न - इजराइल युद्ध में अमेरिका की भूमिका अब पूरी तरह सामने आ चुकी है। गत दिवस कैनेडा में चल रही जी- 7 की बैठक छोड़कर अमेरिका लौटते समय की गई राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की वह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण थी कि मसला युद्धविराम से भी बड़ा है। उसके बाद ये बयान भी आ गया कि अमेरिका को पता है कि ईरान का सर्वोच्च धार्मिक नेता खामेनेई कहाँ छिपा है लेकिन वह उसे मारेगा नहीं किंतु उसे बिना शर्त आत्म समर्पण करना होगा। यद्यपि उनके विपरीत इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू , खामेनेई को जान से मारने की जिद पर कायम हैं। अमेरिका द्वारा ईरान के निकट अपने समुद्री बेड़े की तैनाती की गई है ताकि जमीन के काफी नीचे सुरक्षित ईरान के परमाणु संयंत्र को नष्ट करने में सक्षम बेहद शक्तिशाली बमों का उपयोग किया जा सके जिसके लिए विशेष विमानों की जरूरत होती है। सवाल ये है कि जो ट्रम्प दो दिन पहले तक युद्धविराम करवाने के लिए उछलकूद कर रहे थे वे ईरान को बिना शर्त आत्म समर्पण के लिए क्यों धमकाने लगे? सही बात ये है कि इजराइल के कंधों पर बन्दूक रखकर अमेरिका ने ईरान को बर्बाद करने का अपना मंसूबा पूरा कर लिया। कट्टरपंथी इस्लामिक सत्ता चला रहे खामेनेई को जान से नहीं मारने की बात कहने वाले ट्रम्प आत्म समर्पण के बाद उन्हें बख़्श देंगे इसकी क्या गारंटी है? हालांकि जिन तरह खामेनेई और बाकी ईरानी नेता इजराइल और अमेरिका को धमकाया करते थे वह भी औकात से ज्यादा था। ईरान भौगोलिक दृष्टि से बड़ा देश है और उसने अपनी सैन्य शक्ति में भी काफी वृद्धि की है। इस युद्ध में उसने इसका प्रमाण भी दे दिया किंतु उसको ये समझ लेना चाहिए था कि इजराइल को अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और फ्रांस जैसी महाशक्तियों का समर्थन तथा संरक्षण प्राप्त है। इस युद्ध में ईरान विनाश की जिस स्थिति में आ पहुंचा है वहाँ से उबरने में उसे लम्बा समय लगेगा और कहीं खामेनेई ने आत्मसमर्पण कर दिया तब तो उसके और भी बुरे दिन आ जाएंगे क्योंकि इजराइल और अमेरिका उसे फिर पनपने नहीं देंगे। उस दृष्टि से इजराइल और अमेरिका अपने मकसद में काफी कुछ तो सफल हो चुके हैं। गौरतलब है ईरान के साथ खड़े देशों ने इजराइल की निंदा भले ही की किंतु अमेरिका के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं दिखाया। इजराइल के विरुद्ध सैन्य कारवाई की हिम्मत भी किसी की नहीं हुई। ट्रम्प ने जिस प्रकार खामेनेई को धमकाया उसका भी कोई विरोध नहीं हो रहा। नेतन्याहू ने ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या किये बिना युद्ध खत्म नहीं होने जैसी जो टिप्पणी की वह सामान्य नहीं क्योंकि दो देशों के बीच होने वाली लड़ाई में एक - दूसरे के राष्ट्र प्रमुख को मारने की जिद अटपटी है। हालांकि ईराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के प्रति भी अमेरिका का यही रवैया था और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई। ट्रम्प जबसे दोबारा राष्ट्रपति बने उनका आचरण कूटनीतिक शिष्टाचार के एकदम विरुद्ध है। कैनेडा में उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रो के बारे में हल्की टिप्पणी कर डाली। रूस और चीन के राष्ट्रपति क्रमशः व्लादिमिर पुतिन और शी जिनपिंग को लेकर भी वे ऊलजलूल कटाक्ष करते रहे। लेकिन समूचे परिदृश्य को देखने के बाद ये देखकर आश्चर्य और चिन्ता दोनों हैं कि जब मानवता पर तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा मंडरा रहा हो तब सं. रा.संघ क्या कर रहा है ? यदि ट्रम्प ही दुनिया का भाग्य तय करेंगे तब विश्व संगठन किस काम के लिए बनाया गया? स्मरणीय है कि ट्रम्प कई बार सं. रा. संघ और उसके अंतर्गत आने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं को अनुपयोगी बताकर अमेरिकी अंशदान देने के प्रति भी अरुचि दिखा चुके हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी वे असंतुष्ट हैं। इन सबसे लगता है वे पूरी दुनिया को अपनी मर्जी से हांकना चाहते हैं। ये बात सही है कि सं. रा. संघ पर अमेरिका का दबाव और प्रभाव हमेशा रहा है किंतु यूक्रेन - रूस ,इजराइल - हमास, और अब ईरान - इजराइल के बीच लड़ाई के संदर्भ में विश्व संस्था की भूमिका मूकदर्शक जैसी होकर रह गई। पहले दो युद्ध बरसों से जारी हैं। इसी तरह ईरान और इजराइल की ये लड़ाई भी समूचे विश्व को संकट में डालने वाली है। ये देखते हुए सं.रा.संघ को साहस के साथ आगे आना चाहिए। दुर्भाग्य से वह वीटो अधिकार संपन्न पांच देशों के शिकंजे में फंसकर रह गया है। ये देखते हुए उसका होना न होना बराबर है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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