भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरी आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद अपनी चमक और धमक खोती जा रही थी। लेकिन हाल ही में गुजरात और पंजाब में विधानसभा उपचुनाव जीतने से उसका आत्मविश्वास लौटता दिखा। यद्यपि उपचुनाव जीतने के फ़ौरन बाद गुजरात में उसके एक और विधायक ने पार्टी छोड़कर जीत की खुशी को फीका कर दिया। वैसे आम आदमी पार्टी छोड़ने का सिलसिला बिना रुके जारी है। पार्टी के संस्थापकों में से कुछ तो जल्द ही खुद हट गए और कुछ धकियाकर हटा दिये गए। लेकिन जो बाद में आये उनमें से भी बहुतों का मोह केजरीवाल एंड कं से भंग होता गया। पंजाब में सरकार बनाने के बाद पार्टी नेताओं का आत्मविश्वास अहंकार का रूप लेने लगा जिसके कारण वे ये सोचकर अपनी छवि के विपरीत काम करने लगे कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन दिल्ली के शराब घोटाले और शीशमहल कांड ने उस खुशफहमी को पूरी तरह खत्म कर दिया और पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता उसके हाथ से खिसक गई। लोकसभा चुनाव में झटका खाने के बाद भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली जीतकर जहाँ शानदार वापसी की वहीं आम आदमी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग हटकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकी। दिल्ली चुनाव में तो राहुल गाँधी ने खुद अरविंद केजरीवाल पर जमकर हमले किये। जिसके बाद दोनों में तल्खी बढ़ती गई। गुजरात उपचुनाव के बाद श्री केजरीवाल ने ये कहते हुए कांग्रेस और लालू यादव दोनों को झटका दे दिया कि बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव में उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग रहकर चुनाव लड़ेगी साथ ही ये स्पष्ट कर दिया कि वह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए ही था। दरअसल हरियाणा विधानसभा चुनाव में राहुल भी चाहते थे कि कांग्रेस आम आदमी पार्टी को साथ रखे किंतु भूपिन्दर सिंह हुड्डा ने उनकी बात नहीं मानी। उस वजह से आम आदमी पार्टी ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस की राह में रोड़े अटका दिये। और फिर दिल्ली के दंगल में दोनों दलों के बीच खाई और चौड़ी हो गई। हालांकि इंडिया गठबंधन के अनेक घटक दल ये कह चुके हैं कि विपक्षी एकता का वह प्रयोग केवल संसदीय चुनाव के लिए हुआ था और उसके बाद उसकी भूमिका खत्म हो चुकी है। बावजूद उसके महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन नतीजे बेहद खराब होने के बाद इंडिया गठबंधन के भविष्य पर सवाल खड़े होने लगे। निकट भविष्य में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिसमें मुख्य मुकाबला लालू के नेतृत्व वाले महागठबंधन और एनडीए के बीच होगा जिसमें भाजपा, नीतीश और चिराग पासवान की पार्टी शामिल हैं। लेकिन श्री केजरीवाल ने भी आम आदमी पार्टी के अकेले ही मैदान में उतरने का ऐलान कर महागठबंधन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ये आश्चर्यजनक है कि कुछ समय पहले तक वे भाजपा को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे किंतु अब विपक्ष की टाँग खींचने में भी शर्म नहीं कर रहे। इसका कारण संभवतः ये है कि इंडिया गठबंधन में शामिल होने से आम आदमी पार्टी का वह दावा हवा - हवाई होकर रह गया कि वह भाजपा की विकल्प है। दिल्ली की सत्ता हाथ से निकलना उसके लिए बहुत बड़ा धक्का था क्योंकि उसके कारण उसके सबसे बड़े नेता की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। बिहार में अकेले लड़कर आम आदमी पार्टी एक सीट भी जीत जाए तो आश्चर्य होगा किंतु वह महागठबंधन की जमीन जरूर खिसका देगी ये आशंका प्रबल है। हो सकता है कल को लालू और राहुल ये आरोप लगाने लग जाएं कि आम आदमी पार्टी भी भाजपा की बी टीम है। सही बात ये है कि दिल्ली में श्री केजरीवाल ने सरकार तो गंवाई ही आम आदमी पार्टी की जो पहचान बनी थी उसे भी खत्म कर दिया। बाकी विपक्षी दलों से अलग लड़कर श्री केजरीवाल उसी प्रतिष्ठा को दोबारा हासिल करने के लिए प्रयासरत हैं। बिहार में लालू युग अस्त होने को है , वहीं कांग्रेस घुटनों के बल चलने मजबूर है। ऐसे में जो खालीपन उत्पन्न होने वाला है उसे भरने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय किया गया। ये कितना सही होगा कहना कठिन है क्योंकि बीते एक साल से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी लगातार अपनी प्रारंभिक पुण्याई खोते गए हैं। और फिर बिहार में उन्हीं जैसी छवि वाले प्रशांत किशोर भी पहले से ही ताल ठोक रहे हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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