इजराइल और ईरान के बीच भले ही युद्धविराम हो गया लेकिन शत्रुता का भाव बरकरार है। दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। युद्धविराम करवाने का श्रेय श्रेय लूटने में वैसे तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आगे - आगे हो रहे हैं लेकिन दूसरी चर्चा ये भी है कि कतर स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर ईरान के सांकेतिक हमलों के बाद कतर के शासक शेख तमीम ने ईरान पर दबाव डाला जिससे वह भी जंग रोकने राजी हो गया। वरना अमेरिका द्वारा उसके परमाणु संयंत्रों पर बड़े विमान गिराए जाने के बाद जो खामेनेई अमेरिका को नतीजा भुगतने की धमकी दे रहे थे वे अचानक ठंडे नहीं पड़ते। इस जंग में जीत हार का आकलन भी अपने - अपने नजरिये से हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान काफी बड़ा देश है जिसके पास अकूत तेल संपदा है। उसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है। उसकी तुलना में इजराइल बहुत छोटा देश है जिसके चारों तरफ मुस्लिम देश हैं किंतु उसने ईरान के सभी प्रमुख सेना प्रमुखों के अलावा दर्जनों परमाणु वैज्ञानिकों को चुन - चुनकर मार दिया। यही नहीं तो ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों को भी काफी नुकसान हुआ। युद्धविराम के दो दिन पहले अमेरिका ने उसके परमाणु संयंत्रों पर जो बमबारी की उसके बाद ये दावा विश्वास योग्य नहीं है कि उनको मामूली क्षति पहुंची और ईरान का परमाणु कार्यक्रम जारी रहेगा । यदि इसमें सच्चाई होती तब खामेनेई भला युद्धविराम के लिए क्यों राजी हुए जबकि पूरी दुनिया में ईरान समर्थक ये ढोल पीट रहे हैं कि इजराइल को हरा दिया गया। सही बात ये है कि इजराइल को जो नुकसान हुआ वह निश्चित रूप से नई बात है क्योंकि उसका रक्षा तंत्र ईरान की सभी मिसाइलों को रोक नहीं सका। इसी कारण उसके एक बंदरगाह और रिहायशी इलाकों में काफी नुकसान हुआ किंतु जहाँ तक मौतों का प्रश्न है ईरान में मरने वालों की संख्या जहाँ एक हजार से ज्यादा है वहीं इजराइल में 100 से भी कम लोगों की जान गई। ये आंकड़ा ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। लड़ाई के दिनों में इजराइली हमलों से भयातुर होकर राजधानी तेहरान से लाखों लोग भागकर देश के भीतरी हिस्सों में चले गए जबकि इजराइल की राजधानी तेल अबीब में लोग हमले का सायरन बजते ही बंकरों में चले जाते और खतरा टलते ही सब सामान्य हो जाता। ईरान अपनी सैन्य क्षमता का कितना भी बखान करता रहे किंतु आखिरी दो दिनों में वह बदहवासी का शिकार हो चला था। युद्धविराम की घोषणा के बाद इजराइल पर दागी गईं मिसाइलें इसका प्रमाण हैं। लेकिन युद्धविराम के बाद ट्रम्प के जो बयान आये उनसे लगता है ईरान ने अपने ऐलानिया दुश्मन अमेरिका के साथ कोई समझौता किया है जिसमें खामेनेई की जान बख्शने का प्रावधान भी है। लेकिन इस जंग की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो ये बात स्पष्ट होती है कि 7 अक्टूबर 2023 को आतंकवादी संगठन हमास ने इजराइल पर राकेट दागकर बर्र के छत्ते को छेड़ने की जो मूर्खता की उसी ने ईरान और इजराइल के बीच युद्ध की नींव रख दी थी। गाजा पट्टी पर हमास का आधिपत्य , अवैध कब्जे जैसा है। इसे ईरान ही पालता - पोसता है। इसके अलावा हिजबुल्ला नामक संगठन भी उसका पालतू है । इनका एकमात्र काम इजराइल को परेशान करना रहा है। लेकिन जब हमास ने पूरे तौर पर हमले का दुस्साहस करते हुए इजराइलियों की हत्या और अपहरण किया तब जवाबी कार्रवाई में इजराइल ने गाजा को कब्रिस्तान में बदल दिया। ईरान इसके लिए पूरे तौर पर जिम्मेदार था। उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर जरूरत से ज्यादा ग़रूर हो गया था जिसके कारण वह अमेरिका को धमकी देने की जुर्रत करने लगा। लेकिन 12 दिनों की लड़ाई के बाद उसकी परमाणु क्षमता किसी काम नहीं आई । उल्टे उसकी सैन्य शक्ति की कमर टूट गई। थोक में सेना के जनरलों और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कितना बड़ा नुकसान है ये जानकार लोग बता सकते हैं। युद्ध के दौरान खामेनेई द्वारा उत्तराधिकारियों का चयन भी उनके डर का प्रमाण था। इस लड़ाई में भले ही विजेता का औपचारिक ऐलान करना कठिन है किंतु अमेरिका ने ईरान की अकड़ निकाल दी वहीं इजराइल ने उसे इतना कमजोर कर दिया कि वह हमास और हिजबुल्ला को की मदद करने के बजाय अपनी बर्बादी से उबरने में जुटेगा जिसका संकेत उसे ट्रम्प ने दिया है। आने वाले दिनों में ये साबित हो जाएगा कि इजराइल को नष्ट करने वाला ईरान अमेरिका के इशारों पर उठक - बैठक करेगा और अपनी जान बख्शने के एवज में खामेनेई अमेरिका की पसन्द के व्यक्ति को सत्ता सौंपने मजबूर होंगे। सच बात बात तो ये है कि ईरान के पड़ोसी मुस्लिम देश भी खामेनेई से नफरत करते हैं क्योंकि उनकी वजह से प. एशिया बारूद के ढेर पर बैठने मजबूर है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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