Tuesday, 1 July 2025

भारत के बढ़ते प्रभाव से जिनपिंग बौखला उठे



चीन और चालाकी एक दूसरे के पर्याय हैं। गत दिवस उसने सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत के साथ  नये सिरे से वार्ता की पेशकश की ।  वहीं अब खबर है कि वह पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मिलकर एक नया क्षेत्रीय संगठन बनाने जा रहा है जो सार्क के समानांतर कार्य करेगा।  सार्क में  8 देश  अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं। पाकिस्तान लंबे समय से चीन को इसकी सदस्यता दिलवाने हेतु प्रयासरत है किंतु उसे सफलता नहीं मिली। ये बात भी सही है कि सार्क में भारत की मौजूदगी काफी प्रभावशाली है जिसकी वजह से पाकिस्तान की हरकतों पर रोक लग जाती है। कूटनीतिक स्तर पर दक्षिण एशियाई राजनीति में भारत के एक बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित होने से पाकिस्तान और चीन दोनों के पेट में मरोड़ उठता रहता है। हाल ही में  चीन में हुई शंघाई सहयोग संगठन ( एस. सी. ओ.) की बैठक के बाद संयुक्त बयान पर चूंकि भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता रक्षा मंत्री राजनाथ ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था इसलिए वह जारी नहीं हो सका। असल में  चीन ने बयान का जो  प्रारूप तैयार करवाया उसमें पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा किये गए नरसंहार का उल्लेख करने की जरूरत तक नहीं समझी गई। लेकिन बलूचिस्तान में  हो रहे आंदोलन को आतंकवादी निरूपित किया गया। साथ ही आतंकवाद संबंधी भारत की चिंताओं और दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से उपेक्षित करते हुए पाकिस्तान को खुश करने का प्रयास हुआ। लेकिन रक्षा मंत्री श्री सिंह ने उक्त बयान से असहमति जताते हुए  जो कूटनीतिक बढ़त हासिल की उससे चीन और उसका पिछलग्गू पाकिस्तान बौखला गए।  अपने ही देश में भारत के रक्षा मंत्री द्वारा की गई फजीहत से जिनपिंग बुरी तरह भन्नाए हुए  हैं। इसका प्रमाण मिला उनके द्वारा ब्राज़ील में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन में न जाने के फैसले से। उनका विरोध  इस बात पर है कि सम्मेलन के बाद ब्राजील के राष्ट्रपति द्वारा श्री मोदी के सम्मान में सरकारी भोज का आयोजन किया है। ब्रिस्क के गठन के बाद ये पहला अवसर होगा जब जिनपिंग उसके सम्मेलन में उपस्थित नहीं रहेंगे। कूटनीतिक जगत  में इस बात की चर्चा है कि उनकी नाराजगी यूँ तो 2020 की गलवान घाटी मुठभेड़ के बाद से जारी है क्योंकि भारत ने लद्दाख़ से  अरुणाचल तक अग्रिम मोर्चों तक जिस तरह की सैन्य तैयारियां कीं उनसे चीनी सेना द्वारा की जाने वाली किसी भी हरकत का उसी की भाषा में जवाब दिया जाने लगा है। इसके अलावा वे  रक्षा उपकरणों के  निर्यात में भारत के बढ़ते कदमों से सहमे हुए हैं। पहलगाम की घटना के बाद भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर के नाम से जो सैन्य कारवाई की गई उसने  पाकिस्तान कि जिस रक्षा प्रणाली को छिन्न - भिन्न किया वह चूंकि चीन द्वारा दी गई थी इसलिए उसे शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। भारतीय मिसाइलें पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों  के अड्डों सहित अनेक सैन्य प्रतिष्ठानों और हवाई अड्डों तक बेरोकटोक पहुँच गईं जबकि चीन में बनीं   पाकिस्तान की मिसाइलें और ड्रोन भारत की रक्षा प्रणाली द्वारा हवा में ही नष्ट कर दिये गए। उस  ऑपरेशन के बाद भारत में बनी सैन्य सामग्री की मांग  वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ी  है। चीन से परेशान दक्षिण एशिया के तमाम छोटे - छोटे देशों द्वारा भारत के साथ रक्षा उपकरणों के सौदों से जिनपिंग बौखलाए हुए हैं। सार्क चूंकि उनके दबदबे को स्वीकार करने राजी नहीं है इसलिए जिनपिंग ने पाकिस्तान और बांग्ला देश के साथ नया क्षेत्रीय संगठन बनाने का दाँव चला। लेकिन वे भूल रहे हैं कि चीन की धौंस  से उसके पड़ोसी तो त्रस्त हैं ही पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में भी उसकी चालबाजी के प्रति लोग चौकन्ने हैं। उल्लेखनीय है  तालिबान द्वारा अमेरिका के विरुद्ध जंग  में चीन ने तालिबान की काफी मदद की किंतु सत्ता में आने के बाद वे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बना रहे हैं ।  निकट भविष्य में चीन की नई - नई हरकतें देखने मिल सकती हैं क्योंकि अब वह भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानकर चलने लगा है। नीतिशास्त्र का ये कथन इस बारे में प्रासंगिक है कि जिसकी शक्ति बढ़ती है उसके शत्रु बढ़ते हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

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