Friday, 25 July 2025

ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि भारत की बड़ी सफलता


संसद के मानसून सत्र के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा पर विपक्ष काफी हमलावर रहा तथा इसे संसद की उपेक्षा बताया। ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम में आतंकी हमले पर वह सत्र की शुरुआत में ही चर्चा के साथ ये मांग भी कर रहा था कि उसे प्रधानमंत्री से ही जवाब चाहिए। सरकार ने चर्चा की बात तो मान ली किंतु उसकी तारीख आगे बढ़ाई जिससे श्री मोदी  उस दौरान उपस्थित रह सकें। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं को लेकर वैसे भी विपक्षी खेमा सदैव तंज कसते हुए उसे सरकारी खर्च पर सैर सपाटे का नाम देता रहा है। लेकिन बारीकी से देखें तो इन विदेश यात्राओं में से कुछ तो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों आदि के लिए होती  हैं किंतु बाकी कूटनीतिक सम्बन्ध मजबूत करने के साथ ही व्यवसाय पर केंद्रित रहती हैं।  हाल ही में संपन्न उनकी विदेश यात्राओं को तो पूरी तरह व्यापार से जुड़ी ही कहा जाएगा। ये इसलिए भी आवश्यक हो गया क्योंकि डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका जिस तरह से मनमाने आयात शुल्क थोपने पर आमादा है उससे भारत की अर्थव्यवस्था विशेष रूप से निर्यात पर बुरा असर पड़ने की आशंका बढ़ रही है। ट्रम्प का रवैया इतना अनिश्चित और अव्यवहारिक है कि उनकी किसी बात पर भरोसा कर निश्चिंत हो जाना बड़े धोखे का कारण बन सकता है। रूस से कच्चे तेल का आयात करने पर 300 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी इसका उदाहरण है। इसके अलावा भी वैश्विक परिस्थितियाँ जिस प्रकार उलट - पुलट हो रही हैं उन्हें देखते हुए भारत को किसी एक या कुछ देशों पर निर्भरता खत्म करते हुए आयात और निर्यात के क्षेत्र में पूर्ण स्वायत्तता हासिल करना समय की मांग है। आयात के मामले में चीन के दबाव से भी बाहर आना देश के दूरगामी हित में है। ब्रिक्स की बैठक में ब्राजील जाते और आते समय श्री मोदी ने कुछ अफ्रीकी और कैरिबियन देशों की यात्रा के दौरान जो व्यापार समझौते किये वे अमेरिका और चीन दोनों के लिए इशारा थे। लेकिन गत दिवस ब्रिटेन के साथ प्रधानमंत्री ने जिस मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किये वह अमेरिका के गाल पर तमाचा है। इस संधि से भारत को एक बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। हालांकि ब्रिटेन को भी इसका लाभ बराबरी से मिलेगा किंतु जो विवरण आया उसके अनुसार आने वाले सालों में ब्रिटेन को भारत का निर्यात कई गुना बढ़ेगा। चूंकि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लाखों लोगों के अलावा एशियाई देशों के भी नागरिक बड़ी संख्या में रहते हैं। ऐसे में भारतीय वस्तुओं की मांग काफी है। मुक्त व्यापार संधि से चूंकि ये चीजें सस्ती हो जाएंगी इसलिए इनका निर्यात मौजूदा स्थिति से कई गुना बढ़ जाएगा। इस संधि के लिए बीते अनेक सालों से कूटनीतिक प्रयास चल रहे थे। प्रधानमंत्री ने इस संधि को जिस प्राथमिकता के साथ अंजाम तक पहुंचाया वह उनकी कूटनीतिक कार्यकुशलता का ताजा प्रमाण है। इस संधि से यूरोप के अन्य देशों के साथ भी इसी तरह के समझौते का रास्ता खुल गया है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका को इस संधि से झटका लगा है क्योंकि ब्रिटेन उसका सबसे करीबी देश है। ऐसा लगता है ट्रम्प यूरोपीय देशों पर भी जिस तरह का दबाव बना रहे हैं उसे देखते हुए भारत - ब्रिटेन के बीच हुई मुक्त व्यापार संधि विश्व व्यापार में एक बड़े कदम के रूप में देखी जाएगी। इसके कारण भारत पर आयात कर बढ़ाने के बारे में अमेरिका का रुख बदलेगा या नहीं ये तो फिलहाल पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। हो सकता है ट्रम्प इससे नाराज होकर ब्रिटेन पर ही दबाव बनाने लगें किंतु  उनकी हालिया नीतियों से ब्रिटेन भी क्षुब्ध है। यूक्रेन को लेकर ट्रम्प ने जो दोगलापन दिखाया उसके कारण प्रमुख  यूरोपीय देश उनसे चिढ़कर अपनी सैन्य और आर्थिक रणनीति में बड़ा बदलाव करने में जुटे हैं। भारत - ब्रिटेन मुक्त व्यापार संधि ने उन सबको ये सिखा दिया है कि अमेरिका के बिना भी दुनिया का काम चल सकता है। वैसे भी आज की दुनिया अब दो ध्रुवीय नहीं रह गई है। और भारत भी अब विश्व की बड़ी शक्तियों की कतार में शामिल हो चुका है। ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार संधि ने इस पर मोहर लगा दी है। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

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