Monday, 28 July 2025

आस्था के साथ अनुशासन का पालन भी जरूरी

गत दिवस हरिद्वार के प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर में हुई   भगदड़ में आधा दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई। हादसे के कारणों को लेकर तरह - तरह की बातें सामने आ रहीं हैं। जिला प्रशासन कुछ कह रहा है जबकि घटना के चश्मदीदों का कहना है कि बिजली के तारों में करंट आने के कारण भगदड़ की स्थिति बनी। सच्चाई तो जाँच के बाद भी सामने नहीं आयेगी क्योंकि जिन पर इसका दायित्व रहेगा वे उसी व्यवस्था के हिस्से होते हैं जिसकी लापरवाही ऐसी दुर्घटनाओं का कारण बनती है। त्यौहारों के अवसर पर प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की भीड़ निरंतर बढ़ते जाने से इंतजाम या तो कम पड़ जाते हैं या फिर गड़बड़ा जाते हैं। ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ने से ये सवाल उठने लगा है कि क्या इनको रोकने का कोई तरीका है या नहीं? हर घटना के बाद शासन - प्रशासन अपनी चिरपरिचित कार्यशैली का परिचय देता है। मरने वालों के परिजनों को मुआवजा और घायलों के  इलाज सहित सहायता राशि का कर्मकांड  कर फुर्सत पा ली जाती है। लेकिन हादसों की पुनरावृत्ति न हो इस दिशा में शायद ही कोई प्रयास किया जाता है। कुछ समय पूर्व बागेश्वर धाम में भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर कुछ श्रद्धालुओं की मौत हुई। सीहोर जिले में एक धार्मिक आयोजन में रुद्राक्ष वितरण में हुई धक्का - मुक्की में अनेक लोग मारे गए थे। देश के जितने भी प्रसिद्ध धर्मस्थल हैं वहाँ आस्था का अतिरेक जानलेवा दुर्घटनाओं का कारण बनता जा रहा है। सही बात ये है कि धार्मिक आयोजन अब ईवेंट और तीर्थ यात्राएं पर्यटन में बदल गईं हैं। मनसा देवी का मंदिर हरिद्वार में एक पहाड़ी पर स्थित है। पहले श्रद्धालुओं को पैदल चढ़कर वहाँ जाना होता था किंतु अब रोप वे की सुविधा उपलब्ध होने से ऊपर जाना आसान हो गया जिससे वहाँ क्षमता से अधिक श्रद्धालुओं का जमावड़ा होने है। त्यौहारों पर भीड़ और भी बढ़ जाती है किंतु स्थानीय प्रशासन तदनुसार व्यवस्थाएं नहीं कर पाता जिससे  धक्का - मुक्की और भगदड़ जैसी घटनाएं हो जाती हैं। मंदिर का प्रबंध देखने वालों की रुचि श्रद्धालुओं से मिलने वाले चढ़ावे में ही ज्यादा होती है किंतु भीड़ के लिहाज से समुचित व्यवस्थाएं करने के प्रति वे उदासीन बने रहते हैं जिसका दुष्परिणाम जानलेवा दुर्घटनाओं के रूप में देखने मिलता है। बीते कुछ दशकों में धर्मस्थलों को जिस तरह से पर्यटन केंद्र का रूप दिया गया उसके कारण वहाँ आने वालों  का उद्देश्य केवल श्रद्धा - भक्ति नहीं रह गया है। अवकाश वाले दिन वृंदावन में दिल्ली सहित निकटवर्ती शहरों से  हजारों वाहन आ जाते हैं। इस कारण  यातायात की समस्या उत्पन्न हो जाती है। बांके बिहारी मंदिर जैसे आस्था केंद्र में दर्शनार्थियों की भीड़ के अनियंत्रित होने की घटना आम हो चली है। इस स्थिति के लिए शासन - प्रशासन और धर्म स्थल के प्रबंधन तो जिम्मेदार हैं ही किंतु जो श्रद्धालु भीड़ के हिस्से बनते हैं उनका दोष भी कम नहीं है। स्थान और व्यवस्थाएं कम होने के बावजूद भी जो लोग भीड़ में घुसने का दुस्साहस करते हैं वे खुद तो खतरे में पड़ते ही हैं , वहाँ उपस्थित अन्य लोगों की जान भी जोखिम में डाल देते हैं । सावन के महीने में जहाँ - जहाँ  ज्योतिर्लिंग हैं, वहाँ बड़ी संख्या में शिवभक्त जमा होते हैं। विशेष रूप से सोमवार को जनसैलाब उमड़ता है। जनसंख्या में वृद्धि के अलावा आवागमन के बढ़ते साधन और मध्यमवर्ग में सैर - सपाटे की बढती रुचि से धर्मस्थलों की भीड़ जिस प्रकार नये कीर्तिमान बना रही है उसके कारण स्थानीय  लोग तो अच्छी कमाई कर लेते हैं लेकिन व्यवस्थाएं कम पड़ने से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती जा रही है। ये देखते हुए जो लोग इन स्थानों पर जाते हैं उन्हें इस बात के प्रति सजग रहना चाहिए कि वे अपनी और दूसरों की जान खतरे में न डालें। आस्था का अपना महत्व है किंतु उनके साथ अनुशासन का पालन न हो तो वह हादसों का कारण बन जाता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


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