Tuesday, 8 July 2025

ट्रम्प पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ाने की मूर्खता दोहरा रहे


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस प्रकार से अन्य देशों के साथ पेश आ रहे हैं वह हास्यापद  है। अपने परंपरागत मित्र देशों पर भी  बेरहमी से आयात शुल्क (टैरिफ) थोपना मनमानी ही कही जाएगी। अमेरिकी  गुट में माने जाने वाले यूरोपीय देश भी उनके सनकीपन से त्रस्त होकर वैकल्पिक संरक्षण  की तलाश में हैं। चीन और रूस पर तो उनका रौब नहीं चल पा रहा किंतु बाकी देशों पर मनमर्जी का आयात शुल्क लगाकर वे खुद को दुनिया का भाग्यविधाता मान बैठे हैं।  गत दिवस उन्होंने ब्रिक्स नामक संगठन को भी धमकाया कि यदि वह उनके हिसाब से नहीं चला तो उसमें शामिल देशों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त आयात शुल्क लगा दिया जायेगा। उधर जापान पर 10 फीसदी टैरिफ का बोझ बढ़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने ये प्रस्ताव भी दिया कि यदि वह अपनी कारों का उत्पादन अमेरिका में करे तब उसे इस टैरिफ से मुक्ति दे दी जाएगी। ऐसा ही दबाव उन्होंने एपल फोन बनाने वाली कंपनी पर डालते हुए उसे भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने का प्रस्ताव दिया जिसे नहीं मानने पर अतिरिक्त टैरिफ लगाकर फोन महंगा करने की चेतावनी दे डाली। ब्रिक्स से ट्रम्प इसलिए खफा हैं क्योंकि उसमें शामिल देश अपनी साझा मुद्रा में आपसी व्यापार करने पर विचार कर रहे हैं। और ऐसा होने पर अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व खतरे में पड़ जाएगा। सही बात ये है कि बड़ी चीजों का उत्पादन करने में भले ही अमेरिका विश्व में अग्रणी हो किंतु दैनिक उपयोग में आने वाली सैकड़ों वस्तुओं का उसे आयात करना होता है। इस वजह से उसका व्यापार घाटा बढ़ता गया। चीन और भारत जैसे देशों में ही ऐसी तमाम अमेरिकी कंपनियां हैं जो यहाँ अपना उत्पादन करने के बाद अमेरिका में बेचती हैं। ट्रम्प इसी स्थिति को बदलना चाह रहे हैं। दूसरा दबाव उनका भारत सहित अनेक देशों पर अमेरिका में बने हथियार, लड़ाकू विमान, मिसाइलें, ड्रोन जैसी युद्ध सामग्री खरीदने का है। लेकिन  आज के विश्व में किसी एक देश का  चौधरी बना रहना मुमकिन नहीं है। ब्रिक्स और शंघाई सहयोग जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन विश्व की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके बीच  समन्वय से अमेरिकी सर्वोच्चता को चुनौती मिल रही है। हालांकि इनमें शामिल सभी देश आर्थिक और सामरिक तौर पर भले ही बहुत ताकतवर न हों किंतु  आपसी व्यापार के जरिये वे एक दूसरे का सहारा बनते हैं। दुनिया का बड़ा बाजार भी इन देशों में होने से अमेरिका को भविष्य में अपने लिए खतरा महसूस होने लगा है। लेकिन ट्रम्प एक साथ पूरी दुनिया से टकराने की जो गलती कर रहे हैं उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता में लगातार कमी आती जा रही है। अचानक महंगाई बढ़ने से आम अमेरिकी नागरिक नाराज हो चला है। घरेलू मोर्चे पर भी उथल - पुथल है। अप्रवासियों को थोक के भाव निकाल बाहर करने  की  मुहिम के कारण कानून व्यवस्था के लिए संकट उत्पन्न होने लगा है। राज्यों के साथ भी उनके रिश्ते तनावपूर्ण हो रहे हैं। छोटी - छोटी बातों में  हस्तक्षेप से ट्रम्प की अपनी पार्टी में ही उनका विरोध शुरू हो चुका है। इलान मस्क जैसे नजदीकी सिपहसालार का साथ छोड़ जाना उनके दबदबे पर सवालिया निशान लगाने काफी है। भारत - पाकिस्तान और ईरान- इसराइल युद्ध के दौरान ट्रम्प का व्यवहार अजीबोगरीब रहा। विशेष रूप से युद्धविराम का श्रेय लूटने की आपाधापी से उनकी  छवि एक विदूषक की बन गई। लेकिन उन पर इस सबका कोई भी असर नहीं पड़ रहा। इसलिए अब पूरी दुनिया उनसे छिटकने लगी है। अमेरिका के सभी राष्ट्रापति सुलझे और समझदार रहे हों ये कहना तो सत्य को नकारना होगा किंतु बीते अनेक दशकों में जितने भी व्यक्ति व्हाइट हाउस में बैठे उनमें डोनाल्ड ट्रम्प से हल्का और अस्थिर मस्तिष्क वाला राष्ट्रपति शायद ही दूसरा रहा होगा। अपने पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने कुछ ऊलजलूल काम किये जिसकी वजह से उन्हें जनता ने लगातार दूसरा अवसर नहीं दिया। लेकिन उनके उत्तराधिकारी जो बाइडेन का प्रदर्शन और भी गया - गुजरा  होने से उनकी वापसी हो गई। अमेरिका के हितों की रक्षा करना बेशक उनका दायित्व है किंतु इसके लिए वे पूरी दुनिया से बैर भाव बढ़ा लें ये सिवाय मूर्खता के और कुछ भी नहीं जिसे वे आये दिन दोहराने में लगे हैं। उनकी ये सनक कहां जाकर रुकेगी ये तो वही जानते हैं किंतु इसकी वजह से अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त नुकसान हो रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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