Thursday, 5 June 2025

निजी कंपनी की टीम का विधानसभा में स्वागत समझ से परे



इंग्लैंड के काउंटी क्रिकेट की तर्ज पर भारत के  कंट्रोल बोर्ड (बी.सी.सी.आई) द्वारा वर्ष 2008 में आई. पी. एल नामक लीग क्रिकेट प्रतियोगिता प्रारम्भ की गई। इसमें प्रायोजकों द्वारा खिलाड़ियों को ऊंची बोली लगाकर अपनी टीम में शामिल किया जाता है। पाकिस्तान के अलावा क्रिकेट खेलने वाले अन्य देशों के खिलाड़ी इस आयोजन का हिस्सा होते हैं। हालांकि आई.पी.एल शुरुआत में काफी विवादित हुई और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में घिरे उसके अध्यक्ष ललित मोदी देश छोड़कर भाग गए। बी.सी.सी.आई  में चूंकि राजनेताओं की दखल शुरू से रही इसलिए ललित  के अलावा  कुछ बड़ी हस्तियों के नाम भी आरोपित हुए किंतु आई. पी. एल को मिली आर्थिक सफलता ने उन सबको दबा दिया। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस प्रतियोगिता ने इंग्लैंड के काउंटी और आस्ट्रेलिया के क्लब क्रिकेट की चमक फीकी कर दी। सबसे बड़ी बात ये है कि आई.पी.एल का समूचा आयोजन जिस भव्य और पेशेवर तरीके से किया जाता है उसने इस तरह के विश्वस्तरीय आयोजन करने में भारत के प्रबंध कौशल से पूरे विश्व को परिचित करवा दिया।  इसके जरिये दर्जनों ऐसे नवोदित खिलाड़ियों की प्रतिभा उजागर हो गई जो अन्यथा उपेक्षित पड़े रहते। लेकिन आर्थिक लाभ और खिलाड़ियों पर होने वाली धनवर्षा से अलग हटकर देखें तो इस प्रतियोगिता की छवि सट्टेबाजी से जुड़ गई है और ये गलत भी नहीं है। जिस तरह से इसके मैचों का प्रचार होता है उससे अमेरिका में होने वाली हैवीवेट मुक्केबाजी प्रतियोगिताओं को लेकर किया जाने वाला प्रोपेगंडा याद आ जाता है। यही वजह है कि आई.पी.एल एक खेल प्रतियोगिता की बजाय विशुद्ध व्यवसायिक आयोजन बन गया जिसका उद्देश्य नये - नये तरीकों से धन बटोरना हो गया है। जनता के लिए यह मनोरंजन का साधन तो है ही किंतु चूंकि टीमों को किसी राज्य या शहर का नाम दे दिया जाता है इसलिए भले ही उनमें देश - विदेश के बाहरी खिलाड़ी शामिल हों,  जीत - हार के साथ स्थानीय भावनाएं भी जुड़ जाती हैं। गत दिवस इस वर्ष की विजेता रॉयल चेलेन्जर्स बेंगलुरु के स्वागत में बेंगलुरू में जमा भीड़  अनियंत्रित हो गई जिसके कारण दर्जन भर लोग कुचलकर जान गँवा बैठे जबकि दर्जनों घायल हैं। विधानसभा के बाहर  विजेता टीम के स्वागत के लिए  एक लाख लोग जमा थे  वहीं मुख्य स्टेडियम में तीन लाख जनता जमा होने से सभी व्यवस्थाएँ चरमरा गईं। इस दर्दनाक घटना के बाद आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। भाजपा कर्नाटक सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है तो कांग्रेस प्रयागराज महाकुम्भ में हुई मौतों को लेकर भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। लेकिन ऐसे हादसों में राजनीति से अलग हटकर ऐसे कदम उठाना चाहिए। जिससे उनकी पुनरावृत्ति रोकी जा सके। धर्मस्थलों पर होने वाले आयोजनों में भीड़ के आधिक्य से प्रतिवर्ष  सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती है। हर बार प्रशासन और शासन पर लापरवाही का आरोप लगता है और व्यवस्थाएं सुधारने का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन होता कुछ भी नहीं है और अगली घटना का इंतजार किया जाता है। बेंगलुरू में गत दिवस जो कुछ हुआ उसके लिए किसको दोष दिया जाए ये बड़ा सवाल है क्योंकि एक निजी कंपनी के स्वामित्व वाली टीम का स्वागत विधानसभा में करने का औचित्य समझ से परे है। यदि कर्नाटक की क्रिकेट टीम रंजी ट्राफी जीत लेती तब तो विधानसभा में उसका अभिनंदन उचित भी होता किंतु सिर्फ बेंगलुरू नाम होने से भावनाओं का ज्वार उठना समझदारी नहीं है। हो सकता है टीम के मालिक ने अपने भावी व्यवसायिक हितों के लिए इतनी भीड़ जमा की हो। लेकिन जनता को भी ऐसे आयोजनों में जाने के पहले अपनी सुरक्षा  की चिंता करनी चाहिए। इस घटना के लिए एक - दूसरे पर  जिम्मेदारी थोपने का खेल भी दुखद है। आई. पी. एल के आयोजकों  और रॉयल चेलेन्जेर्स का ये दायित्व है कि वे मृतकों के परिजनों को क्षतिपूर्ति एवं घायलों का इलाज करवाएं। घटना के लिए बेंगुलुरु का प्रशासन तो जिम्मेदार है ही किंतु इस  बात का पता लगाना जरूरी है कि ये जमावड़ा किसके दिमाग की उपज थी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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