्षण दोनों बढ़ा है। दिग्गज बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपनी उत्पादन इकाइयां लगाने आतुर हैं। उससे भी आगे बढ़कर हमारे उद्योगपति दुनिया के अनेक देशों में अपने कारखाने स्थापित कर भारतीय उद्यमशीलता का गौरवगान कर रहे हैं। प्रत्यक्ष करों से हो रही आय उम्मीद से बढ़कर होना ये जताता है कि करदाताओं में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा है। कारपोरेट के अलावा निजी करदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि से ये आकलन करना आसान हुआ है कि लोगों की आय बढ़ रही है और वे देश के विकास में अपना योगदान देने तत्पर हैं। ये सभी संकेत भारत के उज्ज्वल भविष्य का परिचायक हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जो आम जनता के लिहाज से अखरने वाली हैं। मसलन यदि अर्थव्यवस्था सुखद स्थिति में है तब उसका लाभ उसी अनुपात में जनता को भी मिलना चाहिए। यद्यपि मोदी सरकार ने बीते 11 वर्ष के कार्यकाल में अधो संरचना और सामाजिक कल्याण जैसी योजनाओं पर काफी खर्च किया। उच्चस्तरीय राजमार्ग, फ्लाईओवर, हवाई अड्डे, आदि के साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, शौचालय के अलावा आयुष्मान भारत जैसे प्रकल्पों ने देश में विकास और जनकल्याण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर दिया। आज की स्थिति में ये कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगा है। राजमार्गों से गुजरते हुए भारत में आये बदलाव का सुखद अनुभव हो जाता है। इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि जीएसटी की दरों में कमी की जाए। जाहिर है प्रारंभिक दौर में सरकार को मिलने वाले राजस्व में गिरावट आयेगी किंतु लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से वह घाटा तो पूरा होगा ही, कर की चोरी भी रुकेगी। इसके साथ ही जीएसटी के विभिन्न स्तरों को घटाकर दो रखे जाएं तो व्यापार करना आसान होगा। जिस तरह इस वर्ष आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख रु. किये जाने से देश के विशाल मध्यम वर्ग को जबरदस्त राहत मिली तो उसका असर बाजार में उठाव के तौर पर देखने मिला ठीक वैसे ही यदि जीएसटी में भी ऐसा ही क्रांतिकारी बदलाव किया जावे तो वह आम जनता के साथ ही उद्योग - व्यापार जगत के लिए भी उत्साहवर्धक रहेगा । आर्थिक सुधारों के लिहाज से ये बड़ा कदम होगा क्योंकि इससे भारत में आने वाली विदेशी कंपनियां भी आकर्षित होंगी। अपेक्षा की जा सकती है कि आगामी वित्तीय वर्ष के बजट में आयकर जैसी राहत जीएसटी में भी दी जाएगी। जीएसटी को जिस तरह लोगों ने अपनाया और सरकार का खजाना भरा उसके बाद अब सरकार को भी चाहिए वह उदारता दिखाये।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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