आज से प्रारंभ हुए संसद के मानसून सत्र में विपक्ष सामयिक मुद्दों पर चर्चा चाहता है। जिसके लिए सत्ता पक्ष ने अपनी सहमति दिखाई किंतु दोनों सदनों की बैठक शुरू होते ही हंगामा होने लगा और सदन दोपहर 2 बजे तक स्थगित हो गया। इस प्रकार वर्षाकालीन सत्र की शुरुआत ही अच्छी नहीं रही। बजट सत्र के बाद देश और दुनिया में बहुत कुछ ऐसा घट चुका है जिस पर संसद के दोनों सदनों में सार्थक चर्चा की अपेक्षा पूरा देश कर रहा है। अनेक महत्वपूर्ण विधायी कार्य निपटाने के अलावा कुछ रिपोर्टों को भी सदन के पटल पर रखा जाना है। विपक्ष द्वारा सरकार से अपने सवालों के जवाब की अपेक्षा पूरी तरह सही है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का भी दायित्व है कि वह बहुमत के जोर पर सदन को चलाने के बजाय सामंजस्य बनाकर चले। लेकिन दुर्भाग्य से संसद में अर्थपूर्ण विचार - विमर्श होने के बजाय समय की बर्बादी होती है। जनता के धन से चलने वाली बैठक पर प्रतिदिन करोड़ों रु. खर्च होते हैं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में इस पर नजर रखी जाती है क्योंकि भारत अब विश्व में होने वाली किसी भी गतिविधि को प्रभावित करने में सक्षम हो चुका है। ये देखते हुए राजनीतिक दलों को चाहिए वे संसद के सत्र का इस्तेमाल केवल अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए करने के बजाय देश के हित में करने पर ध्यान दें। ऐसा नहीं है कि दोनों सदनों में सुयोग्य और गंभीर किस्म के सांसदों का सर्वथा अभाव हो। लोकसभा और राज्यसभा में अनेक ऐसे सदस्य हैं जिनकी प्रतिभा का सभी लोहा मानते हैं। ये लोग सदन की कार्यवाही में भाग लेने हेतु पूरी तैयारी से आते हैं। लेकिन उन्हीं की पार्टी के हंगामे से सदन स्थगित हो जाने पर वे मन - मसोसकर रह जाते हैं। छोटे - छोटे दलों को भी सदन नहीं चलने से अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। इसीलिए पिछले एक सत्र में सपा और तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस द्वारा सदन को बाधित किये जाने से खुद को दूर कर लिया था। अखिलेश यादव ने कहा भी था कि कांग्रेस अपनी नीति को समूचे विपक्ष पर लादना चाहती है जो अनुचित है। हालांकि संसद नहीं चलने देने के लिए विपक्षी दलों पर ही पूरा दोष मढ़ना गलत होगा। जो नई संसदीय संस्कृति बीते कुछ दशकों में पनपी उसमें सदन को नहीं चलने देने में सत्ता पक्ष को अपना फ़ायदा नजर आता है । उसकी ओर से पेश किये जाने वाले विधेयक और अन्य सभी प्रस्ताव तो शोर - शराबे के बीच भी सदन से मंजूर करवा लिए जाते हैं किंतु विपक्ष उसके जाल में फंसकर अपने अवसर गँवा देता है। हर सत्र के पहले सदन के अध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सदन के सुचारु संचालन हेतु सभी दलों से सहयोग की अपेक्षा करते हैं। उस बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष सुलझी हुई बातें करते हैं। लेकिन सत्र शुरू होते ही उनका रंग - ढंग बदल जाता है। ये कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि संसद के भीतर राजनीतिक पार्टियों के अशोभनीय आचरण से संसद और सांसदों की छवि और प्रतिष्ठा दोनों को अकल्पनीय क्षति हुई है। ऐसा नहीं है कि सांसद इसे जानते नहीं हों किंतु पार्टी का दबाव उनको मजबूर कर देता है। इस बारे में विपक्ष को ये समझना चाहिए कि संसद ही वह मंच है जहाँ वह सत्ता पक्ष की जो घेराबंदी करता है उसका प्रभाव जनता पर भी होता है। सांसदों की संख्या के अनुसार सभी दलों को चर्चा में भाग लेने का समय निर्धारित किया जाता है। यदि विपक्ष इस समय का सही तरीके से उपयोग कर सके तब उसके मुद्दे देश और दुनिया के सामने बेहतर तरीके से आ सकेंगे । बीते कुछ वर्षों से देखने मिल रहा है कि संसद का सत्र अपनी तय अवधि से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। इसका कारण सरकार तो अपने सारे काम पूरे करवा लेती है किंतु विपक्ष खाली हाथ बना रहता है। ये देखते हुए उसको चाहिए वह चर्चा के अनुकूल वातावरण बनाने आगे आये। सत्ता पक्ष के पास तो बहुमत की शक्ति होने से वह सदन को अपनी सुविधानुसार चला लेता है लेकिन हंगामे से विपक्ष बिना लड़े ही हारने की स्थिति में आ जाता है। संसद के इस सत्र में अनेक ऐसे विषय हैं जो विपक्ष के लिए लाभप्रद हो सकते हैं बशर्ते उन पर ठीक तरह से चर्चा हो जाए। जाहिर है सत्ता पक्ष उसको ऐसा कोई मौका नहीं देगा जिसका उपयोग उसकी खिंचाई के लिए किया जा सके । हालांकि ऐसा अतीत में भी होता रहा किंतु तत्कालीन विपक्ष में इतना दम था कि सरकार के न चाहने पर भी वह चर्चा का अवसर हासिल कर ही लेता था। उस लिहाज से वर्तमान विपक्ष में दूरदर्शिता का अभाव है जिसका लाभ सरकार उठा लेती है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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