आज 1 जुलाई है ।
बचपन में गर्मियों की छुट्टियां ननिहाल में बिताने के बाद जबलपुर लौटने पर ये तारीख मानों पैरोल खत्म होने का एहसास करवाती थी।
शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए जरूरी है।लेकिन पारिवारिक रिश्तों की अहमियत सीखना भी बच्चों के लिए उतना ही जरूरी है ।
दादा -दादी , चाचा -ताऊ , चाची-ताई , बुआ फूफा , नाना -नानी , मामा - मामी , मौसा - मौसी भाई-बहिन के अलावा भी गांव -मोहल्ले के मुंह बोले रिश्ते जीवनपर्यंत निभाने के संस्कारों को पुनर्जीवित करना नितांत आवश्यक है जिससे हमारे नौनिहालों को इंडिया छोड़ भारत में अनुराग हो।
उन्हें समोसे , मंगोड़े , पकोड़े , कचौड़ी , सेव ,चूड़ा , गोलगप्पे और रबड़ी मलाई की कुल्फी भी खिलाते रहें ताकि वे पिज़्ज़ा और बर्गर और कोल्ड ड्रिंक के ही न होकर रह जाएं।
उनके बचपन को समय से पहले विदा होने से बचाइए वरना मौजूदा दौर में जो सामाजिक विकृतियां पैदा हो रही हैं उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा ।
आप जिस धर्म या पंथ के हों उसकी प्रार्थना में बच्चों को अवश्य साथ रखें जिससे उन्हें अपनी बुनियाद याद रहे ।
संस्कृति के इस संक्रान्तिकाल में बाल्य और किशोरावस्था के बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि शाला कितनी भी अच्छी और महंगी हो , लेकिन संस्कारों की जो शिक्षा परिवार में मिलना सम्भव है वह और कहीं नहीं ।
हो सके तो बच्चों के साथ खेलिये वरना वे एकाकीपन का शिकार होकर मोबाइल और टीवी में दोस्त तलाशने लग जाएंगे जो बाद में आपको नागवार गुजरेगा ।
ध्यान रहे माता - पिता ही बच्चे के सबसे अच्छे शिक्षक और साथी होते हैं ।
बच्चों की हर जिद पूरी करने की बजाय उन्हें समझाएँ कि वैसा करना क्यों सम्भव नहीं , वरना वे उसके आदी हो जाएंगे।
आज जब आधी सदी पीछे की स्मृतियों को क्रमशः कुरेदता हूँ तो पता चलता है कि रिश्तों और परिवार की परवरिश का व्यक्ति के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान होता है ।
समय कभी लौटकर नहीं आता लेकिन उसके पदचिन्ह कभी मिटते नहीं। बरबस पुरानी स्मृतियां आकर मन के दरवाजे खटखटाती हैं । अक्सर बच्चों को विद्यालय जाते देखकर बहुत कुछ याद जाता है । पुराने संगी - साथी , गुरुजन और उन सबसे जुड़ी यादें।
मेरा आशय किसी को उपदेश देने का नहीं अपितु अपने माता-पिता ,गुरुओं और परिवारजनों से जो सीखा और पाया उसे सबके साथ बांटना भी तो मेरा फर्ज है ।
और फिर यादों को अपने तक समेटकर रखना भी आसान नहीं होता।
जीवन की इस पायदान पर जब लगता है कि हमने सब कुछ पा लिया और जी लिया तब कपड़े का वह साधारण बस्ता टांगकर पैदल शाला जाने का उत्साह और उमंग याद आ गये , जिसके आगे आज अपने लैपटॉप का बैग और ब्रीफ़केस बोझ लगते हैं ।
कवि शैलेन्द्र के एक गीत की ये पंक्तियां शायद इसीलिए होठों पर गाहे बगाहे आ जाया करती हैं :-
दिन जो पखेरू होते , पिंजरे में मैं रख लेता।
पालता उनको जतन से , मोती के दाने देता।
सीने से रहता लगाए,
याद न जाए बीते दिनों की ....
- रवीन्द्र वाजपेयी
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