गुजरात में बड़ौदा और आणंद को जोड़ने वाला चार दशक पुराना गंभीरा पुल ढह जाने से उस पर चल रहे कुछ वाहन नीचे बह रही नदी में गिर गए। अब तक 15 शव निकाले जा चुके हैं जबकि बाकी की तलाश जारी है। बरसात के कारण नदी में बहाव काफी तेज होने से बचाव दलों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जो जानकारी मिली उसके अनुसार इस पुराने पुल की गत वर्ष मरम्मत होने के बाद इंजीनियरों द्वारा तकनीकी तौर पर इसे पूरी तरह से दुरुस्त मान लेने पर ही दोबारा यातायात के लिए खोला गया। क्षेत्रीय विधायक के अनुसार तो पुल की मरम्मत के उपरांत उसका उपयोग शुरू करने संबंधी अनुपति बाकायदा मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली थी। एक साल के भीतर ही पुल के बीच से टूट जाने से ये आशंका उत्पन्न हुई है कि मरम्मत का काम स्तरहीन था और जिस ठेकेदार ने वह काम किया उसकी उन इंजीनियरों से सांठगांठ थी जिन्होंने उसके काम को सही होने का प्रमाणपत्र दिया। जाँच का मुद्दा ये भी है कि चालीस साल पुराना वह पुल दोबारा उपयोग करने योग्य था भी या नहीं? बढ़ते यातायात को देखते हुए उसकी क्षमता का परीक्षण हुआ या नहीं , ये भी बड़ा सवाल है। एक - दो वर्ष पूर्व भी गुजरात के एक पर्यटन स्थल पर मरम्मत के बाद खोले गए पुल पर भीड़ बढ़ जाने से वह गिर गया जिसमें दर्जनों लोग मारे गए थे। हालांकि इस तरह के हादसे पूरे देश में होते हैं। बिहार में तो हालिया वर्षों में अनेक निर्माणाधीन पुल टूटकर गिर गए। इन घटनाओं में इक्का - दुक्का के पीछे तकनीकी या प्राकृतिक कारण हो सकता है किंतु अधिकांश में भ्रष्टाचार ही मुख्य रूप से होता है। इंजीनियरों के साथ मिलीभगत से घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग होने के अलावा डिजाइन संबंधी खामियां भी वजह बनती है। संबंधित शासकीय विभागों के अमले द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही का उदाहरण हाल ही में भोपाल में बने एक पुल से मिला जिसमें 90 अंश का मोड़ बना दिया गया। गुजरात के ताजा हादसे के बाद हालांकि सरकारी निर्माणों में होने वाला भ्रष्टाचार रुक जाएगा इसकी उम्मीद करना अपने आप को धोखे में रखना है क्योंकि राज्य कोई भी हो और सत्ता किसी भी पार्टी की हो , सरकार द्वारा करवाये जाने वाले निर्माण में गुणवत्ता का 100 फीसदी पालन होना असंभव है जिसका एकमात्र कारण है भ्रष्टाचार । सरकारी अमला और ठेकेदार की संगमित्ती को सत्ताधीशों का संरक्षण मिलता है । इसीलिए ऐसी घटनाओं के लिए दोषी करार दिये गए लोग या तो बच निकलते हैं या उन्हें दी जाने वाली सजा उनके अपराध की तुलना में बेहद मामूली होती है। इसीलिए भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्र और ठेकेदार रूपी व्यवस्था के मन में कोई खौफ नहीं रहता। हर वर्ष इस तरह के हादसों में अरबों - खरबों की आर्थिक क्षति होने के साथ ही दर्जनों लोगों को बिना किसी कसूर के जान गंवानी पड़ती है जिसकी क्षतिपूर्ति सरकार द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे से नहीं हो सकती। गुजरात में गंभीरा पुल गिरने की जांच से दुर्घटना का सही कारण सामने आना मुश्किल है क्योंकि जाँच करने वाले दूध के धुले होंगे इसमें संदेह बना रहेगा। एक और सवाल इस हादसे के संदर्भ में उठना स्वाभाविक है कि समय - समय पर पुराने हो चुके पुलों की क्षमता का सही आकलन क्यों नहीं होता? गंभीरा पुल कहने को तो महज चार दशक पुराना बताया जा रहा है किंतु ऐसा लगता है उसकी मूल डिजाइन और मजबूती आज के यातायात का दबाव सहने में सक्षम नहीं है। ऐसे में उसकी मरम्मत होने के बाद दोबारा आवागमन के लिए खोलने से पूर्व जो जाँच हुई उसमें बेईमानी की किये जाने की आशंका है। इसलिए इस हादसे की जाँच किसी ऐसी एजेंसी से करवाया जाना चाहिए जिसकी पेशेवर ईमानदारी पर उंगली न उठ सके। केन्द्र सरकार को इस मामले में पहल करनी चाहिए। इस दुर्घटना से सबक लेकर देश भर में उन छोटे - बड़े पुलों की जाँच करवाई जाए जो दो - तीन दशक पुराने हो चले हैं और बढ़ते यातायात का बोझ सहने में अक्षम प्रतीत होते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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