सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने लंदन के सुप्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड वि.वि में व्याख्यान देते हुए जिन मुद्दों को छुआ उन पर भारत के न्यायिक क्षेत्र में लंबे समय से बहस चली आ रही है। उन्होंने भारत के संविधान को स्याही में रचा गया शांत क्रांति का दस्तावेज़ बताते हुए कहा कि यह सिर्फ अधिकार नहीं देता, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को सशक्त भी करता है। जिसके उदाहरणस्वरूप आज देश की राष्ट्रपति साधारण परिस्थिति से आईं अनु. जनजाति की महिला है वहीं न्यायपालिका की सर्वोच्च आसंदी पर एक दलित विद्यमान है। लेकिन उनके भाषण की जो सबसे उल्लेखनीय बात ये रही कि न्यायिक सक्रियता एक स्थायी वास्तविकता है, लेकिन इसे न्यायिक आतंकवाद में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने ये भी कहा कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर और केवल तभी किया जाना चाहिए, जब कोई कानून संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता हो। श्री गवई के अनुसार न्यायिक सक्रियता हमेशा बनी रहेगी। लेकिन वह न्यायिक आतंकवाद में न बदल जाए, इसका ध्यान रखना चाहिए,क्योंकि कभी-कभी न्यायपालिका अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर और उन क्षेत्रों में दखल देने लगती है, जहां उसे सामान्यतः नहीं जाना चाहिए। ध्यान रहे भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। सविधान निर्माताओं ने लंबे विचार - विमर्श के बाद कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार और सीमाएं तय कर दी थीं। विधायिका के पास कानून बनाने का दायित्व है। लेकिन न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा का अधिकार देकर ये शक्ति प्रदान की गई कि वह विधायिका और कार्यपालिका के ऐसे किसी भी फैसले की समीक्षा कर ये देखे कि कहीं वह संविधान के मौलिक स्वरूप के विरुद्ध तो नहीं है। नियंत्रण और संतुलन की यह व्यवस्था तीनों अंगों में से किसी को भी स्वेच्छाचारी होने से रोकने के लिये बनाई गई है। ये अच्छी बात है कि हमारे देश में न्यायपालिका के प्रति विधायिका और कार्यपालिका दोनों ही सम्मान का भाव रखते हैं। न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी जो न्यायिक नियुक्ति आयोग संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से बनाया उसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द करते हुए संसद को भी झटका दे दिया। उस विषय पर सरकार और न्यायपालिका के बीच जुबानी जंग चलती रहती है किंतु दोबारा उस आयोग को स्थापित करने का प्रयास नहीं हुआ। हालांकि अपने पूर्ववर्ती मुख्य न्यायाधीशों की तरह श्री गवई भी न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु वर्तमान कालेजियम व्यवस्था के पक्षधर होंगे किंतु ब्रिटेन में उनके द्वारा न्यायिक सक्रियता के न्यायिक आतंकवाद में बदलने से बचने के बारे में जो कहा गया उसके पीछे भारतीय न्यायपालिका में नजर आ रही अंतिरंजित न्यायिक सक्रियता ही है। अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें वह तेज गति से चलती है जबकि आम तौर पर वह सुस्त कार्यशैली के कारण आलोचना का पात्र बनती है और उसकी सक्रियता चौंकाती है । ताजा उदाहरण वक़्फ़ संशोधन का है जिस पर पेश की गई याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल सुनवाई शुरू कर दी किंतु उसके पहले जब वक़्फ़ संबंधी कोई प्रकरण उसके समक्ष लाया गया तब उस पर ऐसी तत्परता नहीं दिखाई गई। किसी आतंकवादी और बलात्कारी की फांसी रुकवाने आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खोल दिये जाना न्यायपालिका की छवि पर सवाल खड़े करने के लिए पर्याप्त है। इस तरह के दर्जनों दृष्टांत हैं जहाँ न्यायपालिका ने अपनी सीमा लांघने का दुस्साहस किया। हालांकि आलोचना को उसकी स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जाता है किंतु जब खुद मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक सक्रियता को न्यायिक आतंकवाद में बदलने से रोकने की समझाइश दे डाली तब न्यायपालिका को आगे आकर अपनी भूमिका निर्धारित करनी चाहिए। श्री गवई ने जो कुछ भी कहा वह न्याय के क्षेत्र में उनके सुदीर्घ अनुभव का निचोड़ कहा जा सकता है। उनका कार्यकाल बेहद सीमित है। यदि इस दौरान यदि न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों और श्रेष्ठता के अहंकार को दूर करने में सफल हो सके तो वे अविस्मरणीय हो जाएंगे और न्यायपालिका का सम्मान भी बढ़ेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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