अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है। अमेरिका के विरोधी भी उसकी उपेक्षा नहीं कर पाते। ये देश चूंकि विज्ञान और तकनीक के मामले में दुनिया का सिरमौर है लिहाजा निर्विवाद रूप से आर्थिक और सामरिक महाशक्ति है। रूस, चीन, जर्मनी , फ्रांस और जापान भी हालांकि काफी विकसित और समृद्ध हैं किंतु अमेरिका की श्रेष्ठता और सर्वोच्चता निर्विवाद है। उसका सफल लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खुलापन पूरी दुनिया को आकृष्ट करता रहा है। साहित्य, संगीत, कला, खेल, फिल्में , शिक्षा जैसे हर क्षेत्र में अमेरिका ने नये - नये कीर्तिमान रचे हैं। अध्यक्षीय प्रणाली की शासन व्यवस्था वाले इस देश में संसद के दो सदन होने के बाद भी राष्ट्रपति काफी शक्तिशाली होता है। और इसीलिए उसे वैश्विक राजनीति में विशेष महत्व प्राप्त है। इस पद पर आये अनेक व्यक्तियों को उनके निजी गुणों और कार्यप्रणाली के लिए महानता की श्रेणी में भी रखा गया किंतु यहाँ के लोकतंत्र की ये खूबसूरती है कि राष्ट्रपति कितना भी लोकप्रिय और सक्षम क्यों न हो किंतु उसे अधिकतम दो कार्यकाल ही मिलते हैं। दूसरे महायुद्ध के कारण उत्पन्न असामान्य परिस्थितियों में जरूर थियोडोर रूजवेल्ट को चार बार राष्ट्रपति बनाया गया किंतु वह अपवाद ही है। वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ संयोग ये है कि वे 2020 तक राष्ट्रपति रहने के बाद दूसरा चुनाव हार गए। तब लगा था कि उनका राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया किंतु 2024 में उन्होंने तमाम संभावनाओं को नकारते हुए चुनाव जीतकर शानदार वापसी की। उनकी जीत में अमेरिका के धनकुबेर इलान मस्क ने सक्रिय भूमिका निभाई जिसमें असामान्य कुछ भी नहीं था क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र में पूंजीवादी व्यवस्था को संरक्षण प्राप्त है। ख़ुद ट्रम्प भी एक बड़े व्यवसायी हैं। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में भी जार्ज सोरोस नामक धनकुबेर उनके दाहिने हाथ के तौर पर बने रहे। ट्रम्प ने भी राष्ट्रपति बनते ही मस्क, को अपने उपराष्ट्रपति से ज्यादा महत्व और शक्तियाँ दे डालीं जिससे पूरी दुनिया को ये एहसास हो चला कि व्हाइट हाउस में मस्क की समानांतर सत्ता चलेगी । सुनीता विलियम को अंतरिक्ष से सुरक्षित वापस लाने में नासा जैसी प्रसिद्ध एजेंसी की बजाय मस्क की अंतरिक्ष कंपनी स्पेस एक्स की सेवाएं लिए जाने के बाद नासा के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे। मस्क ने सरकारी खर्च घटाने के लिए बड़े पैमाने पर छंटनी करवा दी। उधर टैरिफ बढ़ाने की ट्रम्प की सनक ने देश में महंगाई बढ़ा दी। जिससे आम जनता में नाराजगी व्याप्त है। उनके फैसलों और गैर जिम्मेदार बयानों ने अमेरिका की विश्वसनीयता भी संदिग्ध बना दी। युक्रेन और यूरोप संबंधी निर्णयों ने अमेरिका की साख को भी नुकसान पहुंचाया। परिणाम ये हुआ कि ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटे ट्रम्प बजाय दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्राध्यक्ष बनने के पहले तो विवादास्पद हुए और उनकी छवि एक गैर गंभीर नेता या मसखरे जैसी स्थापित होती गई। कार्यभार संभालने के कुछ महीने के भीतर ही उनकी ऊल- जलूल हरकतों से अमेरिका की साख और धाक दोनों को नुकसान हुआ। अपने बयानों और फैसलों को वे जिस तेजी से बदलते हैं उसकी वजह से पूरी दुनिया उन पर हंस रही है। हॉलीवुड की फिल्मों में काऊ बॉय की छवि रखने वाले रोनाल्ड रीगन जब राष्ट्रपति बने थे तब पूरे विश्व में उनकी सफलता को लेकर शंका व्यक्त की गई किंतु उनके कार्यकाल में सोवियत संघ का ऐतिहासिक विखंडन हुआ । उसके बाद के तीन दशकों में अमेरिका दुनिया का अघोषित चौधरी बना रहा। विश्व व्यापार संगठन के जरिये पूरी दुनिया को मुक्त अर्थव्यवस्था और बाजार में बदलना भी तभी संभव हो सका। यहाँ तक कि चीन भी माओ युग के लौह आवरण से निकलकर पूंजी के प्रवाह में बहने लगा। ट्रम्प का पहला कार्यकाल कुछ खास नहीं रहा। लेकिन इस बार उन्होंने जिस दबंगी से चुनाव लड़ा और अमेरिकी मतदाताओं को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाये उससे लगा था कि वे इस बार कुछ बेहतर करेंगे किंतु ज्यादा तेज चलाने के फेर में उनकी गाड़ी संतुलन खोती दिख रही है। इसका प्रमाण उनके दाहिने हाथ बने मस्क ने साथ छोड़कर उन पर महाभियोग चलाकर उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस को राष्ट्रपति बनाने जैसी मांग कर दी। उधर जो ट्रम्प कुछ दिन पहले तक मस्क की तारीफ के पुल बांधते थे वे उन्हें धोखेबाज कहते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं। मस्क का ये कहना कि ट्रम्प उनके बिना चुनाव नहीं जीत सकते थे काफी महत्वपूर्ण है। ऐसा लगता है उन दोनों के बीच कोई सौदेबाजी हुई थी जिसके पूरे न होने पर रिश्तों में आई खटास अब कड़वाहट में बदल गई। हालांकि ये अमेरिका का आंतरिक मामला है लेकिन मस्क जैसे नजदीकी का साथ छोड़कर विरोध में खड़े हो जाने से ट्रम्प कमजोर हुए हैं। उधर उनके फैसलों का न्यायालयों में भी विरोध हो रहा है। ये सब देखते हुए ट्रम्प अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे इसमें संदेह है और इसका असर दुनिया भर में होगा। अमेरिका के इतिहास में सबसे कमजोर और गैर जिम्मेदार राष्ट्रपति के रूप में उनका नाम दर्ज हो तो आश्चर्य नहीं होगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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