रान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खोमेनेई द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा आत्मसमर्पण की सलाह के सामने झुकने के बजाय युद्ध जारी रखने की घोषणा करने के बाद इजराइल पर और भी शक्तिशाली मिसाइलें दाग दीं। साथ ही अमेरिका को ये चेतावनी भी दे डाली कि यदि वह इस लड़ाई में कूदा तो उसे इसका अंजाम भोगना पड़ेगा। खोमेनेई ने ये धमकी ट्रम्प के उस बयान के बाद दी कि ईरान को बिना शर्त आत्मसमर्पण करना होगा। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें पता है कि खोमेनेई कहां छिपा हुआ है किंतु अमेरिका उन्हें मारने का पक्षधर नहीं है जबकि इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ईरान के धार्मिक नेता को मारने की ज़िद पर कायम हैं और उसी के बाद युद्ध रोकने की बात बोल रहे हैं। हालांकि इजराइली हमलों ने ईरान में जबदस्त तबाही मचा दी है । सैकड़ों लोगों को मौत का शिकार भी होना पड़ा। परमाणु संयंत्रों के अलावा तेल शोधन इकाइयों और तेल भंडारों पर हुई बम वर्षा के द्वारा ईराक के हौसले पस्त करने का प्रयास इजराइल की तरफ से लगातार जारी है। पलटवार तो ईरान भी कर रहा है किंतु उसमें रणनीति कम और खीझ ज्यादा लग रही है। ऐसा लगता है खामेनेई का ठिकाना मालूम होने के बाद भी उनको जान से मारने से परहेज जताकर ट्रम्प ने ईरान को फुसलाने का दांव चला किंतु खामेनेई ने साफ शब्दों में उसे ठुकराकर अमेरिकी राष्ट्रपति को ठेंगा दिखा दिया। ये मामला जिस तरह उलझता जा रहा है उससे लगता है कि अब इजराइल से ज्यादा ये अमेरिका विशेष रूप से ट्रम्प की नाक का सवाल बन गया है। हालांकि बीते छह महीनों में उन्होंने अपने अस्थिर स्वभाव के चलते जिस गैर जिम्मेदाराना रवैये का परिचय पूरे विश्व को दिया उसके कारण अमेरिका के राष्ट्रपति पद का रुतबा कम हुआ है। संकट में फंसे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की तक ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प के दुर्व्यव्हार से तंग आकर उनसे उसी तरह ऊँची आवाज में बात करने का साहस दिखाया था। जेलेंस्की मूलतः हास्य कलाकार हैं । हालांकि रूस जैसी महाशक्ति से भिड़ने के उनके फैसले को बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं माना जाता किंतु अब वे हास्य कलाकार की छवि से उबर चुके हैं जबकि डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतों से उनकी छवि जोकरों जैसी बन गई है। यही वजह है कि वे कब क्या बोलते हैं ये अंदाज लगा पाना कठिन है। ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका खुलकर इजराइल के साथ है। लेकिन ट्रम्प के बयानों से उनके देश की नीति स्पष्ट नहीं हो पाती। एक दिन वे दोनों में युद्धविराम करवाने के लिए सक्रिय दिखते हैं किंतु अगले दिन तेहरान खाली करने और ईरान के आण्विक कार्यक्रम को किसी भी कीमत पर रोकने की धमकी देते हैं। नेतन्याहू जहाँ ईरानी सुप्रीमो की जान लेने आमादा हैं वहीं ट्रम्प इसके खिलाफ हैं। बेहतर हो जिस तरह रूस और चीन दूर बैठकर भी ईरान की सहायता कर रहे हैं ठीक वैसे ही अमेरिका को इजराइल का साथ देना चाहिये जो उसकी स्थायी नीति है। लेकिन यदि ईरान की आण्विक शक्ति बनने से रोकना उसकी प्राथमिकता है तब अमेरिका खुद क्यों नहीं लड़ाई में कूद पड़ता? ईरान के निकटवर्ती समुद्र में उसने अपने युद्धपोत की तैनाती भी इसी उद्देश्य से की है। इजराइल के हमलों ने ईरान के अनेक परमाणु संयंत्रों को नेस्तनाबूत कर दिया है। तेहरान खाली करने की चेतावनी नेतन्याहू भी देते आ रहे हैं जिसका असर भी दिखाई दे रहा है। यद्यपि इजराइल द्वारा की जा रही बमवर्षा ने राजधानी के बड़े इलाके को खण्डहर में तब्दील कर दिया है किंतु जिस तरह खामेनेई भी मुकाबले के लिए तैयार हैं उसे देखते हुए ये कहना ही पड़ेगा कि अभी ईरान ने हिम्मत नहीं हारी वरना खामेनेई ने ट्रम्प की चेतावनी को इतने हल्के में न लिया होता। ऐसा लगता है रूस और चीन की तरफ से गोपनीय रूप से सैन्य सहायता या आपातकालीन स्थिति में कूटनीतिक सहयोग का आश्वासन खामेनेई को मिला है। सच्चाई जो भी हो लेकिन इजराइल और ईरान के अलावा बड़ी शक्तियाँ यदि इस विवाद में शामिल हुईं तो फिर ये जंग यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे अंतहीन युद्ध का रूप ले लेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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