सीडीएस ( चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) जनरल अनिल चौहान का ये कहना सौ फीसदी सत्य है कि आज के दौर में होने वाले युद्धों को जीतने के लिए पुरानी तकनीक कारगर नहीं हो सकती। उनकी इस चेतावनी से भी हर कोई सहमत होगा कि यदि ज़रूरी मिशनों के लिए विदेशों पर निर्भरता बनी रही तो हमारी तैयारियां कमज़ोर पड़ सकती हैं। इसीलिए हमें अपनी तकनीक खुद विकसित करनी होगी ताकि युद्ध के दौरान किसी चीज की कमी न हो। एक कार्यक्रम में दिया उनका उक्त भाषण ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना को मिले अनुभवों से प्रेरित और प्रभावित था। उन्होंने पाकिस्तान के हमले को निष्प्रभावी करने वाली भारतीय रक्षा प्रणाली की प्रशंसा करते हुए बताया कि किस तरह छोटे - छोटे ड्रोन बाजी पलट सकते हैं। कुल मिलाकर जनरल चौहान का वक्तव्य युद्ध के परंपरागत तौर - तरीकों से आगे आकर आधुनिक तकनीक को अपनाने पर केंद्रित था जिसका सार ये है कि ऐसा करते हुए हमें विदेशी तकनीक और अस्त्र - शस्त्रों पर अपनी निर्भरता खत्म करनी होगी। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि विदेशी युद्ध सामग्री में गोपनीयता नहीं रहती क्योंकि उसे बनाने वाले देश वही अस्त्र - शस्त्र अनेक देशों को भी बेचते हैं। ऑपरेशन सिंदूर में हमारी सेना ने आक्रमण और सुरक्षा दोनों में स्वदेश निर्मित अस्त्र - शस्त्र और रक्षा प्रणाली का जिस सफलता के साथ प्रयोग किया उसने दुनिया की महाशक्तियों को भी चौंका दिया। हालांकि उनके निर्माण में एक सीमा तक विदेशी सहयोग और तकनीक का सहारा लिया गया था किंतु पाकिस्तान के साथ संक्षिप्त लड़ाई में भारतीय सेना ने स्वदेश में बने अस्त्र - शस्त्रों से जिस तरह का युद्ध कौशल दिखाया उसके कारण भारत में निर्मित हथियारों के साथ ही मिसाइलों के काफी खरीददार देश सामने आ रहे हैं। इस संबंध में जो ताजा आंकड़े जानकारी में हैं उनके अनुसार केन्द्र में मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद एक तरफ तो सेना को अस्त्र- शस्त्रों से सुसज्जित करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों से खरीदी की जो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के शासनकाल में रुकी होने से सेना खुद को किसी आपातकालीन स्थिति से निपटने में असहाय अनुभव करने लगी थी। रक्षा सौदों की प्रक्रिया को डाॅ. मनमोहन सिंह गति प्रदान क्यों नहीं कर सके ये रहस्यमय है। कहा जाता है इस मामले में उन्हें निर्णय करने की आजादी नहीं थी। लेकिन घरेलू रक्षा उत्पादन में भी भारी कमी आई जिसका वाजिब कारण कोई नहीं बता सका। बहरहाल, बीते 11 वर्षों में रक्षा सामग्री का घरेलू उत्पादन कई गुना बढ़ा किंतु रक्षा सामग्री के निर्यात का आंकड़ा जिस ऊंचाई पर पहुंचा वह बेहद उत्साहजनक है। जनरल चौहान ने रक्षा उत्पादन के स्वदेशीकरण की जो जरूरत बताई उस दिशा में देश तेजी से बढ़ता नज़र आ रहा है। मौजूदा वैश्विक हालात में किसी भी देश की रक्षा सम्बन्धी आत्मनिर्भरता निहायत जरूरी है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग में ये बात उभरकर आई है। यदि अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देश हथियारों की आपूर्ति न करते तो यूक्रेन पर पुतिन की फ़ौजें अब तक कब्जा कर चुकी होतीं। सीडीएस जनरल चौहान ने रक्षा मामलों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ ही आधुनिक तकनीक अपनाने की जो अहमियत बताई वह देश की सुरक्षा के लिहाज से तो आवश्यक है ही लेकिन एक महाशक्ति के तौर पर अपना दबदबा स्थापित करने के लिए भी उसकी उपयोगिता है। भारत की अर्थव्यवस्था जिस तेजी से बढ़ रही है उसमें रक्षा उत्पादन भी बड़ा योगदान दे सकते हैं। निजी क्षेत्र को रक्षा सामग्री बनाने की अनुमति देना बड़ा रणनीतिक कदम है क्योंकि इस व्यवसाय में बड़े पैमाने पर पूंजी की जरूरत होती है। उल्लेखनीय है विकसित देशों में तोप, मिसाइल, ड्रोन और लड़ाकू विमान आदि निजी क्षेत्र ही उत्पादित करता है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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