11 जुलाई 2006 को शाम के समय मुंबई की जीवन रेखा कही जाने वाली सात लोकल ट्रेनों में बम धमाके हुए। कुछ ही मिनटों में उस आतंकवादी घटना में 189 लोगों की मौत हो गई जबकि 800 से अधिक घायल हुए। 1992 के बाद वह मुंबई पर सबसे बड़ा हमला माना जाता है। जांच दलों ने 13 लोगों को उन धमाकों के लिए जिम्मेदार मानते हुए गिरफ्तार किया । 2015 में मकोका अदालत ने एक को बरी करते हुए शेष 12 आरोपियों को दोषी करार दिया। उनमें से 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा दी गई। आरोपियों ने उस फैसले के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की। उधर राज्य सरकार ने भी फांसी पर मुहर लगवाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। बीते सोमवार को पूरा देश ये जानकर सदमे में आ गया कि उच्च न्यायालय ने सभी 12 आरोपियों को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किये सबूतों और गवाहियों को विश्वसनीय न मानते हुए निचली अदालत के निर्णय को पूरे तौर पर खारिज कर दिया। इस प्रकार 19 साल पुराने जघन्य अपराध के बारे में दो अदालतों ने एक दूसरे के विपरीत निर्णय देकर न्यायपालिका को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। न्यायशास्त्र का मौलिक सिद्धांत है कि भले ही सौ गुनाहगार छूट जाएं किंतु किसी बेगुनाह को दंड नहीं मिलना चाहिए। ये बात भी गौर तलब है कि अदालत सबूतों और गवाहों के आधार पर अपना फैसला तय करती है। संदर्भित प्रकरण में उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष पर ही निशाना साधते हुए साफ - साफ कहा कि उसने जो सबूत पेश किये वे पर्याप्त नहीं थे और जो साक्ष्य पेश किये उन पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता। इस फैसले के विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर दी है। यदि सर्वोच्च न्यायालय मकोका अदालत का फैसला बहाल करते हुए सजाएं बरकरार रखता है तब फांसी के विरुद्ध दया याचिका राष्ट्रपति के पास जायेगी। कुल मिलाकर मामले का अंत कहाँ जाकर होगा ये कोई नहीं बता सकता। लेकिन 2015 में निचली अदालत ने जिन सबूतों और गवाहों के आधार पर 5 आरोपियों को फांसी और 7 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी , 2025 में उच्च न्यायालय को वही सबूत और गवाह विश्वासयोग्य क्यों नहीं लगे ये गंभीर प्रश्न है। मकोका अदालत तो थी ही ऐसे प्रकरणों की सुनवाई के लिए । ऐसे में पूरी तरह ये मान लेना कठिन है कि उसने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किये गए सबूतों और गवाहों पर आँख मूँदकर भरोसा करते हुए सजाएं सुना दी थीं। प्रकरण चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के पास चला गया है इसलिए उसके निर्णय तक प्रतीक्षा करने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है । लेकिन दो अदालतों के दो सर्वथा विपरीत फैसलों से न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगते हैं। दूसरी तरफ ये भी विचारणीय है कि इस तरह के तमाम प्रकरणों में अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध ठोस सबूत रखने में अक्षम साबित होता है जिससे वे बरी हो जाते हैं। 2006 में हुए धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों को उच्च न्यायालय के फैसले से कितनी मानसिक पीड़ा हुई होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। चूंकि घटना आतंकवाद से जुड़ी हुई थी इसलिए जिन गवाहों ने आरोपियों के विरुद्ध अदालत में मुँह खोलने का साहस दिखाया वे भी उनके बरी हो जाने के बाद खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे होंगे। लगभग दो दशक में भी प्रकरण का अंतिम निपटारा न होने से इस तरह का अपराध करने वालों का हौसला बुलंद होता है। इसलिए ऐसे प्रकरणों में जल्द फैसले की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए वरना सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले इसी तरह बरी होते रहेंगे। इस मामले में अब जाँच एजेंसियां, मकोका अदालत और मुंबई उच्च न्यायालय तीनों की भूमिका का परीक्षण होना चाहिए क्योंकि आरोपी कसूरवार हैं तो छोड़े क्यों गए और निर्दोष थे तो इतने सालों तक प्रताड़ित क्यों हुए ? और कहीं इन 12 आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरी कर दिया तब ये सवाल हमेशा के लिए अनुत्तरित ही रह जाएगा कि 189 बेकसूर लोगों को मौत के मुँह में धकेलने वाले हैवान आखिर थे कौन ?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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