म.प्र भाजपा का सबसे पुराना गढ़ है। आज भी जिन राज्यों में पार्टी का जनाधार कमजोर है वहाँ के नेताओं को इस प्रदेश से राज्यसभा में भेजा जाता रहा। ये सिलसिला आज भी जारी है। तमिलनाडु और केरल के कुछ ऐसे नेता भी म.प्र से संसद के उच्च सदन में भेजे गए जिनका नाम भी कम ही लोगों को याद होगा। डा. वसंत कुमार पंडित, कर्नाटक केसरी जगन्नाथ राव जोशी, उद्योगपति रामनाथ गोयनका और सुषमा स्वराज तो अन्य राज्यों से आकर यहाँ लोकसभा चुनाव तक जीतकर गईं। केरल के ओ. राजगोपाल राज्यसभा पहुंचकर केन्द्र में मंत्री तक बने। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत ने भी म.प्र के रास्ते राज्यसभा की सदस्यता हासिल की। जब लोकसभा में जनसंघ के मुट्ठी भर सांसद होते थे तब भी म.प्र की हिस्सेदारी सर्वाधिक थी। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन कर पूरे देश को चौंका दिया। 2003 से केवल 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़कर लगातार भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। स्थानीय निकायों में भी ज्यादातर में उसका ही राज है। जाहिर है ये स्थिति इसलिए बन सकी क्योंकि पार्टी का संगठन बेहद मजबूत है। सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद कोई भी पार्टी अलोकप्रिय होने लगती है। 2018 में प्रदेश की जनता ने भाजपा को भी झटका दे दिया था। हालांकि 2020 में ही पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली किंतु उसका श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिला जिन्होंने दो दर्जन विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा और उसके कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में तो सभी 29 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। इन परिस्थितियों में पार्टी संगठन के मुखिया का दायित्व जिन हेमंत खंडेलवाल के कंधों पर आया उनके शुरुआती तेवरों से ये लग रहा है कि वे संगठन में किसी भी प्रकार की सुस्ती को सहन नहीं करेंगे । गत दिवस भोपाल में पार्टी के दायित्ववान नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ परिचयात्मक सम्मेलन के दौरान उनकी हिदायतें किसी चेतावनी से कम नहीं थीं। इसे संगठन का नया ढांचा खड़ा करने की कवायद भी कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है श्री खंडेलवाल का ये कहना भी महत्वपूर्ण है कि उनके परिवार में अकेले वही राजनीति में हैं लिहाजा उनके परिजनों के किसी दबाव में न आयें। दरअसल ऐसा कहकर उन्होंने पार्टी के नेताओं विशेष रूप से जनप्रतिनिधियों को ये संदेश दे दिया कि वे अपने परिवार वालों को शासन और संगठन के काम में अनुचित दखल देने से रोकें। आजकल पूरे प्रदेश से इस प्रकार की खबरें आ रही हैं कि भाजपा नेताओं के रिश्तेदार चाहे जहाँ रौब झाड़ते रहते हैं। मारपीट भी आम हो चली है। सरकारी दफ्तरों में आये दिन भाजपा नेताओं के नाते - रिश्तेदार अभद्रता करते देखे जाते हैं। इसके कारण सरकार और संगठन दोनों की छवि खराब हो रही है। नये प्रदेश अध्यक्ष ने ऐसे लोगों को चेतावनी दी है। लेकिन भाजपा अब जनसंघ वाले दौर से बाहर आ चुकी है। उसमें अन्य पार्टियों से भी बड़ी संख्या में लोगों की आवक हुई है। उनमें से अनेक लोगों को सत्ता और संगठन दोनों में जगह दी गई। ये लोग भाजपा की संस्कृति में रचे - बसे नहीं होने से पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। इन लोगों से निपटना श्री खंडेलवाल के लिए बड़ी चुनौती होगी। हालांकि अब तक उन्होंने जो संकेत दिये उनसे लगता है कि वे सख्ती से पेश आयेंगे। यदि वे जनसंघ के समय का अनुशासन लागू कर सके तो इससे कुछ लोगों को तकलीफ भले हो किंतु पार्टी के भविष्य के लिए शुभ होगा। श्री खंडेलवाल को विरासत में उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ दोनों मिली हैं। अब तक वे परदे के पीछे रहकर काम करते रहे किंतु अब संगठन के शीर्ष पद पर बैठने का अवसर उन्हें मिला है । इसका वे कैसे उपयोग करते हैं इस पर उनका और प्रदेश में पार्टी दोनों का भविष्य निर्भर करेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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