उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा गत रात्रि दिये गए त्यागपत्र की खबर जिसने भी सुनी सन्न रह गया। कल उन्होंने मानसून सत्र के पहले दिन राज्यसभा की अध्यक्षता की। तब तक वे पूरी तरह स्वस्थ और सामान्य थे। शाम को विपक्ष के सांसदों के साथ बैठक भी की किंतु रात को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से त्यागपत्र भेजकर सार्वजनिक कर दिया। उनका त्यागपत्र राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के बाद अब वे भूतपूर्व हो गए हैं।चूंकि उनके स्वास्थ्य संबंधी किसी गंभीर समस्या की कोई जानकारी अब तक नहीं थी लिहाजा जो कारण उन्होंने बताया उस पर सहसा किसी को विश्वास नहीं हुआ। हाल ही में एक दो बार उनकी तबियत खराब हुई किंतु किसी बड़ी बीमारी का पता नहीं चला। 74 वर्ष की आयु में स्वास्थ्य खराब होना अस्वाभाविक नहीं है किंतु उच्च सदन के सभापति पर मानसिक दबाव काफी रहता है। और फिर उनके विरुद्ध विपक्ष सदैव हमलावर रहा है। उनकी कटाक्षों से भरी टिप्पणियों से सदन का वातावरण अक्सर तनावपूर्ण हो जाता था। यहाँ तक कि उनके विरुद्ध महाभियोग लाने तक की तैयारी विपक्ष ने कर ली जो तकनीकी कारणों से आगे नहीं बढ़ सकी। उन पर सत्ता पक्ष की जुबान में बोलने का आरोप भी खुलकर लगता रहा। न्यायपालिका संबंधी उनकी टिप्पणियों पर तो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तक ने ऐतराज जताया । स्मरणीय है वे खुद भी सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर चुके थे। उनके केंद्र सरकार से भी अच्छे रिश्ते रहे। प. बंगाल में ममता बैनर्जी पर लगाम कसने का काम उन्होंने जिस खूबी से किया उसका पुरस्कार उपराष्ट्रपति बनाकर उन्हें दिया गया। एक कारण उनका जाट होना भी रहा। किसान आंदोलन के कारण जाट समुदाय की नाराजगी से बचने भाजपा ने ये दाँव खेला था। राजस्थान विधानसभा चुनाव पर भी उसका असर हुआ। चुनाव के दौरान श्री धनखड़ के राजस्थान दौरों पर विपक्ष ने जमकर आपतियाँ व्यक्त कीं । उपराष्ट्रपति और सरकार के बीच तनाव का वैसे कोई कारण सामान्यतः नहीं पैदा होता। अतीत में जितने भी उपराष्ट्रपति हुए उन सभी पर राज्यसभा के संचालन में सत्ता पक्ष की तरफदारी करने के आरोप से लगते रहे। उस दृष्टि से श्री धनखड़ ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे हटकर कहा जाता। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक नियुक्ति आयोग को रद्द करने के फैसले के विरुद्ध उनकी सार्वजनिक बयानबाजी ने उन्हें औरों से अलग कर दिया। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के यहाँ करोड़ों रुपये बरामद होने के मामले में श्री धनखड़ ने सदन के भीतर जिस प्रकार की टिप्पणियां कीं और न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों के बारे में समिति बनाने की पेशकश की उससे सरकार के साथ ही न्यायपालिका भी चौकन्ना हुई। लेकिन इस सबको उनके त्यागपत्र से जोड़ना उचित नहीं लगता। ऐसे में अचानक उनका त्यागपत्र आने और स्वीकार हो जाने को गत दिवस सदन में हुए घटनाक्रम का परिणाम माना जा रहा है। विपक्ष के अनेक बड़े नेता त्यागपत्र को लेकर तरह - तरह की बातें कर रहे हैं। कल न्यायाधीश वर्मा के विरुद्ध विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने के अलावा राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को ऑपरेशन सिंदूर पर बोलने की अनुमति दिये जाने के श्री धनखड़ के फैसले को भी इसकी पृष्ठभूमि माना जा रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष इस विषय पर बाद में चर्चा पर अड़ा था। शाम को उपराष्ट्रपति द्वारा सदन की कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजजू की गैर मौजूदगी को भी तनाव बढ़ने की वजह माना जा रहा है। यद्यपि उन जैसा धाकड़ और स्पष्ट बोलने वाला व्यक्ति ज्यादा समय चुप रहेगा ये मान लेना कठिन है। लेकिन अचानक दिये त्यागपत्र का कारण वाकई स्वास्थ्य से संबंधित है तब ये किसी गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर रहा है जो उन्हें कल ही ज्ञात हुई किंतु कुछ और कारण है तब उसका खुलासा भी होना चाहिए जिससे बेसिरपैर की बातों को बल न मिले? क्योंकि एक दिन पहले तक जो विपक्ष श्री धनखड़ पर पक्षपात और दुर्व्यवहार का आरोप लगाया करता था वह अचानक उनकी प्रशंसा करने लग गया जो चौंकाने वाला है। यदि श्री धनखड़ विदाई समारोह में उपस्थित नहीं होते तो फिर चर्चाओं का सिलसिला जारी रहेगा। संसद का सत्र कल ही शुरू हुआ और पहले ही दिन उपराष्ट्रपति द्वारा रहस्यमय तरीके से त्यागपत्र देना सरकार की मुसीबत बढ़ाने वाला है क्योंकि मौजूदा उपसभापति हरिवंश अनुभवी जरूर हैं किंतु उनमें श्री धनखड़ जैसी दबंगी नहीं है। हालांकि मौजूदा संसद के सत्र में ही उपराष्ट्रपति का चुनाव करवाया जा सकता है किंतु उसके बाद भी इस त्यागपत्र को लेकर सवाल उठते रहेंगे क्योंकि ये भी नहीं पता चला कि उन्हें मनाने की कोशिश की गई हो।
- रवीन्द्र वाजपेयी
No comments:
Post a Comment