Wednesday, 2 July 2025

भाजपा के नये प्रदेशाध्यक्ष के सामने 2028 और 29 बड़ी चुनौती


आखिरकार म.प्र में भाजपा को हेमंत खंडेलवाल के तौर पर नया अध्यक्ष प्राप्त हो गया जो निवर्तमान अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा का स्थान लेंगे। श्री शर्मा का कार्यकाल काफी ऐतिहासिक रहा। 2018 के विधानसभा चुनाव में बहुमत से महज 8 सीट पीछे रहने के बाद भाजपा में निराशा छा गई थी। कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की वापसी ने प्रदेश की राजनीति में नये युग की शुरुआत का संकेत दिया किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने धमाकेदार वापसी की और छिंदवाड़ा में कमलनाथ के बेटे नकुल के अलावा सभी सीटें मोदी लहर में भाजपा की झोली में आ गईं। इसके बाद से ही प्रदेश सरकार के भविष्य पर खतरा मंडराने लगा और अंततः ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने कांग्रेस की खुशियों पर पानी फेर दिया। 2020 के मार्च में कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए लॉक डाउन के पहले शिवराज सिंह चौहान फिर सत्ता में लौट आये। वह सत्ता परिवर्तन चूंकि श्री शर्मा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के फौरन बाद हुआ इसलिए पार्टी में उनकी ताजपोशी को शुभ माना गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री रहने के कारण युवाओं में उनकी अच्छी पकड़ थी। इसलिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए पांच वर्ष में उन्होंने युवाओं को पार्टी की ओर आकर्षित किया। वे भाजपा के सबसे लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहने का  कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा रिकार्ड उनके नाम है वह है 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लेना जो 1977 की जनता लहर में भी नहीं हो सका था। ये भी उल्लेखनीय है कि श्री शर्मा के कार्यकाल में ही 2023 में प्रदेश को डॉ. मोहन यादव के रूप में एक युवा मुख्यमंत्री मिला। ऐसे अध्यक्ष का उत्तराधिकारी तलाश करना भाजपा के लिए आसान नहीं था किंतु लंबे मंथन के बाद गत दिवस बैतूल के विधायक और पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल निर्विरोध भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित हो गए। यदि सब कुछ सामान्य रहा तब उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ेगी। इसलिए उनको पद भार संभालते ही तेज गति से कार्य करना पड़ेगा। सबसे बड़ी जरूरत होगी जिलों में प्रवास कर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच पहचान बनाना क्योंकि इस पैमाने पर वे श्री शर्मा से काफ़ी पीछे हैं। यद्यपि पार्टी का प्रादेशिक और राष्ट्रीय नेतृत्व श्री खंडेलवाल से भली - भाँति परिचित है। उनके स्वर्गीय पिता भी चूंकि बैतूल से सांसद रहे थे अतः उनकी विरासत का लाभ भी उनके साथ है। उस दृष्टि से भाजपा में श्री शर्मा नये - नये थे। अभाविप के बड़े नेताओं में वे शामिल जरूर थे किंतु शिवराज सिंह चौहान जैसे दिग्गज के सामने स्वयं को स्थापित करना आसान नहीं था किंतु खजुराहो के सांसद बनने के साथ ही प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभाई।  सौभाग्य से म.प्र में  भाजपा की जड़ें अब गाँव - गाँव तक फैल चुकी हैं। जनसंघ के जमाने से ही यहाँ हिंदुत्व की विचारधारा का प्रभाव रहा है। इसीलिए अन्य प्रांतों के नेता यहां से लोकसभा चुनाव जीते। जगन्नाथ राव जोशी, डॉ. वसंत राव पंडित और सुषमा स्वराज  इसके उदाहरण हैं। अटल  बिहारी वाजपेयी  यहाँ से लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के लिए निर्वाचित हुए। लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत भी म.प्र के कोटे से  राज्यसभा भेजे जाते रहे। भाजपा का गढ़ बन चुके इस प्रदेश में पार्टी का अध्यक्ष बनना सतही तौर पर तो बड़ा आसान लगता है किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं क्योंकि शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहना कठिन होता है। 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी  झटका खा चुकी है। नये अध्यक्ष के सामने चुनौती ये भी है कि स्व. कुशाभाऊ ठाकरे के सामने  युवा नेताओं की जो श्रृंखला तैयार हो चुकी थी वह अब 65 और 70 वर्ष के दायरे में आ गई है। इसलिए श्री खंडेलवाल को नई पीढी में से क्षमतावान नेतृत्व तैयार  करने की  दिशा में विशेष प्रयास करने होंगे। ये अच्छा  है कि मुख्यमंत्री से उनका अच्छा समन्वय है। चूंकि वे सादगी के लिए जाने जाते हैं इसलिए साधारण कार्यकर्ताओं में जल्द लोकप्रिय हो सकते हैं। गौरतलब है सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष को पार्टी संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय बनाकर काम करना होता है। श्री खंडेलवाल इस कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं वही उनकी सफलता का मापदंड होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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