Saturday, 19 July 2025

आम आदमी पार्टी और बाकी में केवल नाम का फर्क रह गया


आम आदमी पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल कुछ समय पहले ही ये घोषणा कर चुके थे कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन से अलग रहकर बिहार में चुनाव लड़ेगी। हालांकि इसके पहले  हरियाणा और दिल्ली के  विधानसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने  कांग्रेस से गठबंधन नहीं किया था। वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन केवल कागजों पर ही सिमटा हुआ है। उसकी कोई औपचारिक बैठक या अन्य गतिविधियां भी सार्वजनिक तौर पर सुनने नहीं मिलीं। हाल ही में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों में भी गठबंधन के घटक दलों में कोई तालमेल नजर नहीं आया।  अगले साल प. बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इंडिया गठबंधन की फूट खुलकर उजागर होगी क्योंकि तृणमूल के विरुद्ध जहाँ कांग्रेस और वामपंथी मिलकर लड़ेंगे वहीं केरल में वामपंथियों की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस मोर्चा संभालेगी। बिहार के चुनाव में लालू यादव गठबंधन के  घटकों को कितनी सीटें देंगे ये स्पष्ट नहीं है। इसीलिए जब संसद के मानसून सत्र में सरकार को घेरने की रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाने की पहल की तो आम आदमी पार्टी द्वारा उससे दूर रहने की  घोषणा से किसी को अचंभा  नहीं हुआ। दरअसल कांग्रेस और  आम आदमी पार्टी के रिश्ते हरियाणा चुनाव के  दौरान ही बिगड़ चुके थे जब सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं सुलझने पर दोनों ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे। दिल्ली का चुनाव आते तक दूरी और बढ़ चुकी थी जहाँ  राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल ने एक दूसरे के विरुद्ध बोलने में कोई लिहाज नहीं किया। उस चुनाव ने आम आदमी पार्टी की साख और धाक दोनों को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया जिससे उसकी सौदेबाजी की क्षमता भी कमजोर पड़ गई। सही बात ये है कि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को छोड़कर शेष सभी का दायरा सीमित है क्योंकि वे क्षेत्रीय दल ही हैं। वामपंथी भी अब केवल केरल में सिमट चुके हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी  को दिल्ली में  पहले चुनाव से  जो सफलता मिली उससे श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं सातवें आसमान पर जा पहुंची और वे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगे। पार्टी को अखिल भारतीय स्वरूप देने की उनकी सोच में गलत कुछ भी नहीं था किंतु वे भूल गए कि आंदोलन से निकले राजनीतिक दल ज्यादा टिकते नहीं हैं क्योंकि उनका जन्म तात्कालिक मुद्दों और भावनाओं के ज्वार से होता है। सबसे बड़ी गलती श्री केजरीवाल ये कर बैठे कि उन्होंने भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी कर खुद को दूध का धुला साबित करने की कोशिश की किंतु धीरे - धीरे वे खुद भी भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसकर अपना दामन दागदार कर बैठे। और जब उनके चारों तरफ शिकंजा कसा तब इंडिया गठबंधन में शामिल होकर उन्हीं नेताओं के साथ गलबहियां करने लगे जो उनकी नजर में भ्रष्ट थे। पंजाब में  दिल्ली जैसी सफलता मिलने से आम आदमी पार्टी का आत्मविश्वास जाहिर तौर पर बढ़ा किंतु लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन चूंकि उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा इसलिए राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के बाद भी वह कांग्रेस को धकियाकर भाजपा का विकल्प नहीं बन पाई। आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन छोड़ने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उसे ये लगने लगा था कि अनेक दलों की भीड़ में वह अपनी पहिचान खोती जा रही थी। लेकिन सच्चाई ये है कि यह पार्टी भी अन्य  दलों की तरह ही चुनावी राजनीति में उलझकर भटकाव का शिकार होकर रह गई। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जन आंदोलन से निकली पार्टियां अपनी छवि को बनाये  रखने में विफल रहती हैं क्योंकि सत्ता की चाहत में वे अपने आदर्शों और सिद्धांतों की बलि चढ़ा बैठती हैं। आम आदमी पार्टी भले ही किसी से गठबंधन न करे किंतु इसकी उसकी साख वापिस नहीं लौट सकती । जनता समझ गई है कि उसमें और अन्य पार्टियों में केवल नाम का फर्क है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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