Monday, 14 July 2025

मानसून की मेहरबानी बनी परेशानी

पूरे देश में इन दिनों अच्छी बरसात होने से मौसम खुशनुमा हो गया है। जिन इलाकों में अमूमन कम वर्षा होती थी वहाँ भी इस साल मानसून मेहरबान है। जल ही जीवन है इसलिए बरसात का सभी स्वागत करते हैं। भारत में मानसूनी बरसात न सिर्फ कृषि अपितु अगले साल बरसात आने तक पेय जल की आपूर्ति को सुनिश्चित करता है। नदियों के अलावा कुए, तालाब आदि भी मानसून के भरोसे ही रहते हैं। आजकल ट्यूब वेल का जमाना है जिसके लिए भूजल का स्तर बेहद आवश्यक होता है और वह भी अच्छी बरसात पर ही निर्भर है। बरसाती पानी को सहेजने के लिए छत के पानी का संचयन ( रूफ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग) का प्रचलन भी बढ़ा है किंतु इसका प्रतिशत जरूरत से बहुत कम है। दूसरी तरफ बढ़ता शहरीकरण  पुराने तालाब, कुए, बाग - बगीचों की बलि लेता जा रहा है। कच्ची जगहें कम होने से धरती की पानी सोखने की मात्रा भी निरंतर कम होती जा रही है। शहरों और गाँवों के बीच की दूरी घटते जाने से प्राकृतिक जंगलों की जगह कांक्रीट के विशालकाय ढांचे उग आए हैं। शहरों के साथ ही गाँव में  भी घनी बसाहट दिखाई देने लगी है। इसका परिणाम अब वहाँ का खुलापन खत्म होने के कगार पर है। शहरी रहन - सहन अपनाने के कारण ग्रामीण समाज भी उन सभी बुराइयों को अपनाता जा  रहा है। यही वजह है कि बरसात के आंकड़ों के साथ ही ये खबरें भी लगातार आ रही हैं कि सब दूर पानी भर रहा है। नदियों में बाढ़ है। पुल डूब रहे हैं, सड़कों पर पानी भरा होने से आवागमन बाधित हो रहा है। घरों और बस्तियों में पानी भरना आम हो गया है। पानी की निकासी के सारे प्रबंध दम तोड़ चुके हैं । ग्रामीण और कस्बों को छोड़ भी दें किंतु जिन शहरों को विकास का प्रतीक माना जाता है वे भी घंटे भर की बरसात में लबालब हो जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली हो या आर्थिक राजधानी मुंबई सभी में बरसात बड़ी समस्या बन जाती है। गुड़गांव और बेंगुलूरु  सायबर सिटी के रूप में भले ही दुनिया भर में प्रसिद्ध हों किंतु बरसात में इन दोनों की दुर्गति हो जाती है। इस साल जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार तो पूरे देश की स्थिति एक जैसी है। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि विकास की अंधी दौड़ में जल निकासी के बारे में समुचित ध्यान नहीं दिया गया। नगरीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भूमाफिया के साथ संगामित्ति ने स्थितियाँ चिंताजनक   बना दी हैं। इस हालत के लिए राजनेताओं को भी जिम्मेदार मानना होगा क्योंकि भूमाफिया को संरक्षण के अलावा विकास कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार को बजाय रोकने के उल्टे वे उसे प्रोत्साहित करते हैं। आज शहरों का जो अनियोजित विकास हुआ उसमें बड़ी भूमिका राजनीतिक नेताओं की है। इस सबके कारण बरसात मुसीबत बन जाती है। इसमें कमी या विलंब जहाँ चिंता उत्पन्न करता है वहीं भरपूर बरसात भी परेशानी का सबब बन जाती है। इस वर्ष मानसून ने पूरे देश पर मेहरबानी की है। अब तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि इस साल औसत से अधिक पानी बरसेगा जिससे जल स्रोत लबालब हो जाएंगे किंतु बाढ़ और जल प्लावन ने सोचने बाध्य कर दिया है।  शहरों के साथ ही ग्रामीण विकास पर प्रति वर्ष अरबों - खरबों  खर्च होते हैं। बिजली ,पानी ,सड़क जैसी सुविधाएं सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाने का काम हो रहा है। लेकिन बरसात में उत्पन्न होने वाली इस समस्या के निदान के बारे में सोचने की फुर्सत किसी को नहीं है। जल प्लावन से जन हानि भी होती है। देश में सैकड़ों लोग डूबकर मर गए, पानी भरने से लोगों का जो नुकसान हुआ उसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। इससे बढ़कर सड़कों आदि को जो क्षति पहुंचती है वह विकास के पहिये को उल्टी दिशा में घुमा देती है। हमारे देश में आग लगने पर कुआ खोदने की सुध आने की उक्ति काफी प्रचलित है । इसी तरह जब जल प्लावन होता है तब कुछ दिन आपदा प्रबंधन नजर आता है और बाद में सब भुला दिया जाता है। इस साल की हालत से सबक लेकर भविष्य के लिए यदि समुचित व्यवस्थाएँ की जाएं तो देश को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। साथ ही डूबने से होने वाली मौतें भी रोकी जा सकती हैं।  


-रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment